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खामोशी द साईलेन्ट लव 1

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खामोशी द साईलेन्ट लव 1 1

. हम रायपुर तो सुबह सात बजे के करीब ही पहुँच गये थे, मगर एक तो मेरा रिजर्वेशन करवाने में हमें देर हो गयी थी ऊपर से मोनी का घर रायपुर से भी 15 किलोमीटर दूर एक गाँव में था.
इसलिये रायपुर से आगे हमें बस से जाना पड़ा और ग्यारह बजे के करीब हम‌ मोनी के घर पहुँच पाये। मोनी के घर के बारे में क्या बताऊं मैं … वो घर तो क्या था, बस चार दिवारी के अन्दर एक कमरा ही था जिसमें सामान के नाम पर बस सोने के‌ लिये एक बेड पड़ा था.
वैसे उसे बेड तो नहीं कह सकते थे क्योंकि वो चारपाई से तो बड़ा था मगर बेड से छोटा था, लगभग पाँच बाय छह फीट का लकड़ी का एक पलंग था जिस पर ऐसे ही कुछ कपड़े पड़े हुए थे। पँखा नहीं था, बस खिड़की‌ में एक‌ छोटा सा‌ कूल‌र लगा हुआ था। एक टेबल थी, जिस पर एक‌ पुराना छोटा सा ब्लैक एंड व्हाईट टीवी रखा हुआ था और एक‌ पुरानी लकड़ी की कुर्सी थी। वैसे मोनी के‌ पास कमरा तो एक ही था, मगर वो कमरा था काफी‌ बड़ा.
उसके एक कोने‌ में ही टेबल डालकर उसने‌ रसोई बनाई हुई थी, जिस पर गैस चूल्हा, कुछ बर्तन और छह-सात डिब्बे रखे हुए थे। कमरे के‌ दूसरे कोने में ही बाथरूम था जिसमें कि‌ दरवाजा नहीं था, दरवाजे की जगह एक पुरानी चादर बँधी हुई थी। मोनी‌ की हालत पर मुझे तरस सा आ रहा था क्योंकि घर में गुजारा करने के लिये जितने सामान की जरूरत होती है उससे भी बुरी हालत थी मोनी की। वैसे तो मैं वहाँ ये सोचकर गया था कि. जब तक मेरे भैया छुट्टी नहीं आयेंगे तब तक मैं वहीं पर रहूंगा और ये बात मैं घर पर भी बोल आया था.
मगर मोनी की हालत देखकर मेरा दिल अब वहाँ पर एक दिन भी रुकने के लिये नहीं हो रहा था। मैं उस कमरे में इधर-उधर देख ही रहा था कि तभी मोनी बोली- मुझे पता है कि तेरा दिल तो यहां नहीं लगेगा, तुम्हें तो आदत नहीं होगी ऐसे रहने की! मोनी ने अपनी खस्ता हालत पर अफसोस सा जाहिर करते हुए कहा।  मोनी का चेहरा थोड़ा उतर सा गया था जिससे मुझे उस पर अब बड़ी ही दया सी आ गयी। मेरा वहाँ पर रुकने का दिल तो नहीं कर रहा था मगर मोनी को कहीं बुरा न लगे इसलिये मैं अब वहाँ पर रुकने के बारे में ही सोचने लगा.
  वैसे भी मुझे वापसी का रिजर्वेशन पन्द्रह दिन बाद का मिला था इसलिये मैंने सोचकर मोनी को जवाब दिया- इसमें क्या है? मैं कौन सा कहीं का नवाब हूं जो‌ यहाँ रह नहीं सकता? ऐसे ही रहूंगा जैसे तुम रहती हो! यह कहते हुए मैं अब. सीधा ही उस पलंग पर पसर गया। “अरे … रे … रे … ये क्या … रुक, रुक तो … बस थोड़ी देर रुक, मैं इसे झाड़ तो देती हूं…” मोनी ने मुझे रोकते हुए कहा और जल्दी-जल्दी उस बिस्तर को झाड़कर सही करने लगी। मोनी के चेहरे पर अब थोड़ी मुस्कान सी आ गयी थी। “एक काम करेगा? जब तक‌ मैं यहा सफाई‌ करती हूं तब तक तू बाजार से थोड़ा सामान‌ ले आयेगा क्या?” मोनी ने मुझे संकोच सा करते हुए कहा। जाहिर था कि मोनी का पति तो यहाँ. इतना आता नहीं था और मोनी भी यहाँ दो तीन महीने बाद आई थी इसलिये घर में खाने-पीने का राशन नहीं था। “हां हां … क्या लाना है?” मैंने हामी भरते हुए कहा। मोनी‌ ने‌ मुझे अब एक‌ कागज‌ पर कुछ राशन‌ की सूची. (लिस्ट) बनाकर दे दी, साथ ही जो पैसे वो घर से लाई थी उनमें से राशन लाने‌ के‌ लिये उसने मुझे पाँच सौ रुपये पकड़ा दिये। मोनी से पैसे लेना मुझे सही नहीं लग रहा था इसलिये मैंने मोनी से वो सामान की लिस्ट तो ले‌ ली मगर पैसे वापस करते हुए मैंने कह दिया- अभी मेरे पास पैसे हैं और जब मुझे जरूरत होगी तब मैं अपने आप ही माँग लूंगा.
