. पर अगर वो चाहते तो मुझे भी पटा सकते थे.
कहाँ एक 24 साल जवान लड़की, और कहाँ एक 45 साल की औरत। अब क्योंकि मैंने तो अपनी माँ को कई बार कपड़े बदलते और वैसे भी नंगी देखा है, बेशक वो मुझसे भी ज़्यादा तंदरुस्त हैं, मुझसे भी ज़्यादा भरवां जिस्म है उनका, मगर लड़की और औरत में फर्क तो होता ही है। या हो सकता है कि अरविंद सर को पके हुये आम चूसने ज़्यादा पसंद हों। खैर जो हो गया, सो हो गया! अब अगर माँ इतने आराम से बैठी अरविंद सर का लंड चूस रही थी तो साफ बात है अरविंद सर ने माँ को छोड़ा तो नहीं होगा, चुदाई तो वो कर ही चुके होंगे। उसके बाद सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था कि एक दिन अरविंद सर ने फोन करके मुझे अपने घर बुलाया। मैं उनके घर गई, तो वो अपने लैपटाप पे कुछ काम कर रहे थे। मैं जाकर बड़ी बेतकल्लुफ़ी से उनके सामने बैठ गई। कुछ देर बाद उन्होंने अपने लैपटाप से नजर उठाई और मेरी तरफ देख कर बोले- अरे तुम कब आई, पता ही नहीं चला? मैंने कहा- मैं तो कब से आई सर, आपने ध्यान नहीं दिया। वो बोले- हाँ मुझे ध्यान देना चाहिए था, एक छोटी सी गलती कभी कभी खतरनाक हो सकती है। मुझे कुछ कुछ समझ तो आने लगा था मगर मैंने फिर भी पूछा- क्या गलती सर? उन्होंने अपना चश्मा उतारा और बोले- देखो ऋतु, मैं तुमसे एक ज़रूरी बात करना चाहता हूँ। मगर ये बात हम दोनों के बीच में ही रहनी चाहिए। मैंने कहा- ठीक है सर। उन्होंने अपना हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ाया और बोले- प्रोमिस। मैंने भी हाथ मिला कर कह दिया- प्रोमिस। वो बोले- तो एक बात बताना सच सच? मैंने सर हिलाया। वो बोले- ऋतु, क्या उस दिन तुम मेरे घर आई थी। मैं समझ गई कि सर को पता चल चुका है, तो मैंने अपनी सभी तरह की भावनाओं को दबाते हुये कहा- जी सर। उन्होंने पूछा- तो तुमने क्या कुछ देखा? मैंने फिर हाँ में सर हिलाया। “क्या देखा?” सर ने पूछा। अब मैं क्या बताती कि सर मैंने अपनी माँ को आपका लंड चूसते देखा है। नहीं न … तो मैं चुप ही रही और सर झुका कर बैठ गई। सर बोले- ऋतु, तुम अब बड़ी हो गई हो, मैं समझता हूँ कि तुम अब समझती हो तो मुझे तुम्हें सब कुछ बता देना चाहिए। मैं चुप रही तो उन्होंने आगे कहना शुरू किया- दरअसल ये सब सिलसिला पिछले साल शुरू हुआ था, मैं नहीं जानता क्यूँ शुरू हुआ। बस उस दिन तुम्हारी माँ हमारे घर खीर देने आई थी और तुम्हारी आंटी 4-5 दिन अपने मायके गई हुई थी.
तो घर में अकेला होने की वजह से मैं खुद से ही खेल रहा था कि अचानक सामने से तुम्हारी माँ आ गई। और ना जाने ये सब कैसे हुआ, मगर अगले ही पल उसका सर मेरी गोद में था और वो दीवानों की तरह मुझे खा गई। मैंने भी उसे नहीं रोका.
जब हमारा जोश ठंडा हुआ तो हम वो सब कुछ कर चुके थे जो हमारे बीच नहीं होना चाहिए था। सर चुप हुये तो मैंने कहा- सर, मैंने तो आपसे कोई सफाई नहीं मांगी। वो बोले- मैं तुम्हें सफाई नहीं दे रहा … मगर मैं नहीं चाहता कि तुम मुझे या अपनी माँ को गलत समझो, बस कभी कभी न चाहते हुये भी कुछ बातें हो जाया करती हैं। मैंने कहा- मानती हूँ सर … कि कभी कभी कुछ बातें हो जाया करती हैं, मगर क्या यह ज़रूरी है कि जो गलती एक बार हो गई, उसे बार बार दोहराया जाए? वो बोले- तुम ठीक कहती हो.
मगर दिक्कत यह है कि माफ करना … मुझे ये बात कहनी पड़ रही है, मगर तुम्हारी माँ तुम्हारे पापा से खुश नहीं है। अब जब हम दोनों एक दूसरे के बहुत करीब आ चुके हैं, तो मुझे उसने बताया कि वर्मा जी तो 2-3 मिनट मुश्किल से टिक पाते हैं। जब मैंने यह सुना तो मुझे माँ की हालत अपने जैसे लगी। कैसे मैं भी अपने बॉयफ्रेंड से असंतुष्ट रहने के बाद किसी और के नीचे लेट गई थी.
तो अगर माँ ने अपनी संतुष्टि किसी गैर मर्द में ढूँढी तो क्या गलत किया। मुझे तो लगा के माँ ने जो किया, सही किया। मगर उस दिन के बाद मेरे और अरविंद सर के रिश्ते और भी मधुर हो गए। मैं उन्हें बिल्कुल अपने पापा की तरह ही प्यार करने लगी, उनसे ज़िद करके चीज़ें मांग लेती, अपनी माँ से भी मेरा लगाव और बढ़ गया। शायद अरविंद सर ने माँ को बता दिया होगा कि ऋतु ने हमें देख लिया था और अब वो भी इस रिश्ते से नाराज़ नहीं है, बल्कि खुश है। माँ भी मुझे बहुत प्यार करने लगी। ऐसे ही चलता रहा, अरविंद सर और मैं एक दूसरे को खूब प्यार करते, मैं अक्सर बेटी की तरह उनसे चिपक जाती, उनसे बेटी की तरह ही प्यार करती, हालांकि हम दोनों ने कभी एक दूसरे को बाप या बेटी वाले नामों से बुलाया था, मैं उनको सर और वो मुझे ऋतु ही कहते। मगर फिर भी एक गहरा और प्यारा रिश्ता हम दोनों के बीच में बन गया था। कहानी जारी रहेगी.
[email protected] कहानी का अगला भाग: माँ का यार, मेरा प्यार-2
स्रोत:इंटरनेट