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मेरे सामने वाली खिड़की में 1

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मेरे सामने वाली खिड़की में 1 1

. कुछ देर बाद कार का शीशा नीचे उतरा और एक खूबसूरत लड़की ने मुझे मेरे नाम से पुकारा.
मैंने देखा तो वो रेवती थी.
रेवती ने मुझे अपनी कार में आने का इशारा किया तो मैं कार के पास जाकर खड़ा हो गया.
रेवती ने कहा- कहां जा रहे हैं सरस.. और इतने परेशान क्यों लग रहे हैं? आज बैंक नहीं गए क्या? मैंने रेवती को उत्तर देते हुए उससे पूछा- मेरी तबियत थोड़ी खराब है, इस वजह से बैंक से जल्दी आ गया हूं.. और बस का इंतजार कर रहा हूं, लेकिन आप यहां कैसे? “मैं अपने कॉलेज से आ रही हूं.
आइए मेरे साथ चलिए, मैं आपको छोड़ देती हूं.
” मेरी तबियत भी खराब थी.. इसलिए मैंने धन्यवाद देते हुए रेवती का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.
लगभग आधे घंटे का रास्ता था, लेकिन मैं अभी अपने आप को संभालने में व्यस्त था.
थोड़ी दूर चलने के बाद मैंने रेवती से कार रोकने के लिए कहा और जैसे ही रेवती ने कार रोकी, मैंने कार से उतर कर बाहर की तरफ भागते हुए वोमिट कर दिया.
रेवती मेरी हालत देख कर चौंक गई, उसने गाड़ी से पानी निकाला.
मैंने अपने आप को ठीक किया और रेवती को एक बार फिर से धन्यवाद दिया तथा उनको हुई परेशानी के लिए माफी मांगी.
रेवती ने मेरा हाथ पकड़कर मेरी तबियत का मुआयना किया तो उसने पाया कि मुझे बुखार था.
अब वो घर जाने की बजाए मुझे हॉस्पिटल ले जाने लगी, जिसके लिए मैंने मना किया.. पर वो नहीं मानी.
हॉस्पिटल से निकल कर रेवती मुझे सीधा अपने घर ले गई और कहने लगी- आप अकेले रहते हैं और आपकी देखभाल करने के लिए कोई भी नहीं है.
बेहतर होगा आप तबियत ठीक होने तक हमारे साथ रहें.
रेवती के मम्मी पापा भी मुझे रुकने के लिए कहने लगे.
शायद रेवती ने बैंक में मेरे द्वारा की गई मदद सबको बता रखी थी, तो सभी मेरी सेवा में लग गए.
मुझे ये सब देखकर थोड़ा अजीब लग रहा था और मैं बार बार उन्हें कह रहा था कि मैं ठीक हूं, थोड़ी देर सो लेने के बाद अच्छा फील करूंगा.
रेवती ने मुझे दवाई लाकर दी, जिसे खाकर मुझे नींद आ गई.
जब मेरी नींद खुली तो रात के आठ बज रहे थे.
मैंने रेवती को बुलाकर उससे जाने की इजाजत मांगी तो उसने अपनी मम्मी को बता दिया कि सरस जाने की कह रहे हैं.
रेवती की मम्मी ने कहा- आपकी तबियत ठीक हो जाए तो आप चले जाना, अभी खाना खा कर आराम कर लीजिए.
मैंने कहा- ठीक है.
कुछ देर बाद रेवती खाना लेकर आ गई और मुझे अपने हाथों से खाना खिलाने लगी.
ये एक बहुत ही अजीब सा अहसास था दोस्तो.
उसके हाथ से खिलाया गया एक एक निवाला मुझे बीमारी से दूर और उसके करीब लाता जा रहा था.
कभी कभी हम दोनों एक दूसरे की तरफ देखते और वो मुस्कुरा जाती.
मैं उसकी आंखों में देखने लगा, जिनमें एक अजीब सा आकर्षण था.. जो मुझे उसकी ओर खींच रहा था.
