. उसके बाद जब लड़की का चढ़ाव होने लगा, तो मैं मम्मी लोगों के पास ही बैठ गई, जहां सब लेडीज बैठी थीं.
उस समय मेरे पास मेरी फ्रैंड सोनम भी बैठी थी.
उसी के बड़ी बहन की शादी हो रही थी.
फिर से उसी लड़के ने मेरे पास आकर मुझे और सबको चाय दी.
दो मिनट बाद फिर से चाय लेकर आया और बोला- एक कप और पीजिए … अच्छी चाय है.
मैंने ले ली, फिर 5 मिनट बाद आया और एक कप चाय पीने को बोला.
मैं बोली- अब नहीं पियूंगी.
तो बोला- थोड़ी थोड़ी ठंड है, चाय पी लीजिए.
मैंने फिर से चाय ले ली.
जब वह चला गया, तो सोनम बोली- ये मेरा भाई है और साला खातिरदारी तेरी कर रहा है.
वैसे यह अच्छा लड़का है.
मैंने पूछा- तेरा भाई कैसे है सोनम? मुझे तो कभी दिखा नहीं.
तब वह बोली- मेरी बीच वाली बुआ का लड़का है, पॉलिटेक्निक कर रहा है.
पढ़ने में बहुत अच्छा है.
शहर से पॉलिटेक्निक कर रहा है, आगे चलकर इंजीनियर बनेगा.
सोनम की बात से मैं उसके लिए इंप्रेस हुई कि कोई गांव का ऐसा वैसा ठुर्रा नहीं है, शहर में पढ़ने वाला लड़का है.
पर मैं सोनम से उसका नाम नहीं पूछ पाई.
थोड़ी देर बाद वह सामने फिर बैठ गया और मुझे फिर से एकटक देखने लगा.
मैं जब भी उसकी तरफ देखती, तो मेरी आंखें उसकी आंखों से लड़ जातीं.
मैंने भी बचपना कर ही डाला.
मैंने सोची कि बहुत घूर रहा है मुझे, अब मैं भी देखती हूं इसकी तरफ … और नजरें नहीं हटाऊंगी, कैसे नहीं मानेगा.
मैंने तुरंत उस लड़के की तरफ देखा और अपनी आंखें उसकी आंखों में डाल दीं.
मैं बिना पलक झपकाये उसकी तरफ देखने लगी.
करीब तीन मिनट हो गए, वह एकटक बिना पलक झपकाए, मुझे देखता रहा.
मैं भी बिना पलक झपकाए उसकी आंखों में आंखें डाले रही.
मैं भी जिद में थी.
मुझे करीब पांच मिनट से ज्यादा हो गए बिना पलक झपकाये, मेरी आंखें भर आईं, पर उस लड़के ने पलक नहीं झपकाईं.
अंत में मुझे ही पलक झपकानी पड़ी और मैं उससे हार गई.
उसके बाद जाने मुझे क्या हुआ कि मैं भी उसे बार बार देखने लगी … और वह तो मेरी तरफ बस देखे ही जा रहा था.
पहली बार बाली उमर में मुझे एक अलग सी फीलिंग होनी शुरू हो गई.
इस फीलिंग के बारे में मुझे कुछ नहीं पता.
वह लड़का उठ कर वहां से चला गया, तो करीब एक घंटे तक नहीं आया.
उसके न आने से पता नहीं मुझे अजीब सा लगा.
मेरा उसको देखने का मन किया.
क्योंकि मुझे अपने आप बेचैनी सी लगी.
फिर मैं अपने आप उठी और जैसे चलने को हुई, तो मम्मी बोलीं- कहां जा रही है? मैं बोली- यहीं आस-पास हूं.
मम्मी थोड़ा टहल लूं, पैर दर्द करने लगे हैं.
मम्मी बोलीं- ठीक है, घूम आ.
तभी मैं बाहर की तरफ निकली.
काफी भीड़ थी, सब जगह बाराती घराती भरे थे.
गांव की शादी थी, तो अलग ही माहौल था.
