. “मैंने आज अपने हाथों से आपके लिए बंगाल की स्पेशल लुच्ची और शुक्तो बनाया है और साथ में खिचुरी और बंगाली मिष्ठी पुलाव भी बनाया है। आपको जरूर पसंद आएगा।” लुच्ची नाम सुनकर मुझे हंसी सी आ रही थी। मैंने. कहा “अरे … आपने बहुत कष्ट किया? क्या जरूरत थी इतनी चीजों की?” “अपनों के लिए कोई कष्ट थोड़े ही होता है?” उसकी मुस्कान तो कातिलाना ही थी। दोस्तो! मुझे लगता है डिनर तो बस बहाना था। जिस प्रकार उसने डिनर. में इतनी चीजें बनाई थी और मनुहार कर रही थी, लगता है शायद लैला आज जैसे मौके की तलास में ही थी। हम लोग डिनर करने डाइनिंग टेबल पर आ गए। लैला मेरे बगल में ही बैठ गई। लैला ने पास में रखी 2 मोमबत्ती की ओर इशारा करते हुए मुझे उन्हें जलाने के लिए कहा। ओह … तो लैला … जान ने तो आज कैंडल लाईट डिनर करने का मूड बना रखा है। साथ में उसने मधुर संगीत भी लगा दिया था। मैंने गौर किया दोनों मोमबत्तियों के नीचे. अंग्रेजी के एस और पी (S+P) की आकृति बनी हुई थी। लैला की यह कारीगरी तो वाकई काबिले तारीफ़ थी। लैला ने खाना बहुत बढ़िया बनाया था। उसने कई और भी अल्लम-पल्लम चीजें चीजों के साथ बंगाली मिठाइयाँ भी बनाई थीं।. और सबसे बड़ी बात तो यह यही कि जिस प्रकार वह डाइनिंग टेबल पर मेरे बिल्कुल पास बैठी मनुहार कर रही थीं मुझे लगता है आज बस आज की रात क़यामत आने ही वाली है। हम डिनर करते जा रहे थे और साथ में बातें भी करते जा. रहे थे। “पता है बनर्जी साहेब तो मीठा बिल्कुल नहीं खाते.
” “अरे क्यों?” “शूगर के कारण डॉक्टर्स ने मना कर रखा है।” कहकर उसने मेरी ओर देखा। “ओह … आई एम सॉरी!” प्रिय पाठको और पाठिकाओ! आप तो बहुत गुणी और अनुभवी हैं। आप तो जानते ही हैं शूगर के कारण ज्यादातर पुरुष अपनी पौरुष क्षमता खो देते हैं। “और पता है सुहाना भी मीठा बहुत कम खाती है.
” “अच्छा?” “वह ज्यादा ही फिगर कोंशियस है।” उसने मुस्कुराते हुए कहा। “तभी आपकी तरह बिल्कुल स्लिम ट्रिम है। लगता ही नहीं आपकी बेटी है ऐसा लगता है जैसे आपकी छोटी बहन हो.
” मेरी बात पर पहले तो वह खिलखिला कर हंसने लगी और फिर किसी नव-विवाहिता की तरह लजा गई। “एक बात बोलूँ?” “हाँ … श्योर?” “मिसेज माथुर ने भी फिगर बहुत अच्छा मेन्टेन किया हुआ है?” उसने मेरी आँखों में झांकते हुए कहा। तेज साँसों के साथ उसकी आँखों में लाल डोरे से तैरने लगे थे और कानों की लोब और उसका ऊपरी. हिस्सा तो जैसे रक्तिम हो चला था। “ओह … हाँ … थैंक यू मिसेज बनर्जी.
” “आप … प्लीज … मुझे मिसेज बनर्जी की जगह जया बोलिए ना?” “ओह … हाँ … ओके … पर आप भी मुझे प्रेम के नाम से हे संबोधित किया करें प्लीज!” मैंने मन में सोचा मेरी जान मैं तो मैं तो आज जया नहीं जानेमन बोलने के मूड में हूँ। “हा … हा … हा … ओके …” उसने रहस्यमयी मुस्कान के साथ तिरछी नज़रों से मेरी ओर देखते हुए कहा। “आप मिसेज माथुर को मिस नहीं. करते क्या?” “हाँ मिस तो बहुत करता हूँ.