खाना खाकर मैं बिस्तर में लेट गया और रेवती झूठे बर्तन लेकर चली गई.
थोड़ी देर बाद मैं जब वाशरूम जाने के लिए कमरे से बाहर निकला तो मैंने देखा कि रेवती अपने कमरे में अकेले बैठकर उसी थाली में खाना खा रही थी, जिसमें उसने मुझे खिलाया था.
इस नजारे ने मुझे चौंका दिया और मैं अपने कमरे में वापस आ गया.
बिस्तर पर लेटे लेटे रेवती के बारे में सोचते हुए कब मुझे नींद आ गई पता ही नहीं लगा.
अगली सुबह जब मैं जगा तो अपने आप को स्वस्थ महसूस किया.
जब मैं घर आने के लिए निकल रहा था तो रेवती बोली- सरस, आज तो रविवार है आपकी छुट्टी भी होगी, तो आप आराम से फ्रेश होकर खाना खाकर चले जाना.
रेवती की मम्मी भी मुझसे रुकने के लिए कहने लगी, तो मैंने कहा कि मेरी वजह से आप पहले ही काफी परेशान हो चुके हैं.
अब मैं आपकी वजह से स्वस्थ हूं.. तो मुझे इजाजत दीजिए.
रेवती के पापा बोले- आपने उस दिन रेवती को पैसे दिलवाकर हमारी अनजाने में जो मदद की थी, उसके सामने ये सब कुछ भी नहीं है सरस जी.
मैंने कहा- ऐसी कोई बात नहीं है, वो मेरे काम का एक हिस्सा था.
अब रेवती के पापा और उसकी छोटी बहन भी मुझे रुकने के लिए कहने लगी.
मैंने रेवती की तरफ देखा तो उसकी आंखों में मुझे रोकने के लिए एक अजीब सा अनुरोध था.
मैं रेवती के अनुरोध को ठुकरा नहीं सका और मैं रुक गया.
खाना बनने तक मैंने और रेवती के पापा ने ढेर सारी बातें की.
दोपहर तक खाना बन गया और मैं खाना खाकर अपने फ्लैट में वापस आकर सो गया.
शाम को रेवती मेरे फ्लैट पर आई और मेरी तबियत के बारे में पूछने लगी.
“मैं ठीक हूं..” कहते हुए उसके द्वारा किए गए फेवर के लिए मैंने उसे ‘थैंक यू..’ बोला.
“मुझे थैंक यू मत बोला करो सरस.. मुझे अच्छा नहीं लगता.
” रेवती बोली.
रेवती मेरे कमरे में अस्त व्यस्त पड़े सामान को जमाते हुए बोली- कितना गन्दा रखते हो कमरे को.
शादी कर लो तो इस परेशानी से निजात मिल जाएगी.
मैंने रेवती की तरफ देखते हुए कहा- शादी करने के लिए कोई आपके जैसी खूबसूरत लड़की भी तो मिले.
यह सुनकर रेवती तकिये के कवर को हाथ में लिए खड़ी की खड़ी रह गई और मुझे देखने लगी.
निगाहों से उसके द्वारा मेरी तरफ फेंके गए सवालों के जाल को अपनी निगाहों के जवाब से सुलझाते हुए मैंने हामी भरी.
रेवती मुस्कुराते हुए बोली- आपका और मेरा कोई मेल नहीं है.
हम चाहें तो भी एक नहीं हो सकते.
और वो अपने काम में लग गई.
थोड़ी देर बाद उसने मुझे आवाज लगाई- सरस, जरा इधर आओ.
मैं रेवती के पास गया तो मुझसे बोली- ये खिड़की हमेशा खुली रखा करो.
“क्यों?” मैंने पूछा.
“वो जो सामने वाली खिड़की है.
ना वो मेरे कमरे की है.
” यह कहकर रेवती चुप हो गई और अपने घर चली गई.
कहानी जारी रहेगी मेरे दोस्तो.
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सरसचंद्र मेरा फेसबुक आईडी है.
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स्रोत:इंटरनेट