तभी अचानक पीछे से आवाज आई- हैलो! मैंने सर घुमाया तो फिर से बोल गूँजे- हैलो! मैंने पीछे मुड़कर देखा, तो वही लड़का था.
वो बोला- तुम कहां जा रही हो? मैं पहली बार उसे सामने पाकर देख कर घबरा गई.
मैं बोली- कहीं नहीं … बस ऐसे ही टहल रही हूं.
मुझे उसने अपना नाम बताया.
वो बोला- मेरा नाम आशीष है, यहां जिसकी शादी हो रही है, वह मेरी मामा की बेटी है.
उसने मुझसे मेरा नाम पूछा- तुम अपना नाम बताओ … क्या नाम है तुम्हारा? मैंने उससे बोला कि मैं क्यों बताऊं तुम्हें अपना नाम … नहीं बताऊंगी.
उसने बोला- प्लीज बता दो! मैं चुप रही तो उसने आगे कहा- मैं सागर से पॉलिटेक्निक कर रहा हूं.
अभी दो-चार दिन यहीं मामा के यहां रहूंगा.
मैं बोली- ठीक है … अब मैं जाती हूं.
मैं चली आई, आकर बैठ गई.
कुछ पल बाद वो फिर से आ गया.
इस बार वो मेरे सहित सभी को खाने के लिए बोलने आया था.
सभी लेडीज उधर खाने को बैठ गईं.
यह गांव हैं.
यहां बैठकर खाने की व्यवस्था थी, तो जहां मैं बैठी थी, आशीष हर सामान मीठा खीर सब मेरी थाली पर ज्यादा ज्यादा डाल रहा था.
उसके इस तरह से मेरा ख्याल रखने से मुझे वह अब अपने आप अच्छा लगने लगा.
थोड़ी देर बाद जब मैं सीढ़ियों के पास खड़ी हुई तो फिर से आया, वो बोला- प्लीज अपना नाम बता दो, नहीं तो मैं खाना नहीं खाऊंगा.
मैं बोली- मत खाओ, मुझे क्या … मेरा कोई नाम नहीं है.
तो बोला- प्लीज बता दो.
मैंने नहीं बताया और फिर वहीं जाकर बैठ गई.
अब करीब रात के 2:00 बज रहे थे.
शादी होनी शुरू हो गई.
मम्मी बोलीं- हम लोग जा रहे हैं, चलो तुम्हें भी चलना हो तो चलो.
मेरी सहेली सोनम मेरी मम्मी से बोली- चाची बंध्या यहीं रहेगी मेरे साथ.
ये विदा के बाद आएगी, आप चली जाओ.
मम्मी लोग घर चली गईं.
अब मैं वहां रुक गई, तो फिर से आशीष मेरे सामने बैठ गया और मुझे उसी तरह से एकटक देखने लगा.
मैं भी बीच बीच में चुपके से देखती और उससे निगाहें मिल जातीं.
अब फिर से एक बार मैंने सोची कि देखती हूं … इस बार इसे ही पलक झपकाना पड़ेगा.
मैं तो ना झपकाऊंगी.
अब मैंने उस लड़के आशीष की आंखों में आंखें मिला दीं और एकटक देखने लगी.
वह भी उसी तरह बिना पलक झपकाये देखे जा रहा था.
करीब तीन चार मिनट बाद जाने मुझे क्या होने लगा, मुझे खुद नहीं पता, पर उसकी आंखों में आंखें डालने से मेरे बदन में गर्मी आ गयी और हल्की ठंडी के बावजूद पसीना-पसीना होने लगी.
इस बार करीब दस मिनट आंखें लड़ी रहीं और उसको किसी ने बुलाया तब उसने पलक झपका कर पीछे देखा और उठकर चला गया.
मेरे पहले प्यार की सच्ची कहानी को अपना प्यार जरूर दीजियेगा.
मुझे आपकी मेल का इन्तजार रहेगा.
[email protected] कहानी जारी है.
स्रोत:इंटरनेट