पर मजबूरी है.
” “आपकी शादी को कितने साल हुए हैं?” “10-12 साल होने को आए हैं.
” “अच्छा? पर आप दोनों को देखकर ऐसा लगता ही नहीं। आप दोनो तो ऐसे लगते हो जैसे शादी को 2-3 साल ही हुए हैं.
” कहते हुए वह फिर हंसने लगी। “थैंक यू ! वैसे आप भी 25-26 की ही लगती हैं। आपने तो अपनी फिगर बहुत अच्छे से मेन्टेन किया हुआ है। ऐसा लगता है जैसे कॉलेज गर्ल हों.
” “ओह … थैंक यू प्रेम जी!” अपनी तारीफ़ पर वह खिलखिला कर हंसने लगी पर बाद में कुछ संजीदा (सीरियस) होते हुए बोली- पर ऐसी फिगर का क्या फ़ायदा? “क्यों … ऐसा क्या हुआ?” “मैं तो बनर्जी साहब को बोल-बोल कर तक गई कि किसी ढंग के. डॉक्टर से दवाई लें और एक्सरसाइज भी किया करें पर वो मानते ही नहीं.
” कहते हुए वह उदास सी हो गई। “ओह … आप हौसला रखें.
किसी अच्छे डॉक्टर से भी जरूर सलाह लें.
” अनायास मेरा हाथ उसके हाथ के ऊपर चला गया। उसने अपना दूसरा हाथ मेरे हाथ पर रख दिया और सिर झुका लिया। मुझे लगा उसकी आँखें छलकने लगी हैं। ये औरतें भी कितनी जल्दी आँखों से आँसू निकालने लग जाती हैं। “ओह … आई एम सॉरी! ज … जया जी!” मेरी हालत का अंदाज़ा आप. लगा सकते हैं। जिस प्रकार उसने मेरे हाथ को पकड़ रखा था, मैं अगर छुड़ाने की कोशिश करता तो यह बेहूदगी (अभद्रता) ही होती। मैं दूसरे हाथ से उसकी पीठ थपथपाते हुए उसे हौसला दिया। हमने डिनर लगभग ख़त्म कर लिया था और मैं उठने का उपक्रम करने की सोच ही रहा था। अब वह थोड़ी नार्मल हो गई थी। “अरे आपने तो ये सोन्देश और रोसोगुल्ला तो लिया ही नहीं?” “बस … बस … मैं भी मिठाई ज्यादा नहीं खाता.
” “नहीं … नहीं आपको रोसोगुल्ले का यह एक पीस तो मेरे कहने पर लेना ही होगा.
पता है यह कोलकता का स्पेशल रोसोगुल्ला है.
” कहते हुए उसने अपने हाथ में रसगुल्ला लेकर मेरे मुंह में डालने लगी। मैं ना … ना … करते ही रह गया और इस आपाधापी में थोड़ा रस मेरे कुर्ते पर और कुछ उसके गाउन पर भी गिर गया। “ओह … सॉरी? आपके कपड़े खराब हो गए … आइये मैं साफ़ कर देती हूँ … आई एम सॉरी.
” कहते हुए वह उठ खड़ी हुई और मुझे भी बाजू से पकड़कर वाशबेसिन की ओर ले आई। हे लिंगदेव! मेरा तो पूरा बदन ही जैसे गनगना उठा था। गला सूखने लगा और कानों में सीटियाँ सी बजने लगी थी.
