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मेरी प्रेयसी और मैं दो बदन एक जान 1

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मेरी प्रेयसी और मैं दो बदन एक जान 1 1

. यह खेल हम दोनों का तब तक चला जब तक मीता की शादी न हो गयी.
लेकिन हम दोनों को एक दूसरे की आदत हो गयी थी और हमें इस सबसे बाहर आना था तो हम दोनों ने शादी के एक दिन पहले मिलने का फैसला किया कि कुछ निर्णय लेकर हम दोनों एक नए रास्ते पर निकलेंगे.
उस दिन मीता शादी की खरीददारी के लिये शहर आयी हुई थी तो अपने उसी कमरे पर रुकी थी जो कि हमारे मिलने का एक ठिकाना था.
मैं घर पहुँचा और कॉलबेल बजायी.
दरवाजा मीता ने ही खोला और मुझे देख वो कातिल लेकिन एक अधूरी प्यास वाली मुस्कान के साथ मुस्कुराई- आओ अंदर! कहकर उसने मुझे अंदर बुलाया और फिर किचन से ट्रे पर एक ग्लास पानी भरकर लाई और मेरे सामने खड़ी हो गयी.
लेकिन क्योंकि तब तक मैं सोफे पर बैठ चुका था तो मेरी नज़र सीधे उसकी पतली खमदार कमर चिकने पेट और अधखुली साड़ी में से झांकती रसीली गहरी नाभिकूप पर पड़ी.
यह नाभिकूप मेरी कमजोरी थी और मैं फिर आज इसके सामने हार गया.
शिल्पा शेट्टी की मादक नाभि से भी ज्यादा मादक और नशीली और मुंह खोले लहरदार मछली की भांति नाभि का मुंह भी खुला हुआ था जो मुझे उसे चूमने को फिर उकसाने लगा.
और फिर पानी तो मैंने किनारे रखा और कमर के कटावों पर अपने हाथ को रखकर होंठों पर अपने जलते होंठ रख दिये और गहरी और गोल नाभि में अपनी उंगली डाल कर सहला दी और रसभरे होंठों को एक गहरा चुम्बन अंकित कर दिया.
“रुको न … तुम तो आते ही शुरू हो गए? बस यही काम रह गया क्या मुझसे? सिर्फ चोदियेगा ही … या कुछ बातें भी करेंगे हम?” “बातें तो हो जाएगी लेकिन पहले यह आग तो बुझे मीता जी!” यह कहकर मैंने दोनों उभारों को कस कर थाम लिया और नीचे झुकने लगा.
मेरे हाथों ने साड़ी को तब तक निकल फेंका था और हम जंगलियों जैसे एक दूसरे में समाने को आतुर हो गाए थे.
और फिर मैं झुका और कमर को हाथों से थामकर मीता की गहरी नाभि पर एक गहरा चुम्बन अंकित कर दिया.
“आआआह … इस्सससी ई!” गहरी और मदभरी सीत्कार न चाहते हुए भी मीता के होंठों से फूट पड़ी और उसने अपने हाथों से मेरा सर जोर से अपने चिकने पेट से कसकर चिपका लिया और इसी के साथ मेरे पूरे होंठ गहरी नाभिकूप में जा समाया. और मेरी जीभ और होंठों ने नाभितल को चूसना और चाटना शुरू कर दिया.
नाभि पर प्यार पर इस तरह का मेरा ये अनूठा ही तरीका था जो मीता को कामातुर कर देता और न चाहते हुए भी वो बिस्तर पर मेरी अंकशायिनी बनने को आतुर हो जाती थी- उफ़्फ़ … इस्सस्स … आआआह … सीईईईई! बस करो जान! कहते हुए मीता धीरे से घूम गयी पीछे की ओर और मेरे होंठ भी इसी के साथ पतली खमदार चिकनी कमर को चूमते हुए पीठ और मादक पिछवाड़े पर आ टिके.
अब मैंने अपने हाथ सामने गहरी नाभि को सहलाते हुए साये की डोरी को तलाशा और उसे खींच दिया.
साया भरभरा कर नीचे की ओर फिसल पड़ा और अब मेरे होंठ चिकने चूतड़ों पर थे और हाथ पतली कमर को सहलाते हुए नाभिकूप को उंगलियों की सहायता से चोद रहे थे.
