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मेरी सच्ची अमर प्रेम कहानी

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मेरी सच्ची अमर प्रेम कहानी 1

. धीरे धीरे वो अपने मुँह में जितना लंड ले सकती थी उतना अंदर लेकर अंदर बाहर करने लगी। फिर मैंने उसको उठाकर अपने सीने से लगाया। एक तरह से ये मेरा उसको धन्यवाद था कि उसने मेरा लंड मुँह में लेकर मुझे. कितनी ख़ुशी दी थी। फिर मैंने उसको बेड पर उल्टा लिटा दिया और उसकी सम्पूर्ण पीठ पर चुम्बन करने लगा.
धीरे धीरे मेरे होंठ और जीभ ने उसके नितम्बों पर कब्ज़ा कर लिया.
वो गुदगुदी से सिहर उठी और सीधी हो गयी। इतनी देर का फोरप्ले बहुत था, मैंने अब ज्यादा देर करना ठीक नहीं समझा और तुरंत कंडोम निकाल कर अपने लंड पर चढ़ा लिया। उसकी चूत पर मैंने सरसों का तेल काफी अंदर तक लगा दिया। इसके बाद मैं उसके ऊपर आया और लंड को सही जगह सेट करके अंदर डालने लगा। अभी मेरा सिर्फ अग्र भाग ही अंदर गया था कि वो दर्द और घबराहट कि मिलीजुली प्रतिक्रिया के साथ मुझे हटाने की कोशिश करने लगी। मैं उसी पोजीशन में रुक कर उसको प्यार करने. लगा, उसको दुलारने लगा, उसके बालों में हाथ फिराने लगा, उसके कानों में किस करने लगा, उसकी चूचियों को दबाने लगा, उसको भरोसा दिलाने लगा कि मैं उससे कितना प्यार करता हूँ। इससे उसकी घबराहट कुछ कम हुई.
इसी बीच में मैंने अपने लंड को थोड़ा और अंदर खसका दिया था। लेकिन अब भी लंड आधा ही गया था और हम दोनों ही ठण्ड के मौसम में भी पूरी तरह पसीने पसीने हो गए थे। वो बार बार यही बोल रही थी- मुझे दर्द हो रहा है, मेरी सहेली मेरा इंतजार कर रही होगी, मुझे घर जल्दी पहुंचना है.
कहीं मेरे अब्बू मुझसे पहले घर पहुंच गए तो मेरी शामत आ जाएगी। मैंने उसको ढांढस बंधाया और इसी बीच आधे घुसे लंड से ही आगे पीछे करता रहा। मैंने उसको कहा कि वो अपनी दोनों टांगों से मेरी कमर को बाँध ले.
उसने ऐसा ही किया। इससे दो फायदे हुए एक तो उसकी चूत थोड़ा और खुल गयी और मुझे धक्के लगाने में आसानी होने लगी। सरसों का तेल अंदर तक लगाने से लुब्रिकेंट की कोई कमी नहीं थी। धीरे धीरे मेरा पूरा लंड उसकी चूत में एडजस्ट हो गया। इस पोजीशन में लगभग दस मिनट हम लोग करते रहे। हम दोनों पसीने से भीग चुके थे। उसने थोड़ा पानी माँगा। उसके अंदर अब और. हिम्मत नहीं हो रही थी किन्तु मेरा अभी शांत नहीं हुआ था। मैंने उसे पानी पिलाया, वो कपड़े पहनने की ज़िद करने लगी तो मैंने उसे समझाया कि अच्छा ठीक अभी कुछ देर कुछ नहीं करते हैं.
