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वासना का मस्त खेल 12

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वासना का मस्त खेल 12 1

. सुलेखा भाभी की जीभ व होंठ को चूसते हुए मैं जोरों से धक्के लगाने लगा था जिससे भाभी‌ की सिसकारियां भी और तेज हो गईं‌‌ और उनके दोनों हाथ भी अपने‌ आप ही मेरी पीठ पर आकर रेंगने लगे‌.
कुछ देर सुलेखा भाभी की जीभ का स्वाद लेने‌ के बाद मैंने उनकी जीभ को छोड़ दिया और अपनी जीभ को‌ उनके मुँह में घुसा दिया.
भाभी तो जैसे इसके लिए तैयार ही बैठी थीं, उन्होंने तुरन्त ही अपना मुँह खोलकर मेरी जीभ को अपने मुँह में भर लिया और उसे जोर से चूसने‌ लगीं.
सुलेखा भाभी को जल्दी से शिखर तक पहुंचाने के लिए मैं अब उन पर तीन तरफ‌ से हमला करने लगा, एक तरफ मेरा मूसल लंड उनकी चुत को उधेड़ रहा था, तो दूसरी तरफ मेरे होंठ उनको तपा रहे थे और अब तीसरी तरफ से मैंने उनकी चूचियों को भी मसलना शुरू कर दिया, जिससे भाभी अब कोयल के जैसे कूकने लगीं.
उनके पैर अब मेरी जांघों तक चढ़ गए और जोरों से सिसकारियां भरते हुए उन्होंने अब खुद भी नीचे से धक्के लगाने शुरू‌ कर दिए.
सुलेखा भाभी का ये साथ पाते ही मैंने भी बहुत जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए, जिससे उनकी सिसकारियां और भी तेज हो गईं.
उन्होंने मेरे होंठों को तो अब छोड़ दिया और दोनों हाथों से मेरी पीठ को पकड़कर जल्दी जल्दी अपनी कमर को उचकाते हुए मुँह से ‘इईईई … इश्श्शश … आआ … अह्ह्ह्हह …’ की आवाजें निकालने लगीं.
मुझे अब समझते देर नहीं लगी‌ कि सुलेखा भाभी भी अब अपने चरम के करीब ही हैं इसलिए मैं भी अब अपने सीने को ऊपर उठाकर अपने हाथों के बल हो गया और अपनी‌ पूरी ताकत व तेजी से धक्के लगाने लगा.
अब तो सुलेखा भाभी जैसे पागल ही हो गयी थीं, वो जोरों से अपनी कमर को उचकाते हुए मुँह से बड़ी कामुकता से ‘इईईई … श्श्शशश … आआ … अह्ह्ह्हह …’ की किलकारियां सी मारने लगीं.
एक बार फिर से सुलेखा भाभी की किलकारीयों के साथ साथ कमरे में ‘फट … फट् ट …’ की आवाजें गूंजने लगीं.
इस वक्त जितनी तेजी से भाभी अपनी कमर को उचका रही थीं, मैं उनसे दुगनी तेजी से धक्के लगा कर अपने लंड से उनकी चुत की धज्जियां सी उड़ा रहा था.
हम दोनों के ही शरीर अब पसीने से नहा गए और सांसें उखड़ने लगीं.
सुलेखा भाभी का तो एक बार रस स्खलित हो गया था, मगर मैं अपने आप पर बहुत देर से संयम किये हुए था.
मेरा सब्र का बाँध तो कब का टूट जाता, मगर मैं तो बस इसलिए ही रुका हुआ था कि एक बार फिर सुलेखा भाभी को उनके अंजाम तक पहुंचा दूँ.
आखिरकार मेरी कोशिश रंग लाई और कुछ ही देर बाद भाभी का बदन अब फिर से अकड़ने लगा … मेरा सब्र भी अब टूट ही गया था, इसलिए मैंने भी अब तीन चार ही धक्के अपने पूरे वेग से लगाये और सुलेखा भाभी को कस कर पकड़ लिया.
भाभी की सिसकारियां अब पहले तो आहों में बदल गईं.
उनकी आहें हिचकियों में बदलती चली गईं.