और लंड महाराज तो जैसे आज पायजामा फाड़कर बाहर आने को उतारू होने लगे थे। लैला तो बस तिरछी नज़रों से मेरे लंड की ओर ही देखे जा रही थी। साली इन अनुभवी औरतें को पुरुषों को रिझाने और इश्क की आग को भड़काने का कितना बढ़िया हुनर आता है। वाश बेसिन के पास लगे टॉवल स्टेंड से तौलिया लेकर उसे पानी में भीगोकर उसने. मेरे कुर्ते को साफ़ करना शुरू किया। मेरा लंड तो झटके पर झटके खाने लगा था और दिल की धड़कने और साँसें ऐसे चल रही थी जैसे किसी लोहार की धोंकनी हो। आप मेरी हालत का अंदाज़ा लगा सकते हैं। उसकी गर्म और महकती. साँसें तो मैं अपने चहरे और सीने पर साफ़ महसूस कर सकता था। मेरे तो कानों में तो जैसे सीटियाँ सी बजने लगी थी। मैंने झिझकते हुए कहा- ओह, आप रहने दें मैं कर लूंगा प्लीज! रस थोड़ा मेरे कुर्ते पर सीने वाली जगह और पेट के नीचे वाली जगह पर (पायजामे के नाड़े के नीचे) पर भी लग गया था। थोड़ा रस उसके गाउन पर भी गिर गया था अब वह अपने गाउन को साफ़ करने लगी। जिस अंदाज़ में वह नेपकिन को अपने गले पर लगाकर साफ़ कर रही थी. उसके गुदाज़ उरोजों की गोलाइयां तो मेरे ऊपर जैसे बिजलियाँ ही गिराने लगी थी। उसकी तनी हुई घुन्डियाँ तो ऐसे लग रही थी जैसे कह रही हों ‘हमें मुंह में लेकर सारा दूध पी जाओ।’ “अरे आपके कुर्ते पर तो और भी रस. लगा है?” कहते हुए उसने फिर से टोवल को पानी में डुबोकर मेरे कुर्ते के नीचे वाले हिस्से पर रगड़ने लगी। मेरा लंड तो जैसे किलकारियां ही मारने लगा था। मुझे लगता है उसे मेरे खड़े लंड का अंदाज़ा तो हो गया है।. उसने बिना झिझके 3-4 बार जोर-जोर से मेरे लंड के ऊपर से मेरे कुर्ते को पौंछा। लंड तो जैसे अड़ियल घोड़े की तरह लट्ठ ही बन गया था और लैला तो जैसे मदहोश हुई मेरी हालत से बेखबर मेरे लंड को ऊपर से ही सहलाए जा. रही थी। “ब … बस … बस … प्लीज … हो गया!” “ओह … आई एम रियली सॉरी.
” कहते हुए उसने एक बार फिर से लंड के ऊपर तौलिया फिराया। मेरे लंड ने एक झटका सा खाया तो लैला ने उसे कसकर पकड़ लिया। दोस्तो! यह कुदरत भी कितनी अजीब है। औरत कितनी भी कामातुर हो कभी अपनी ख्वाहिश जबानी नहीं बताती बस उसके हाव-भाव (शारीरिक भाषा) सब कुछ बयान कर देते हैं। बीवियां (पत्नियां) तो अपना दाम्पत्य हकूक (पत्नी धर्म) ही निभाती हैं पर. महबूबायें अपने हुस्न के खजा़ने लुटाती हैं। मुझे लगता है लैला भी अपने हुस्न का खजाना लुटाने को बेताब हो चली है। कमसिन और कुंवारी लौंडियों को पटाना और उनका कौमार्य मर्दन करना बहुत ही मुश्किल काम होता है. पर शादीशुदा और अनुभवी महिला अगर एक बार राजी हो जाए तो फिर अपने हुस्न के सारे खजाने ही अपने प्रेमी को लुटा देती है। और फिर इससे पहले कि मैं कुछ करता अप्रत्याशित रूप से उसने अपना सिर मेरे सीने से लगा. दिया। मुझे पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया, मेरे हाथ अनायास ही उसके सिर और पीठ पर चले गए और मैंने उन्हें सहलाना चालू कर दिया। उसके गुदाज़ उरोजों की गर्माहट मैं अपने सीने पर महसूस कर रहा था। मैं सच कहता हूँ उसके गुदाज़ और रसीले उरोजों की कसावट ठीक वैसी ही