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मेरी सहेली मेरे ग्रैंडफादर से चुद गयी 2

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मेरी सहेली मेरे ग्रैंडफादर से चुद गयी 2 1

. अब दादाजी की नींद टूटी और उन्होंने अपनी आंखें खोलीं.
सोनल को सामने देख उन्हें आश्चर्य हुआ, पर उनके नींद से जगने पर सोनल को कुछ भी फर्क नहीं पड़ा.
सोनल का हाथ अपने लंड पर देखकर उन्होंने अपनी आंखें बड़ी की, पर उन्होंने उसके हाथ को अपने लंड से हटाया नहीं.
उल्टा उन्होंने उसे स्टूल पर से उठाया और बेड पर अपने पास बिठा लिया.
सोनल मेरी और पीठ करके बैठी थी और उसका पूरा ध्यान दादाजी के लंड पर था.
दादाजी का हाथ लगातार सोनल की पीठ सहला रहा था, तो सोनल का हाथ दादाजी का लंड सहला रहा था.
दादाजी ने अपना हाथ सोनल की पीठ से सीने पर ले गए और उसके कड़क स्तन को जोर से मसल दिया.
“आह … धीरे …” सोनल इतना ही बोली और नीचे झुक गई.
उसके होंठ अब दादाजी के लंड के एक इंच नजदीक आ गए थे.
सोनल की जीभ उसके होंठों से बाहर निकली और दादाजी के लंड के सुपारे पर घूमने लगी.
दादाजी ने ही अपने दोनों हाथ सोनल के गाउन के ऊपर से ही दोनों स्तनों पर रखे और उनको मसलने लगे.
वैसे सोनल ने दादाजी का लंड छोड़ा और उठकर अपना गाउन उतार दिया.
अब वह दादाजी के सामने बिल्कुल नंगी खड़ी थी, ब्रा पैंटी तो मेरे बेड पर ही पड़ी थी.
उसका जवान नंगा बदन देख कर दादाजी की आंखों में चमक आ गई.
उन्होंने सोनल को फिर से बेड पर बिठाया.
अब सोनल दादाजी की तरफ मुँह कर के बैठ गयी, दादाजी ने उसके नंगे चुचों को हाथों में पकड़ कर मसलने लगे और सोनल भी उनके सीने पर के सफेद बालों में उंगलियां घुमाने लगी.
दादाजी अपना हाथ उसकी गर्दन के पीछे ले गए और सोनल के सिर को अपनी तरफ खींचा.
सोनल के गुलाबी होंठ अपने होंठों पर रखकर उसका रसपान करने लगे.
कुछ देर तक किस करने के बाद दादाजी ने सोनल के सिर को छोड़ा, खुद खड़े हुए और सोनल को बेड पर लिटाकर खुद स्टूल पर बैठ गए.
अपने हाथ सोनल की जांघों पर रख कर उसकी जांघें खोल दीं.
दादाजी की उंगलियां अब सोनल की टांगों पर घूमने लगीं, फिर धीरे धीरे जांघों पर जा पहुँची.
उसकी त्रिकोणीय खजाने पर उगे छोटे छोटे बालों में उंगलियां घुमाने में उनको बहुत मजा आ रहा था और वही मजा उनके चेहरे पर भी झलक रहा था.
जैसे ही दादाजी ने उंगली सोनल की चूत पर रखी, तो सोनल ने अपनी कमर को नीचे से उठा दी.
दादाजी ने अपने अंगूठे और उंगली से सोनल की चूत की पंखुड़ियां खोलीं, तो सोनल की चूत का दाना उनके सामने आ गया.
सोनल की खुलती बंद होती चूत को दादाजी ने अपनी एक हाथों की उंगलियों से खोल कर रखा था और दूसरा हाथ उसकी चूत की तरफ बढ़ा दिया.
उसकी चुत के दाने को दादा जी ने उंगलियों से सिर्फ स्पर्श किया और अचानक ही सोनल की कमर उछल पड़ी.
दादाजी ने उसकी कमर को जोर से पकड़ कर उसके दाने को मींजना चालू कर दिया.
बाहर यह सब देखकर मेरी हालत खराब हो रही थी, मैं गाउन पर से ही मेरी चुत को सहला रही थी.
बीच बीच में गाउन ऊपर कर के चुत के अन्दर उंगली करती पर.
फिर से गाउन नीचे कर देती … ये सोच कर कि न जाने कब दोनों में से किसी की नजर मुझ पर पड़ जाए.
दादाजी ने सोनल के दाने को छेड़ती हुई उंगली को अपने मुँह में डाली और गीली की, फिर उस उंगली को सोनल की चूत में घुसानी शुरू कर दी.
धीरे धीरे अन्दर घुसाते हुए आधी उंगली, फिर धीरे धीरे पूरी उंगली सोनल की चूत के अन्दर पेल दी.
