. मैंने उसे अपनी बांहों में भरते हुए कहा- मैंने जब आपको पहली बार देखा था तभी दिल ने कहा था, मेड फॉर ईच अदर.
मुस्कुराते हुए बोली- मैंने भी जिस दिन आपको देखा था यही कहा था कि काश मेरा पति ऐसा होता.
आज भी मैं नहाकर पूजा करते समय आपको पति मानकर आपके नाम का सिन्दूर लगाकर आई हूँ.
बातों के सिलसिले के साथ साथ एक दूसरे से लिपटकर एक दूसरे को सहलाने का क्रम जारी था.
मैंने गुप्ताइन की साड़ी और पेटीकोट एक साथ ऊपर उठा दिये और उसके चूतड़ों पर हाथ फेरने लगा.
यह सब कुछ खड़े खड़े हो रहा था, अब मैंने उसको लिटा दिया और उसकी चूचियों पर हाथ फेरने लगा.
मैंने उसकी साड़ी खोलनी चाही तो उसने बड़ी अदा से मना कर दिया, बोली- पहली बार है, इतनी आसानी से नहीं करने दूंगी.
मैंने कहा- अगर ऐसी बात है तो यह लो.
और मैंने पेटीकोट में हाथ डालकर उसकी चूत अपनी मुठ्ठी में दबा ली और अपने होठों से उसके होंठ सिल दिये.
चूत को मुठ्ठी में दबाना छोड़कर मैंने उसकी पैन्टी में हाथ डाल दिया.
वो अभी अभी शेव करके आई थी.
अब मैंने अपनी टी शर्ट उतारी और उसके ना ना करते करते साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट और ब्रा सब उतार दिया, तमाम कोशिशों के बावजूद उसने पैन्टी नहीं उतारने दी.
बड़े बड़े कबूतरों जैसे उसके स्तन देखकर मैं मदहोश हो गया और उन्हें चूमने, चाटने और चूसने लगा.
गुप्ताइन ने मेरी ओर करवट ली और अपना हाथ मेरे लोअर में डालकर लण्ड सहलाने लगी.
हर गुजरते पल के साथ लण्ड टन्नाता जा रहा था.
मैंने फिर पैन्टी उतारनी चाही तो हाथ पकड़ लिया तो मैंने कहा- न करने देना, दीदार तो करा दो.
वह कहने लगी- पहले अपना मुन्ना दिखाओ.
मैंने कहा- मेरा मुन्ना तुम्हारे हाथ में है, देख लो.
वो उठी और दिशा बदलकर 69 की पोजीशन में आ गई और मेरा लोअर नीचे खिसका दिया और लण्ड को चूमने लगी.
मैंने उसकी पैन्टी उतार दी और उसकी चूत पर उंगलियां चलाने लगा.
उसने लण्ड को चूसना शुरू किया तो मैंने चूत में उंगली चलानी शुरू कर दी.
अब मेरे सब्र ने मेरा साथ छोड़ दिया, मैं उठा और उसकी टांगों के बीच आ गया, उसने अपने चूतड़ उठाये और गांड के नीचे दो तकिये रख दिये.
उसकी चूत एकदम आसमान में टंग गई, अब तो मैं घुटनों पर खड़ा होकर चोद सकता था.
उसकी चूत के लबों को फैला कर मैंने वहां अपना लण्ड रगड़ना शुरू किया तो बोली- अब देर न करो, मुन्ने को मुन्नी के घर जाने दो.
मैंने लण्ड का सुपारा निशाने पर रखा और दबाने लगा.
चूत काफी गीली हो चुकी थी इसलिये आसानी से चला गया.
लण्ड गुप्ताइन की चूत में डालकर मैं उसकी चूचियों से खेलने लगा तो गुप्ताइन चूत को अन्दर की तरफ सिकोड़ने लगी.
मैंने ट्रेन रवाना कर दी और धीरे धीरे स्पीड बढ़ा दी.
जब लगा कि मंजिल ज्यादा दूर नहीं है तो मैंने गुप्ताइन से कहा- आपके सिर के पास एक पैकेट रखा है, पकड़ा दीजिये.
गुप्ताइन ने पैकेट उठाया और देखा कि कॉण्डोम है तो रख दिया और बोली- इसकी जरूरत नहीं है, मेरा ऑपरेशन हो चुका है.
यह सुनकर मैं निश्चिंत हो गया और फुल स्पीड से मंजिल की ओर चल पड़ा.
इसके कुछ दिन बाद गुप्ता जी का प्रमोशन हुआ और उनका ट्रांसफर मेरठ हो गया.
मेरे और गुप्ताइन के लिए अब खुला मैदान था, कहीं भी चौके छक्के मारो.
स्थिति ऐसी हो गई कि एक दिन सुबह दूध लेने के लिए निकला तो गुप्ताइन अपनी किचन में खड़ी दिख गई.
उसने इशारे से पूछा- कहाँ? तो मैं जवाब देने के बजाय उसके घर पहुंच गया.
वो किचन में खड़ी होकर आटा गूंध रही थी, बोली- सुबह सुबह कहां निकल पड़े? मैंने कहा- तुम्हें चोदने.
और इतना कहते कहते उसका गाउन ऊपर उठाया, पैन्टी नीचे खिसकाई और पेल दिया.
गुप्ताइन अरे अरे करती रह गई और मैंने ट्रेन शुरू भी कर दी.
आटे से सने हाथ किचन टॉप पर रखकर वो झुक गई और चुदवा लिया.
कहानी अभी जारी है.
[email protected]
स्रोत:इंटरनेट