थी जैसी सुहाना की। आपको याद होगा तीन पत्ती गुलाब नामक कथानक में एक बार कुत्ते के डर से सुहाना भी इसी तरह मेरे सीने से चिपक गई थी। लैला ने अब अपने होंठ. मेरे होंठों से चिपका दिए। मैंने प्यासी पड़ोसन को अपनी बांहों में भींच लिया और मैं भी उसे बेतहाशा चूमने लगा। हम दोनों को ही अब होश नहीं था। कितनी देर हम एक दूसरे की बांहों में सिमटे एक दूसरे को चूमते. चाटते रहे। मैं कभी उसके उरोजों को दबाता और कभी उसके गोल कसे हुए नितम्बों को सहलाता। जैसे ही मेरे हाथ टटोलते हुए उसकी बुर के पास पहुंचे, मेरी प्यासी पड़ोसन लैला अचानक चौंकी और फिर ‘ओह … आई एम सॉरी’ कहते हुए परे हट गई। लग गए लौड़े!! जैसे ही नैया किनारे के पास आई अचानक हिचकोले खाते हुए फिर से दूर चली गई। हम हाथ धोकर वापस डाइनिंग टेबल पर आ गए। संजीवनी बूंटी ने अपना सिर झुका रखा था। वह कुछ सोचे जा रही थी।. उसकी आँखें बंद थी और आंसुओं के कुछ कतरे उसके गालों पर लुढ़क आए थे। मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि इस स्थिति में क्या किया जाए या किस प्रकार उसे सांत्वना दी जाए? इतना तो पक्का है कि उसकी उफनती. खूबसूरत जवानी की शारीरिक भूख सुजोय बनर्जी नामक उस चमगादड़ के वश में बिल्कुल भी नहीं है.
और यह लैला भी अपनी जवानी की भूख को अब और सहन करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं लगती है। “ज … जया जी … आप ब … बहादुर औरत हैं आपको हौसला नहीं छोड़ना चाहिए.
” मैंने उसके गालों पर आए आंसुओं को पोछते हुए उसे दिलासा दी। और फिर उसने अपनी मुंडी थोड़ी सी ऊपर उठाई तो उसने एक पल के लिए मेरी आँखों में झांका। शायद वह कुछ फैसला लेने में हिचकिचा रही थी। उसके होंठ काँप से रहे थे वह कुछ बोलना चाहती थी पर लगता है उसकी जबान उसका साथ नहीं दे रही थी। मैंने उसका चेहरा अपेन हाथों में ले लिया और और … फिर … अचानक उसने अपना सिर फिर से. मेरे मेरे सीने से लगा दिया। “प … प्रेम! म … मैं …” वह सुबकने लगी थी और उसका गला रुंध सा गया था। “ओह्ह …” मेरे मुंह से तो बस इतना ही निकल पाया। अब तो सब कुछ शीशे की तरह साफ़ था। ऐसी हालत में शब्द मौन हो. जाते हैं और सब कुछ चाहा-अनचाहा अपने आप घटित होने लग जाता है। और फिर मैंने उसे अपनी बांहों में जोर से भींच लिया और उसके गालों और अधरों पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी। लैला तो अब मेरी बांहों में सिमटी बस आह. … ऊंह … करने लगी थी। हम दोनों को ही अब सुध ही नहीं थी। अब तो जो होना है कर लेने को हम दोनों का मन उतावला हो चला था। हे लिंगदेव! आज तो सच में तेरी जय हो! मैंने तो कभी सपने भी नहीं सोचा था कि यह इतनी. जल्दी मेरी बांहों में सिमट जाएगी। प्यासी पड़ोसन बेतहाशा मुझे चूमे जा रही थी। एक संयोग देखिये: लैला ने हल्का संगीत लगा रखा था उसमें किसी पुराने गाने की धुन बज रही थी ‘हम जब सिमट के आपकी बांहों में आ. गए।’ प्रिय पाठको, आपको यह प्यासी पड़ोसन सेक्स इन हिंदी कहानी पढ़ा कर मजा आ रहा हैं ना? [email protected] प्यासी पड़ोसन सेक्स इन हिंदी कहानी जारी रहेगी.
स्रोत:इंटरनेट