मैंने और सुलेखा भाभी ने अब एक दूसरे को जोरों से भींच लिया और हल्के हल्के धक्के लगाते हुए एक दूसरे के यौन अंगों‌ को अपने अपने प्रेमरस से सींचने लगे‌.
इस बार सुलेखा भाभी का स्खलन इतना उत्तेजक था कि हिचकियां लेते हुए एक बार तो वो सांस लेना भी भूल गईं.
उनकी चुत की दीवारों के प्रसार और संकुचन को मैं काफी देर तक अपने लंड पर महसूस करता रहा.
अपनी अपनी कामनाओं को एकदूसरे पर उड़ेलकर हम दोनों ही अब एक दूसरे को बांहों में लिए लिए ही ढेर होकर बिस्तर पर गिर गए और लम्बी लम्बी सांसें लेने लगे.
कुछ देर तो हम दोनों ऐसे ही एक दूसरे की बांहों में समाये पड़े रहे.
फिर सुलेखा भाभी ने मेरी पीठ को थपथपाकर मुझे उठने का इशारा सा किया.
मेरा अब भी उठने का दिल नहीं कर रहा था.
‘ऊऊ … क्या है? कुछ देर और लेटी रहो ना …’ सुलेखा भाभी पर पड़े पड़े ही मैंने कुनमुनाते हुए कहा.
‘ऊह … अह्ह … उठो ना … बहुत गर्मी‌ लग रही है.
’ सुलेखा भाभी ने मेरे गालों को चूमते हुए कहा.
पसीने से हम दोनों के‌ ही बदन भीगे हुए थे जिससे शायद सुलेखा भाभी को दिक्कत हो रही थी.
इसलिए मैं अब धीरे से उठकर भाभी के पास बैठ गया.
मगर तभी मेरी नजर अनायास ही उनकी चुत पर चली गयी जिसमें से मेरे व उनके प्रेमरस का‌ बिल्कुल क्रीम जैसा गाढ़ा और सफेद‌ मिश्रण धीरे धीरे बहते हुए बाहर निकल रहा था.
मिश्रित रस उनकी चुत के मुँह से निकलकर उनके नितम्बों की गहराई में समा‌ रहा था.
मेरे लिए तो ये बेहद ही अनूठा और उत्तेजक सा दृश्य था, जिसे मैं टकटकी लगाये बस देखता रह गया था.
तभी शायद सुलेखा भाभी की नजर मुझ पर चली गयी.
शर्म के मारे उन्होंने अब तुरन्त ही अपनी साड़ी व पेटीकोट से अपनी चुत को छुपा लिया और उठकर बिस्तर पर बैठ गईं.
बिस्तर पर बैठकर सुलेखा भाभी ने अब पास में ही पड़ी हुई अपनी पेंटी को उठा लिया और अपना मुँह दूसरी तरफ करके उस पेंटी से अपनी चुत व नितम्बों को साफ करने लगीं.
मैं अब भी बैठे बैठ सुलेखा भाभी को ही देख रहा था.
अपनी चुत व नितम्बों को अच्छे से साफ‌ करने‌ के‌ बाद भाभी ने‌ पेंटी को‌ तो वापस बिस्तर पर पटक दिया और उठकर अपने‌ कपड़ों को सही करने लगीं.
मैं नहीं चाहता था कि सुलेखा भाभी अपने कपड़ों को ठीक करें, इसलिए मैंने उनका‌ हाथ पकड़कर फिर से अपनी तरफ खींच लिया.
“ऊह्ह … छ छोड़ … अब क्या है?” सुलेखा भाभी ने कसमसाते हुए कहा.
“इतनी जल्दी कहां जा रही हो?” मैंने सुलेखा भाभी को अपनी बांहों में भरकर उनके मखमली गालों को चूमते हुए कहा.
“बस्स … अब … एक बार में तो ऐसी हालत कर दी कि अभी तक बदन दुख रहा है … मेरी हिम्मत नहीं है अब … बाकी की दवाई अब तुम‌ उन दोनों से ही ले लेना …” सुलेखा भाभी ने‌ ताना सा मारते हुए कहा और मेरे पास से उठकर फिर से अपने कपड़े ठीक करने लगीं.
