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जवान सौतेली मां की चूत चुदाई की लालसा 1

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जवान सौतेली मां की चूत चुदाई की लालसा 1 1

. मां बोलीं- हर्षद, तुम ये क्या बार बार घूर-घूर कर मुझे देख रहे थे? ऐसा मुझमें तुझे क्या नया दिख रहा है? तुम बहुत बदमाशी कर रहे हो.
मैंने कहा- कुछ नहीं मां … बस मैं तो ऐसे ही देख रहा था.
मुझे माफ कर दो.
वो हंसकर बोलीं- अरे हर्षद मैं तुम पर गुस्सा नहीं कर रही हूँ … मैंने तो तुम्हें ऐसे ही बोला.
वैसे भी तुम्हारी यही उम्र तो है ताक-झांक करने की.
मैंने उनकी हंसी देखी, तो सामान्य हो गया.
कुछ ही देर में हमारा खाना भी हो गया और मां सभी बर्तन लेकर किचन में अपना काम करने लगीं.
मैं उठ कर अपने रूम में चला गया.
कमरे में मैं अपने बेड पर लेटा था, लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही थी.
बार बार मेरी आँखों के सामने वही सारे दृश्य आ रहे थे.
मां और मैं एक दूसरे के पीठ पर हाथ फेर रहे थे.
उनके स्तनों का दबाव मेरे सीने पर मुझे मस्त कर रहा था.
फिर खाना खाते वक्त दिखने वाले सेक्सी मम्मों को देख कर मैं गर्म हुए जा रहा था.
मैं खुद अपने आपको कोसने लगा कि मैं अपनी मां के बारे में कितना गंदा सोचता हूँ.
यही सब सोच कर मुझे कब नींद आ गई, इसका कुछ पता ही नहीं चला.
कुछ देर बाद मां ने मुझे जगाया- हर्षद चलो … उठो फ्रेश हो जाओ.
मैं चाय बनाती हूँ.
तुम तैयार हो जाओ, हमें मंदिर जाना हैं.
मैं उठा और बाथरूम में जाकर फ्रेश हो गया, फिर तैयार हो गया.
पिताजी भी तैयार हो कर मन्दिर जाने के लिए सोफे पर बैठे थे.
मां चाय लाईं और हम तीनों ने चाय पी ली.
फिर मन्दिर के लिए निकल गए.
पैदल जाने में कुछ ही मिनट का रास्ता था.
ये गणेशजी का बड़ा मन्दिर था.
हम लोग बातें करते चल रहे थे.
पिताजी बोले- आज मंगलवार का बहुत ही शुभ दिन है.
हर्षद तुमने बहुत बड़ी खबर सुनायी है आज.
ये सब भगवान की कृपा है बेटा.
इसलिए मैंने ही अदिति को बोला कि हम मन्दिर होकर आएं.
मैं बोला- हां अच्छा हुआ पिताजी.
मैं भी आपको यही कहने वाला था.
फिर हम दर्शन करके उधर बगीचे में थोड़ी देर बातें करने लगे.
कुछ देर बाद हम सब घर आ गए.
तब तक करीब शाम के साढ़े सात बज गए थे.
मां बोलीं- मैं खाना बनाती हूँ.
ये कह कर मां किचन में चली गईं.
मैं और पिताजी टीवी चालू करके हॉल में ही सोफे पर बैठ गए.
मेरी नजरें किचन में गईं, तो मां के हिलते हुए चूतड़ मुझे दिख रहे थे.
उनके मस्त गोल मटोल चूतड़ मुझे उत्तेजित करने लगे थे.
वे इधर उधर हिलतीं, तो उनकी गांड के दोनों फलक ऊपर नीचे हो रहे थे.
जब मां नीचे को झुकतीं, तो उनके दोनों चूतड़ों के बीच वाली दरार साफ दिख रही थी.
ना चाहते हुए भी मेरी नजरें उस तरफ बार बार जा रही थीं.
मैं टीवी कम, अपनी मां के मदमस्त जोवन को ही ज्यादा देख रहा था.
एक बार तो मेरी और मां की नजरें टकरा भी गईं.
मैं नजरें मिलते ही सकपका गया, मगर वो मुझे देख कर हंसने लगीं.