अब दादाजी अपनी उंगली उसके चुत के अन्दर बाहर करने लगे, सोनल भी नीचे से कमर हिलाते हुए अपनी चुत दादाजी की उंगली से चुदवाने लगी.
जब उसकी चुत से पानी निकालने लगा, तो दादाजी ने दूसरे हाथ की उंगली पर वह पानी लिया और उस उंगली को चाटने लगे.
फिर दादा जी ने अपनी दूसरी उंगली को उसकी बुर में पेलना जारी रखा.
कुछ देर उनका खेल ऐसे ही चलता रहा, लेकिन फिर सोनल उत्तेजना के चरम पर पहुंच गयी और अपनी दोनों टांगें भींच कर झड़ने लगी.
दादाजी ने उसका पूरा रस निकाल दिया था.
दादाजी का तना हुआ लंड अभी भी मेरी नजरों के सामने था, मुझे तो यकीन नहीं हो रहा था कि इस उमर में भी किसी का लंड खड़ा हो सकता था और वह भी इतना कड़क.
उनके लंड के ऊपर की टोपी तो बहुत ही बड़ी थी, मैं उनके लंड को देख ही रही थी.
तभी वे अपनी जगह से उठे और सोनल के पास जाकर लेट गए.
अब सोनल की बारी थी, सोनल ने अपना हाथ उनके लंड पर रखा और उसके साथ खेलने लगी.
उनका खड़ा हुआ लंड देखकर वह बहुत ही उत्तेजित हो गई थी, उसकी नजरें अभी भी दादाजी के किसी बड़े आंवले के जैसे सुपारे पर ही टिकी हुई थीं.
सोनल अब दादाजी के पेट पर सर रख कर सो गई, उसका मुँह दादाजी के लंड की तरफ ही था.
उसने आगे बढ़कर दादाजी के लंड पर अपनी जीभ घुमाई, तो दादाजी के लंड में हुई थरथराहट मुझे बाहर तक दिखाई दी.
धीरे धीरे सोनल के होंठ दादाजी के लंड को आगोश में लेना शुरू कर दिया और लंड को चूसने लगी.
उधर बाहर मैं अपना गाउन ऊपर उठा कर मेरे चुत के दाने को ज़ोरों से घिसना शुरू कर दिया था.
अन्दर सोनल को दादाजी के सुपारे को मुँह में लेकर चूसते देख कर उत्तेजना से मेरी आंखें बंद होने लगी थीं.
जब मेरी आंखें खुलीं, तब तक तो सोनल ने दादाजी के लंड को पूरा का पूरा अपने मुँह में ले लिया था.
दादाजी भी नीचे से धक्के दे करके सोनल का मुँह चोद रहे थे.
सोनल ने अब उनका लंड अपने मुँह से बाहर निकाल लिया था.
फिर वो उनके ऊपर चढ़ते हुए अपनी चुत दादाजी के लंड के ऊपर ले आयी.
उसका मुँह दादाजी की तरफ था, उनकी आंखों में देखते हुए उसने एक हाथ से उनके लंड को अपनी चुत की दरार पर रखा और उनके लंड पर बैठ गई.
चार पांच बार ऊपर नीचे करने के बाद आखिरकार दादाजी का पूरा लंड सोनल की चूत के अन्दर चला गया.
अब सोनल की उठक बैठक की कसरत शुरू हो गयी.
पूरे कमरे में उनकी सिसकियों की आवाजें गूंज रही थीं.
सोनल के कमर के हिलने की स्पीड बढ़ती जा रही थी, जोर ज़ोर से उसके नितम्ब दादाजी के बदन पर टकरा रहे थे.
कुछ देर ऐसे ही तूफानी चुदाई करने के बाद वह अचानक से रुक गई, शायद दादाजी का पानी सोनल की चूत में ही गिर गया था और सोनल भी उसी वक्त झड गयी थी.
सोनल अब आगे झुक कर दादाजी के सीने पर गिर गई.
कुछ देर बाद सोनल ने अपना मुँह ऊपर उठाया और अपने होंठ दादाजी के होंठों पर रख दिये.
थोड़ी देर चूमने के बाद सोनल दादाजी के ऊपर से उठी और अपने कपड़े पहनने लगी.
मैंने घड़ी में देखा तो रात के साढ़े चार बजे थे, मैं भी दबे पांव वहां से निकल कर अपने रूम में आकर सो गई.
मैंने जो भी देखा था, मुझे उस पर विश्वास नहीं हो रहा था … पर सब सच था.
थोड़ी देर बाद सोनल भी रूम में आ गयी, दरवाजे की कुंडी लगाकर बेड पर आकर फिर से मेरी बांहों में आकर सो गई.
दोस्तो, मेरे ग्रैंडफादर की सेक्स कहानी कैसी लगी, मुझे मेल करके बता देना.
मेरा मेल आईडी है.
[email protected]
स्रोत:इंटरनेट