सुलेखा भाभी‌ का‌ ‘उन दोनों’ से मतलब नेहा और प्रिया से था.
यानि‌ कि‌ सुलेखा भाभी‌ को‌ भी अब नेहा और प्रिया के साथ ये सब करने से कोई ऐतराज नहीं था.
इसका मतलब मेरी तो अब निकल पड़ी थी.
खैर अपने कपड़े सही करने‌ के बाद सुलेखा‌ भाभी ने हम दोनों के‌ प्रेमरस से भीगी उस पेंटी को बिस्तर से उठाकर अपने‌ ब्लाऊज में छुपा‌ लिया और फिर धीरे से कमरे का दरवाजा खोलकर पहले तो‌ इधर उधर देखा और फिर झटके में कमरे से बाहर. निकल गईं.
सुलेखा‌ भाभी के‌ जाने‌ के बाद मैंने भी अब अपने‌ कपड़े‌ पहन‌ लिए और फिर से बिस्तर पर ढेर हो गया.
मगर कुछ देर बाद ही प्रिया मेरे कमरे में आ गयी.
कमरे में आते ही उसने लगातार तीन चार थप्पड़ मेरे गालों पर लगा दिए.
“अब तू ये क्या कर रहा है? नेहा दीदी तो ठीक हैं … मगर मम्मी? मम्मी को भी नहीं छोड़ा तुमने?” प्रिया ने गुस्से से तमतमाते हुए कहा.
एक बार तो अब मैं भी घबरा गया कि इसको‌ कैसे पता चल गया कि मेरे और सुलेखा भाभी के बीच कुछ हुआ है.
मैंने दरवाजा तो बन्द किया हुआ था मगर शायद प्रिया ने हमें खिड़की से देख लिया था.
भाभी को चोदते वक्त एक दो बार मुझे लगा भी था कि शायद खिड़की से कोई हमें देख रहा है, मगर सुलेखा भाभी के साथ मस्ती के चक्कर में मैंने ही ध्यान नहीं दिया था.
खैर मैंने अब जल्दी से खुद को सम्भाला और उसे सारी कहानी बताई, तब जाकर उसका गुस्सा कुछ शांत हुआ.
प्रिया के कमरे से बाहर जाने के कुछ देर बाद ही नेहा मेरे पास आ गयी … उसने मेरी पिटाई तो नहीं की, मगर उसका भी यही सवाल था.
प्रिया के जैसे ही नेहा को भी मुझे अब सारी बात बतानी पड़ी … तब जाकर वो मानी.
चलो‌ मेरे लिए ये तो अच्छा ही हो गया‌ था‌ कि नेहा और प्रिया को भी सुलेखा भाभी के बारे में मालूम हो‌ गया‌ था.
इससे मेरा काम‌ अब और भी आसान‌ हो गया‌ था क्योंकि अब प्रिया नेहा और सुलेखा भाभी तीनों को ही‌ एक‌ दूसरे के‌ बारे में मालूम हो गया था कि उनके मेरे साथ चुदाई के सम्बन्ध हैं‌ और तीनों को‌ ही‌ इससे शायद कोई‌ ऐतराज भी नहीं था.
इससे हुआ ये कि अब रोजाना ही मेरे सुलेखा भाभी, नेहा और प्रिया के साथ सम्बन्ध बनने शुरू हो गए.
मेरी तो‌ जैसे अब निकल‌ ही‌ पड़ी थी क्योंकि अब दिन में सुलेखा भाभी मेरे साथ रहतीं, तो रात में नेहा व प्रिया एक एक कर बारी बारी से मेरे पास आ जाती थीं.
बस अब उन तीनों को एक साथ एक ही बिस्तर पर चोदने की तमन्ना बाकी रह गई थी.
ये भी पूरी हो ही जाएगी.
जैसे ही उन तीनों की एक साथ चुदाई की कहानी बनेगी मैं आप सबके साथ सेक्स स्टोरी को साझा करूँगा.
मेरी कहानी आपको कैसी लगी, प्लीज़ मेल जरूर कीजिएगा.
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स्रोत:इंटरनेट