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प्रेमिका संग हसीन ज़िंदगी के पल 1

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प्रेमिका संग हसीन ज़िंदगी के पल 1 1

. पर शायद वो जान चुकी थी, उसने तुरंत ही कहा- मेरा नंबर ले लो, फिर हम फोन पे बातें करते हैं.
उसने मुझसे फोन नंबर एक्स्चेंज किया और चली गयी.
मुझे तो ऐसा लगा मानो मैंने दुनिया ही जीत ली। मैं बहुत खुश था.
उसका नंबर मिलते ही सबसे पहले चेक किया कि वो व्ट्सऐप पर है या नहीं.
और वो थी वहाँ! मैंने जैसे ही उसका प्रोफ़ाइल देखा, एक मैसेज भेज दिया हैलो का। तुरंत ही उसका जवाब आया और उसने कहा कि वो मेरे ही मैसेज का इंतज़ार कर रही थी.
अब तो मेरे खुशी का ठिकाना नहीं रहा.
फिर शुरू हुआ हमारी बातों का सिलसिला और हम कभी मैसेज में तो कभी फोन पे घंटों बातें करने लगे.
उसने बताया कि यहाँ वो अकेले ही रहती थी.
उसका होम टाउन उसने हिमाचल बताया.
और ये भी बताया कि यहाँ उसके ज़्यादा दोस्त भी नहीं हैं.
यही बात मेरा प्लस पॉइंट हो गयी उसे पाने के लिए। अब बारी थी हमारे मिलने की … हमने एक जगह और समय प्लान किया और इंतज़ार करने लगे उस दिन का जिस दिन हमें मिलना था। वो दिन भी आ गया और हम मिले.
वो मिलना मेरी ज़िंदगी का सबसे खास लम्हा बन गया.
हुआ यूं कि जैसे ही उसने मुझे देखा वो दौड़ कर आई और मेरे गले लग गयी जैसे वो बरसों से मुझे जानती हो और ऐसे ज़ोर से लिपटी कि करीब दस मिनट तक वो ऐसे ही रही.
मैंने महसूस किया कि उसकी पकड़ थोड़ी ज़्यादा ही टाइट थी और साँसें उखड़ी और मदहोश! हम फिर अलग हुए और फिर एक रेस्तौरेंट में चले गए। उस दिन वो क्या कयामत लग रही थी; उसने उस दिन स्लीवलेस ब्लू कलर का फ्रॉक और उसी से मैचिंग सारी चीजें पहनी हुई थी। एक तो गोरा बदन और उस पर नीला ड्रेस, नीली आँखें, नीला सैंडल, नीला ब्रेसलेट और एक और बात उसने अपने बाल के कुछ हिस्से भी नीले रंग से कलर कराये थे, पूरी की पूरी क़ातिल लग रही थी वो उस दिन! जो भी उसे देखता बस देखता ही रह जाता। उस दिन उसे देखकर मुझे पहली बार यह महसूस हुआ कि यही वो सपना है जिसे मैं आज तक ढूंढ रहा था और आखिरकार भगवान ने मुझे आज इसे दे ही दिया। काफी देर हम एक दूसरे से बातें करते रहे और फिर मुझे लगा जैसे अब कहीं वो जाने के लिए न बोल दे.
तो मैंने उसे कहा- चलो मूवी देखते हैं.
उसने घड़ी देखी, अभी शाम के 5:30 हो रहे थे; उसने कहा- मूवी देखने में कोई प्रोब्लम नहीं है.
पर मुझे मूवी देखना पसंद नहीं है.
लेकिन हाँ अगर तुम कहो तो कहीं पार्टी करते हैं। मैंने आश्चर्यचकित भाव से उससे पूछा- कहाँ? “तुम यहाँ अकेले रहते हो या किसी के साथ?” उसने पूछा.