मना करने के बाद भी उसने मुझे अब जबरदस्ती भी पैसे देने की कोशिश की मगर उसकी हालत को देखकर मुझे उसके पैसे लेना‌ सही‌ लग नहीं रहा था। मेरे पास पहले से ही एक हजार रुपये थे और घर से आते समये अपने खर्चे के लिये मैंने अपनी मम्मी पापा से एक हजार रुपये और ले लिये थे‌। कुल मिलाकर मेरे पास. दो हजार रुपये के करीब थे इसलिये मैंने‌ मोनी से पैसे नहीं लिये और अपने पैसे से ही बाजार से सामान लेने के लिये चला गया। मोनी के घर से बाजार काफी दूर था इसलिये बाजार से राशन लाने में मुझे दो‌ घण्टे से भी. ज्यादा का समय लग गया और जब तक‌ मैं राशन लेकर घर पहुँचा तब तक‌ मोनी ने घर की लगभग सारी साफ सफाई‌ कर ली थी‌। मोनी को देखकर लग रहा था कि मेरे जाने के बाद से उसने एक मिनट भी आराम‌ नहीं किया था,पसीने से वो सारी भीगी हुई थी। वो थकी हुई थी मगर फिर भी मुझे देखते ही वो अब जल्दी से दरवाजे‌ पर आ गयी और बोली- तू सोच रहा होगा कि साथ लाकर परेशान कर दिया न मैंने? मोनी ने मेरे हाथ से राशन का बैग लेकर उसे खुद उठाते. हुए कहा। मोनी की बातों व व्यवहार से जाहिर हो रहा था कि वो मेरा उसके साथ आने का काफी अहसान मान रही थी इसलिये वो मुझसे कोई भी काम नहीं करवाना चाहती थी। घर से आते समय रास्ते में भी मोनी यही कोशिश ‌कर रही. थी कि मुझे कोई‌ दिक्कत न हो‌, इसलिये मैंने जो एक सीट ली थी उस पर वो खुद आराम करने की बजाय मुझे ही सोने के लिये बोलती रही मगर मैंने ही उसे मना कर दिया था। वैसे मैं परेशान तो हो गया था मगर मोनी को मैं जाहिर नहीं करना चाहता था इसलिये मैंने बात को टालते हुए जवाब दिया- नहीं-नहीं, ऐसा कुछ नहीं है, मैं घर पर भी तो काम करता हूं, फिर यहाँ काम करने‌ में‌ क्या दिक्कत है? मैंने हँसते हुए ही कहा और मोनी के पीछे ही अन्दर आ गया। मोनी ने राशन के बैग को रसोई में रख दिया और मुझे नहाने के लिये बोलकर वो खुद अब खाना बनाने में लग गयी। अब जब तक‌ मैं नहा-धोकर तैयार हुआ तब तक‌ मोनी‌ ने भी खाना‌ बना‌ लिया था इसलिये. खाना खाकर मैं टीवी देखने लग गया और मोनी‌ घर के कुछ बचे हुए काम निपटाने‌ में लग गयी। अब इसी तरह दिन‌‌ निकल‌ गया और रात हो गयी। दिन में तो मोनी घर के‌ काम‌‌ करने में लगी रही थी‌ इसलिये मैं उस पलंग पर सो. गया था मगर रात को‌ खाना खाने के‌ बाद मैं अब सोचने‌ लगा कि बिस्तर तो यहाँ पर एक ही है.
एक‌ ही बिस्तर पर तो हम‌ दोनों कैसे सोयेंगे? फिर सोचा कि चलो जैसे भी हो और जो‌ भी करना है वो मोनी को‌ ही करना है.
इसके‌ बारे में मोनी से कुछ पूछकर मैं उसे शर्मिंदा नहीं करना चाहता था इसलिये ‌खाना खाकर मैं अब ऐसे ही टहलने‌ के‌ बहाने‌ घर से बाहर आ‌ गया। मैं बाहर टहल ही रहा था कि कुछ देर बाद ही मोनी ने मुझे आवाज. देक‌र वापस अंदर बुला‌ लिया। मैंने अब घर जाकर देखा‌ तो‌ मोनी ने घर के सारे काम‌ निपटा लिये थे और उसने अपना बिस्तर नीचे फर्श पर लगाया हुआ था। मैंने‌ मोनी से‌ एक दो बार कहा भी कि मैं नीचे सो जाता हूं और. वह बिस्तर पर ऊपर सो जाए, मगर मोनी ने‌ ये कहकर मना‌ कर दिया कि उसे तो पहले से ही नीचे सोने‌ की‌ आदत है.
इसलिये उसने मुझे ही ऊपर वाले बिस्तर पर सोने के लिए बाध्य कर दिया.