लेकिन कपड़े मत पहनो, ऐसे ही थोड़ी देर बैठते हैं। वो मान गयी। कभी मैंने उससे वादा लिया था कि जब भी करेंगे तो तुम मेरे ऊपर बैठकर सेक्स करने वाली पोजीशन में जरूर करोगी। मैंने उसे वो वादा याद दिलाया। वो मुस्कुराने लगी और कहा- तुम. बहुत शरारती हो। फिर वो मुझे प्यार करने के लिए मेरे ऊपर आयी। हालाँकि इस पोजीशन में दर्द होना स्वाभाविक था, किन्तु मेरे प्यार और वादे के आगे वो सब सह रही थी, ये भी जानती थी कि हम फिर कभी नहीं मिल पाएंगे। उसने मेरे लंड को पकड़ कर अपनी चूत पर सेट किया और नीचे बैठने लगी, किन्तु वो इतनी आसानी से नहीं जाने वाला था, वही हुआ। उसने फिर से प्रयास किया तो इस बार थोड़ा सा गया किन्तु उसके हिम्मत और प्यार की दाद देनी पड़ेगी.
वो सब कुछ सहते हुए भी सिर्फ मेरे लिए ये सब कर रही थी। एक बार जब वो नीचे की तरफ दबा रही थी, तभी मैंने उसके नितम्बों को पकड़ कर नीचे से ऊपर धक्का दे दिया और लंड पूरा अंदर … वो दर्द के मारे चीख उठी। मैंने तुरंत उसे अपने ऊपर लिटा लिया और उसे पागलों की तरह चूमने लगा और साथ ही लंड को अंदर बाहर करने लगा। इसके बाद मैंने उसको बेड पर बैठा दिया और बैठे बैठे ही मेरी गोद में बैठकर करने के. लिए कहा। इस पोजीशन में वो अपनी चूत को मेरे लंड पर सेट करती हुई मेरी गोद में बैठ गयी। इस पोजीशन का फायदा यह होता है कि लंड एकदम अंदर तक जाता है। गोद में बैठ कर करते हुए जब वो थक गयी तो मैंने उसे लेट. जाने के लिए कहा किन्तु इस तरह कि लंड निकलने न पाए। वो लेट गयी तो मैं भी पैर पीछे की तरफ ले जाकर उसके ऊपर आ गया और एक बार फिर हमारी ताबड़तोड़ चुदाई शुरू हो गयी। हल्का दर्द उसको अब भी हो रहा था। मैंने. उसको दिलासा दिया- बाबू बस और पांच मिनट में मेरा हो जायेगा। मैं अभी तक एक भी बार नहीं झड़ा था। वो अब तक पता नहीं कितनी बार झड़ चुकी थी। जब मेरा समय नजदीक आया तो मैंने उसकी टांगों को सीधा करा दिया और कस. कस के धक्के लगाने शुरू किये। हम दोनों साथ में झड़े … उसकी दर्द और आनन्द की मिश्रित आवाज निकल पड़ी। एक घंटा हमारा बीत चुका था, उसकी सहेली के कई फ़ोन भी इस बीच आ चुके थे। हम दोनों ने कपड़े पहने। उसकी टांगों में दर्द था। मैंने उसके लिए एक सोने की अंगूठी ली थी जो उसे सरप्राइज देनी थी। मैंने वो अंगूठी निकाल कर घुटनों के बल बैठ कर उसको वो अंगूठी पहनाई। मैंने उससे कहा कि हम नहीं मिलेंगे लेकिन ये निशानी. हमेशा तुम्हारे साथ रहेगी। उसको वो अंगूठी बहुत पसंद आयी। फिर मैं उसे कार में बिठा कर उसकी सहेली के पास ले गया, कुछ देर हम लोग पार्क में घूमे। फिर उन दोनों को बस में बैठा कर मैं वापस आवास पर आकर गाड़ी खड़ी की फिर ऑफिस चला गया। हम दोनों ऊपर वाले के शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने हमें ये मौका दिया था, नहीं तो हम लोग कभी भी नहीं मिल पाते। हम लोग अब कभी नहीं मिल पाएंगे। यहहमारी पहली और आखिरी मुलाकात थी। आशा है आप लोगों को मेरी यह सच्ची कहानी पसंद आएगी। अगर कहानी लिखने में कोई त्रुटि हुई हो तो क्षमा कीजियेगा। आप लोग मेरे ईमेल [email protected] पर फीडबैक दे सकते हैं।.
स्रोत:इंटरनेट