मेरी उंगली लन्ड की तरह नाभि के भीतर से बाहर तक चोट कर रही थी.
“उफ़्फ़ … आआआह … रहने दो यार … न करो ये सब अब!” कहकर सिसकारी भरती हुई मीता मुझसे एक हाथ दूर जा कर खड़ी हो गयी.
“क्या हुआ … नाराज हो गयी क्या तुम? सॉरी यार … तुम्हें देखकर खुद को कभी भी रोक नहीं पाता!” “नहीं, सॉरी न कहो! मगर अब ये सब गलत होगा न? तुम्ही बोलो?” मीता उसी अवस्था में मेरे पास आकर सोफे पर बैठती हुई बोली.
“अब तुम इस तरह मेरे पास बैठोगी तो तुम्हें क्या लगता है कि कब तक मैं शांत बैठ पाऊंगा? बोलो?” “अहाहा … काबू रखो खुद पर … समझे!” जैसे मीता आज मुझे चैलेंज कर रही थी कि ‘मैं तो यूं ही बैठूँगी और देखती हूँ कब तक कंट्रोल करते हो खुद को!’ बस फिर मैंने भी खेलने की आज ठान ही ली थी.
“आज जो करोगे सब ऊपर ऊपर से ही … अंदर कुछ नहीं!” “ठीक है मीत, जब तक तुम खुद न बोलोगी, हम खूंटा नहीं गाड़ेंगे!” इतना कहकर मैंने मीता की कमर के कटावों को हाथों में थामकर उसके होंठों को चूम लिया और उसे गोदी में उठाकर पलंग पर ले आया.
“अरे ये चीटिंग है … पलंग पर क्यों ले आये मुझे? मतलब नहीं मानोगे?” मीता बनावटी नाराजगी से बोली.
“अरे मैं तुम्हारी इज़ाज़त के बिना कुछ न करूँगा बस!” “हाँ, फिर ठीक है!” कहकर उसने मेरे गले में अपनी बांहें डाल दी और मैंने भी दोनों उभारों को ब्लाउज के ऊपर से दबाकर किनारों से खुले उरोजों की घाटी पे अपने होंठ रख दिये.
“इसस्स … उफ्फ्फ … आआह!” उरोजों को किनारों से सहलाते हुए मैंने अपने होंठों को एक स्तन की गुलाबी नोक पर रखा और अपने दांतों से उन्हें कुरेदने लगा और इसी वक्त मेरा दूसरा हाथ दूसरे उरोज को हल्के हल्के मसलने लगा था.
उफ्फ … क्या आनन्द था! मेरी मीता के यौवनकलश आज भी सम्पूर्ण गोलाई के साथ गुब्बारे के सदृश कठोर और मुलायम दोनों गुणों के साथ मेरे जेहन में छा गए थे.
और फिर दोनों उभारों को थामकर मैं मसलने लगा.
“उफ्फ इसीई … आआह! धीरे करो न … दुखता है! रुको … ये पहले ही दर्द करते हैं!” मैंने मीता की आँखों में आँखें डालकर शरारती मुस्कान बिखेरी.
“अच्छा … तो अब आपके ईमान मुझे ठीक नहीं लग रहे! मेरी साड़ी आपने उतार ही दी है और मेरी चूत को भी ना के बराबर के कपड़ों का ही सहारा है.
और आपका लन्ड लगातार मेरी चूत के दरवाजों को तलाशता हुआ ही लग रहा है.
” “लेकिन आज न तो आपका लन्ड कामयाब हो पायेगा … न ही मेरी चूत उसे अपने भीतर समाने देगी! देख लेना … आप चाहे मुझे कितना ही जला लें! मेरी वासना की आग को आप कितना भी भड़का दो पर आज न चुदूँगी मैं आपसे! देख लेना!” मीता ने अपनी बड़ी बड़ी कजरारी. आँखें मटकाते हुए मुझे चैलेंज किया.
लेखक के आग्रह पर इमेल आईडी नहीं दिया जा रहा है.
क्रमशः कहानी का अगला भाग: मेरी प्रेयसी और मैं: दो बदन एक जान-2
स्रोत:इंटरनेट