“नहीं मैं अकेला रहता हूँ लेकिन मेरे घर पर लड़कियों को लाने का पर्मिशन नहीं है।” मैंने जवाब दिया। वो थोड़ा सा मुस्कुराई और बोली- तुम्हें मेरे फ्लॅट पे चलने में तो कोई दिक्कत नहीं है? या किसी से पर्मिशन तो नहीं लेनी? और बहुत ज़ोर से हंसी। मैं झेंप कर रह गया। उसने कहा- चलो मेरे घर पे चलते हैं, वहीं पे पार्टी करेंगे और खूब मजे करेंगे। मैं एक बात यहाँ आप को बता दूँ कि हमने अपना मिलना ऐसे दिन फिक्स किया था कि हम दोनों का साप्ताहिक अवकाश था उस दिन और उसके एक दिन बाद भी। आपको बता दूँ कि बहुराष्ट्रीय कम्पनी में 2 दिन का साप्ताहिक अवकाश होता. है। “तुम्हें रात में मेरे घर पे रुकने में कोई परेशानी तो नहीं है?” उसने फिर मुझसे पूछा। मैंने नहीं में उसको जवाब दिया और हम निकल गए उसके घर के लिए। रास्ते में हमने खाने पीने का ढेर सारा समान लिया और. फिर उसके घर जाने के लिए हमने ऑटो लिया और चल दिये अपनी मंज़िल की तरफ। मैंने उससे पूछा- तुम ड्रिंक करती हो? उसने ना में जवाब दिया। लेकिन दूसरे ही पल उसने कहा- आज ट्राई करूँ क्या? “तुम ड्रिंक करते हो?”. उसने पूछा। मैंने कहा- मैं केवल बीयर पीता हूँ.
तो उसने कहा- ठीक है, फिर आज बीयर ले चलते हैं.
अगर मैं नहीं पी पायी तो तुम पी लेना। मुझे उसकी बात अच्छी लगी और मैंने ऑटो को एक वाइन शॉप पे रुकने को कहा। मैंने जाकर वहाँ से 2 बीयर और एक रेड वाइन की बोतल ले ली और ऑटो में आकर बैठ गया। कुछ ही देर में हम उसके घर पहुँचे.
क्या घर था उसका जहाँ रहती थी वो … एकदम आलीशान। उसने वो पूरा घर ही किराए पर ले रखा था.
खैर उसका घर कुछ यूँ था कि घर में घुसते ही एक छोटा कमरा जहाँ शू रेक था; उसके बाद एक बड़ा सा ड्राईंग रूम जहाँ से तीन तरफ का रास्ता था, एक बेडरूम का, एक रसोई का और एक स्टोररूम का। घर में घुसते ही एक सीढ़ी ऊपर जाती थी। हम घर में गए.
ड्राईंगरूम में एक बड़ा सा सोफा लगा था, उस पर जाकर बैठ गए.
फिर कुछ देर बाद उपासना उठी और सारा समान फ्रिज में और रसोई में सेट किया और फिर दोनों के लिए पानी और चाय बना कर लायी.
मैंने पूछा- तुम इतने बड़े घर में अकेले रहती हो, तुम्हें डर नहीं लगता? उसने कहा- नहीं, डर कैसा? बल्कि मुझे तो यहाँ अकेले रहने में मज़ा आता है.
जैसे पूरे घर में मैं अकेली और सब कुछ मेरा, जैसे जी चाहे रहो, जब जो जी चाहे करो; कोई रोकने वाला नहीं, कोई टोकने वाला नहीं। मैं तो उसके इस उत्तर से एक पल के लिए स्तब्ध रह गया और उसको एकटक देखने लगा। उसने कहा- क्या हुआ? मैं कुछ नहीं बोला। फिर उसने बताया- मेरी फॅमिली बहुत बड़ी है और जब कोई मुझसे मिलने आता है घर से तो उसके साथ काफी लोग आते हैं तो 1 या 2 रूम कम पड़ते है इसलिए मैंने बंगला ही किराए पर ले लिया। अब तक हम चाय खत्म कर चुके थे, फिर वो उठी और बर्तन रसोई में रख आई और बोली- मैं चेंज कर के आती हूँ। करीब बीस मिनट बाद वो आई। एक दम अलग लग रही थी मैं तो सोचने लगा कि इसके कितने रंग हैं; जब भी मिलती है एक नए रंग के साथ। इस वक़्त वो एक गाउन में थी हलके. नारंगी रंग के और पूरी की पूरी सजी हुई … जैसे उसे किसी पार्टी में जाना हो.
मैंने उसे पूछा- ये क्या है? तो उसने कहा- क्यों पार्टी नहीं करनी क्या? मैंने कहा- हाँ करनी तो है लेकिन उसके लिए इतना सजने की क्या ज़रूरत है? हम कहीं जा थोड़े ही रहे हैं, घर पे ही तो पार्टी करनी है। वो हंसी और कहा- पार्टी कहीं भी हो, फील पूरी पार्टी वाली ही आनी चाहिए। उस वक़्त उसे देख कर मैं तो अपना आपा ही खोने लगा था.
खैर कैसे भी मैंने अपने आप को संभाला और कहा- फिर मेजबान और मेहमान दोनों तैयार हैं तो शुरू करें पार्टी? उसने कहा- यहाँ नहीं। “फिर कहाँ, कहीं और चलना है क्या?” मैंने पूछा.
कहानी जारी रहेगी.
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स्रोत:इंटरनेट