मैंने भी अब उससे ज्यादा कुछ नहीं कहा और चुपचाप पलंग पर सो गया। अगले दिन सुबह मैं ग्यारह बजे के‌ करीब सोकर उठा। मोनी को भी घर के‌ काम‌ के अलावा और कोई काम‌ तो था नहीं, इसलिये शायद मोनी भी लगभग मेरे से कुछ देर पहले ही उठी‌ थी क्योंकि जब मैं उठा‌ था उस समय‌ वो घर के‌ काम‌ ही निपटा रही‌ थी।‌ खैर, मैं शौच आदि से निवृत्त होकर जब तक तैयार हुआ तब तक दोपहर के खाने का समय हो गया था, इसलिये खाना खाकर मैं अब टीवी देखने लग गया और मोनी कुछ देर तो घर के‌ काम‌ में लगी रही फिर काम निपटा कर वो अपनी पड़ोसन के घर चली गयी। इसी तरह दिन निकल‌ गया और रात हो गयी। अब रात को खाना खाने के बाद मैं टीवी देख रहा था और मोनी बर्तन आदि साफ कर रही. थी। उस दिन गर्मी कुछ ज्यादा ही थी.
ऊपर से उस कमरे में पँखा भी नहीं था। बस खिड़की में एक कूलर लगा हुआ था और उसकी हवा भी बस पलंग पर ही लगती थी। गर्मी के कारण मैं बस निक्कर और बनियान में ही सोता था मगर फिर भी मुझे गर्मी के कारण पसीना निकल रहा थे, इसलिये मैं अब सोचने लगा कि पलंग पर सोने में भी मुझे जब इतनी गर्मी लग रही है तो मोनी‌ नीचे कैसे सोती होगी? मोनी ने तब तक घर के काम निपटा लिये थे और वो आज भी अपना बिस्तर नीचे लगाकर सोने की तैयारी कर रही थी। गर्मी को देखकर मुझसे अब रहा नहीं गया, मैंने मोनी से कह ही दिया- इतनी‌ गर्मी‌ में तू नीचे कैसे सोयेगी? मुझे कूलर की हवा में भी पसीने निकल रहे हैं, तो फिर तू नीचे कैसे सोयेगी? तू घर काम करके थक जाती‌ होगी, मैं तो दिन में भी सो लेता हूं मगर तू दिन‌ में भी आराम नहीं करती इसलिये तू ऊपर सो जा और मैं नीचे सो जाता हूं.
मैंने मोनी को नीचे सोने से मना‌ करते हुए कहा। मगर मेरे बहुत कहने के बाद भी मोनी ने अब भी कल के जैसा ही जवाब दिया कि उसे पहले से ही नीचे सोने की आदत है। मुझे पता था कि नीचे सोने में मोनी को गर्मी तो लगती है, मगर वो बस दिखावे‌ के‌ लिये ही ऐसा कह रही है क्योंकि मुझे जब कूलर की हवा में भी पसीने निकल रहे थे तो नीचे तो बिल्कुल भी हवा नहीं लगती थी। मोनी जब उपर सोने के लिये तैयार नहीं हुई तो मैंने अब उस कूलर को ही खिड़की से निकालकर नीचे. मोनी के पास लगा दिया जिससे मोनी मुझ पर थोड़ा गुस्सा हो गयी। मोनी मुझे भी कूलर के बगैर गर्मी में नहीं सुलाना चाहती थी इसलिये मैंने उस पलंग को भी हटाकर एक तरफ कर दिया और हम दोनों के लिये नीचे ही एक. चौड़ा सा बिस्तर लगा लिया.
दोनों का बिस्तर जमीन पर लग गया था जिससे मोनी ने मेरे साथ अब एक ही बिस्तर पर सोने मे थोड़ा संकोच तो किया मगर फिर बिना कुछ कहे चुपचाप एक तरफ होकर सो गयी। मोनी शायद दिन भर काम करके थक गयी थी इसलिये लेटते ही उसे नींद आ गयी। मोनी के सो जाने के बाद मैंने अब कुछ देर तो टीवी देखा फिर टीवी बन्द करके मैं भी सो गया।  अब ऐसे ही हफ्ता भर बीत गया। मैं रात को तो उस कूलर को नीचे रखकर हम. दोनों का बिस्तर नीचे लगा लेता था, मगर दिन में उसे वापस खिड़की में ही लगा देता था। शुरू शुरू में एक दो दिन तो मोनी ने मेरे साथ नीचे एक ही बिस्तर पर सोने मे संकोच सा किया मगर फिर बाद में तो वो अपने आप ही मेरे साथ सो‌ जाती थी‌। वैसे भी वहाँ रायपुर में मेरे और मोनी के अलावा घर में और कोई तो था नहीं, इसलिये दिन रात लगभग हम साथ ही रहते थे जिससे मोनी अब मेरे साथ थोड़ा बहुत खुल भी गयी थी।  कहानी दूसरे भाग में जारी है.
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स्रोत:इंटरनेट