मां अब बार बार मुझे देखते हुए अपना काम करती रहीं.
इतने में पिताजी बोले- तो हर्षद कंपनी कब ज्वाइन कर रहे हो? मैं बोला- अगले हफ्ते एक जनवरी से करने के लिए कहा गया है.
पिताजी- अच्छा है हर्षद … खूब दिल लगा कर काम करना … किसी को शिकायत का मौका मत देना.
इतने में हॉल में मां आईं और वो मेरी तरफ देख कर हंसते हुए बोलीं- किस मौके की बात कर रहे हो.
जब पिताजी ने उन्हें समझाया.
तो वो मुझे आंख मारकर बोलीं- वैसे ही बहुत होशियार है मेरा हर्षद.
उसे कुछ बताने की जरूरत नहीं है.
खुद ही सब समझ जाता है.
उनकी इस बात का अर्थ मुझे कम समझ में आया था.
तब भी उनकी दबती आंख ने मुझे हिम्मत दे दी थी.
मैं भी उनकी तरफ देख कर मुस्कुराने लगा.
फिर पिताजी बोले- हां वो तो है ही.
हम सब हंसने लगे.
फिर कुछ देर टीवी देखने के बाद मां बोलीं- चलिए मैं खाना लगाती हूँ … नौ बज गए हैं.
आपको कल सुबह आठ बजे ऑफिस भी जाना है ना! पिता जी को ये याद आया, तो वो भी उनकी हां में हां मिलाते हुए हाथ धोने चले गए.
मां किचन में चली गईं.
मैं उनके सेक्सी चूतड़ों को देखता रह गया.
कुछ देर बाद मैं भी उठा और हाथ धोकर आ गया.
तब तक मां ने खाना परोस दिया था.
हम सभी ने साथ में खाना खा लिया.
पिताजी अपने बेडरूम में चले गए.
मैं भी अपने रूम में चला गया.
मां किचन में अपना काम समेटने लगीं.
मैं रात को सोते समय सिर्फ एक जांघिया में ही सोता हूँ.
लेकिन अभी ठंडी की वजह से मैंने लुंगी और बनियान भी पहनी हुई थी.
मैं लेट गया, लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही थी.
आंखें बंद करने के बाद न चाहते हुए भी मुझे मां के कड़क और सेक्सी स्तन, गोल-मटोल हिलते हुए चूतड़ और उनके गर्म हाथों का स्पर्श बार बार गर्म कर रहा था.
उनकी गर्म सांसें मेरे गालों पर मुझे महसूस हो रही थीं.
ये सब सोचकर मेरे बदन में कुछ कुछ होने लगा था.
मेरा लंड आहिस्ता आहिस्ता खड़ा होने लगा था.
मुझे अब लगने लगा था कि मेरा लंड जांघिया को फाड़कर बाहर आने की कोशिश कर रहा है.
मैंने लुंगी में हाथ डालकर जांघिया को नीचे कर दिया … और लंड को आजाद कर दिया.
फिर ऊपर से लुंगी ठीक करके लंड ढक लिया.
इस समय मेरा लंड अपने पूरे आकार में था.
मेरा लंड सात इंच लंबा और किसी मोटी ककड़ी सा मोटा है.
इतना भीमकाय लंड भला एक चुस्त जांघिया में कैसे रह सकता था.
इतने में मां मेरे कमरे का दरवाजा खोल कर अन्दर आ गयी और बोलीं- हर्षद ठंड ज्यादा है ना … तो मैं तुझे ये कम्बल देने आयी थी.
मैंने आँख खोल कर मां को देखा, तो पाया कि उनकी नजरें मेरी लुंगी में बने हुए तंबू पर थीं.
मैं घबराकर उठकर बैठ गया.
मेरी तो फट गयी थी.
ठंडी में भी मुझे पसीना आ रहा था.
मां की मस्त जवानी मुझे उनको चोदने के लिए बेचैन कर रही थी.
आगे मैं आपको सौतेली मां की चूत चुदाई की कहानी को आगे लिखूंगा.
आपके मेल का मुझे इन्तजार रहेगा.
[email protected] जवान सौतेली मां की चूत चुदाई की इच्छा की कहानी का अगला भाग: जवान सौतेली मां की चूत चुदाई की लालसा-2
स्रोत:इंटरनेट