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चूत की कहानी उसी की ज़ुबानी 3

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चूत की कहानी उसी की ज़ुबानी 3 1

. मैं फिर कई बार आरती से मिलने के बहाने उसके घर उसकी मां को मिलने लगी और उनसे अपनी ज़रूरत से ज़्यादा जान पहचान बनाने लगी.
उनको पता था कि मैं उनके पति के ऑफिस में काम करती हूँ.
एक दिन उनको बातों ही बातों में बताया कि मैं अब यहाँ से नौकरी छोड़ कर मुंबई जा रही हूँ क्योंकि मेरा भाई वहीं काम करता है और उसने मेरे लिए एक नौकरी खोज ली है.
जब आरती की माँ कुछ जानना चाहा तो मैंने धीरज की बहुत ही तारीफ की और उनके मन में ऐसे लड़के को अपना दामाद बनाने की इच्छा होने लगी.
तब उन्होंने मुझसे पूछा- उसके परिवार में कौन कौन है? तब मैंने बताया- वो अपने माता पिता का इक्लोता लड़का है और वो मेरे लिए मेरा सगा भाई है.
बातों ही बातों में उस ने मुझ से पूछा क्या आरती उस से मिली हुई है.
मैंने कहा हा आंटी दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह से जानते हैं.
इस तरह से उन को फुसला कर मैंने खुद ही उन के दिल में धीरज के लिए जगह बनवा ली और उन्होंने ही शादी के लिए रिश्ते की बात की जो मंज़िल तक पहुँच गई.
आरती और धीरज दोनों ही शादी के बाद बहुत खुश थे और आज भी हैं.
मगर एक बात है कोई भी लड़की शादी के बाद अपने पति को किसी दूसरी से चुदाई करते हुए नहीं देख सकती और यही बात आरती में भी है.
धीरज मुझे आज भी दबा कर चोदता है.
पर यह बात ना तो आरती को पता है और ना ही मेरे पति को.
मेरा पति तो खैर यही समझता है कि हम दोनों सगे भाई बहन की तरह से हैं और जब वो आता है तो उस को उसी तरह से मिलता है जैसे कोई अपने साले से मिलता है.
आरती को भी यकीन हो चुका है कि धीरज का मेरे से कोई सम्बन्ध नहीं है.
मगर असलियत तो यही है कि वो मेरी चूत का और मैं उसके लंड की दीवानी हूँ.
हम दोनों कोई भी मौक़ा हाथ से नहीं जाने देते जब चुदाई का अवसर पास हो.
आरती की शादी हो चुकी थी और वो मस्ती से अपनी चूत को हरा भरा कर रही थी.
इधर मैं भी किसी सख्त मोटे लंबे लंड की तलाश में थी जिससे शादी कर सकूँ.
मगर मुझे यह भी डर था कि मेरी चूत जो पूरी तरह से फ़टी हुई है और जब लड़के को पता लगेगा कि उसको चुदी चुदाई चूत मिल रही है तो वो शायद मुझ से पूरी तरह से मस्ती ना करे.
जब भी वो अपना लंड मेरी चूत में डालेगा तो उसको लगेगा कि वो किसी दूसरे की चुदी हुई चूत को ही चोद रहा है.
कुछ दिन बाद मेरे नौकरी एक बढ़िया कंपनी में लग गई और वहाँ पर एक लड़का मुझ को लाइन मारने लगा.
वो बहुत मस्त था और उस पर मेरा भी दिल आया हुआ था.
एक दिन मुझे ऑफिस में कुछ देर हो गई और वो मेरे पास आकर बोला- आज तो आप काम में फँस गई.
अब बहुत देर हो गई है कैसे वापिस जायेंगी.
मैंने कहा- देखती हूँ अगर कोई सवारी मिलती है तो! उसने कहा- चलिए आज मैं आपको छोड़ देता हूँ.
मैंने ऊपर से ना नुकुर की मगर अंदर से मैं बहुत खुश थी कि आज इसके साथ जाने का मौक़ा मिला है और इसको किसी ना किसी तरह से फँसाना चाहिए और शादी के लिए तैयार करूँ.
उसने कहा- नहीं, आपको कोई सवारी ढूँढने की ज़रूरत नहीं है.
मैं हूँ ना.
उसके पास बाइक थी और मैं उसके पीछे लड़कों की तरह से बैठ गई और हर झटके पर जानबूझ कर अपने मम्मों हो उसकी पीठ पर दबा देती.
फिर मैंने उसको दोनों हाथों से एक घेरा बना कर उस से चिपक गई और अपने दोनों हाथ इस तरह से रखा कि वो उसके लंड के आस पास ही रहें.
जब कुछ देर इसी तरह से मैं उससे चिपकी रही तो मुझे पता लग गया कि उसके लंड ने भी घंटियाँ बजानी शुरू कर दी हैं.
मुझे घर पर छोड़ने के बाद वो वापिस चला गया और मेरे घर के अंदर भी नहीं आया.
मैंने उसको बहुत कहा कि एक कप कॉफी पी कर जाना.
पर तब उसने कहा- आपकी कॉफी ड्यू रही मैं फिर कभी पीऊंगा, अभी मैं जल्दी में हूँ.
अब उससे मेरी मुलाकात हर रोज़ ही होती और हम लोग ऑफिस के बाद कुछ देर इधर उधर टहलते.
धीरे धीरे हम लोग शाम को किसी होटल में जाकर चाय कॉफी पीकर कुछ समय साथ रहते.
वो धीरे धीरे नज़दीक आता गया और हम दोनों एक दूसरे को चूमने चाटने भी लग गये.
अब वो मेरी जांघों पर भी हाथ फेरने लग गया.
फिर उसके हाथ मेरे मम्मों तब भी पहुँचने शुरू हो गये और मेरे हाथ उसके लंड पर.
मैं यह देखना चाहती थी कि उसका लंड कितना मोटा और लंबा है.
जैसे ही मैंने अपना हाथ उसके लंड पर रखा, मुझे अहसास हो गया कि इसका लंड भी धीरज से कम नहीं है.
अब मैं उसको उकसाने लगी ताकि वो मेरी सलवार को खोल कर बिना चूत को देखे अपना लन्ड मेरी चूत में डाल दे.
अगर वो उसको देखेगा तो साफ पता लग जाएगा कि यह पूरी तरह से खेली खाई है जो मैं नहीं चाहती थी कि उसको पता लगे.
वो मेरे मम्मों को अब पूरी तरह से दबाता था और जब भी मौक़ा मिलता तो उन पर अपना मुँह भी मारता था.
आख़िर एक दिन उसने अपना हाथ मेरी सलवार के अंदर डाल दिया.
मैंने उसको मना नहीं किया और वो बोला- यह तो पूरी गीली हुई है.
मैंने कहा- जब इसकी बहनों पर हाथ मारोगे तब यह रोएगी नहीं क्या? वो बोला- मैंने कब इसकी बहन को कुछ किया है.
मैंने कहा- ओ बुद्धू महाराज, मेरे मम्में इसकी बहनें हैं.
जब उन पर मार पड़ती है तो इसके आँसू निकलते हैं.
“ओह … तब साफ साफ बोलो ना कि इसका भी इलाज़ करना है.
” “तुम्हें नहीं पता जो मुझ से कहलवाना चाहते हो?” उस वक़्त हम लोग किस पार्क की झाड़ियों में छिपे थे.
कहानी जारी रहेगी.
लेखिका की इमेल नहीं दी जा रही है.

स्रोत:इंटरनेट