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साठा पे पाठा मेरे चाचा ससुर 1

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साठा पे पाठा मेरे चाचा ससुर 1 1

. और जब शाम को 6 बजे पति घर आते तो उनसे ज़्यादा मैं तत्पर रहती चुदाई के लिए। कभी कभी तो पहले से ही नंगी हो जाती कि कपड़े उतारने में भी समय बर्बाद न हो। मेरे पति भी कहते- साली बड़ी चुदासी हो रही है, इतनी भी क्या आग लगी है तेरी चूत में? मैं कहती- शादी से पहले कोई मिला नहीं, अब 25 साल की जल रही आग को आप ही तो ठंडी करोगे, अब बातें बंद और बस शुरू हो जाओ! मैंने कभी अपने पति को ये कहने के मौका नहीं दिया ‘अरे यार, थोड़ा सा लंड ही चूस लो।‘ मैं हमेशा उनके कहने से पहले ही मैं उनका लंड चूसने लग पड़ती थी। वो भी मेरी चूत को चबा जाने की हद तक चाटते थे। बहुत बार मैं उनके मुँह में झड़ जाती। शादी के करीब एक साल बाद इनको प्रमोशन मिला और अब सीनियर स्केल में ऑफिसर बन गए, जिस कारण इनका घर आने के कोई समय ही नहीं रहा। सुबह 9 बजे जाते तो कभी रात को 8 बजे, कभी 9 बजे कभी 10 बजे आते। मेरे तो सारे अरमान ही अधूरे रह गए। अक्सर शाम को मैं तैयार हो कर रहती और इनका फोन आ जाता कि आज लेट आऊँगा। मैं तड़प के रह जाती। कभी कभी तो अकेले ही खाना पड़ता। मगर फिर भी मैंने खुद को कंट्रोल किया, अपने आप को संभाला। क्योंकि तब तक मैंने अपने पति के अलावा किसी और गैर मर्द की तरफ देखा तक नहीं था। कभी कभी दिल में विचार भी आया कि पड़ोस के चोपड़ा भाई साहब भी बहुत हैंडसम हैं, मगर ऐसा करती तो हो सकता है सारे मोहल्ले में बदनाम हो जाती। इसलिए अपने आप को काबू में रखती। दिन में अक्सर मैं चोपड़ा जी के घर चली जाती, उनकी बीवी मेरी बहुत अच्छी दोस्त थी, चोपड़ा जी भी अपने बिजनेस के सिलसिले में बाहर होते। मैं सुबह नाश्ता बना कर, चाचा जी को नाश्ता करवा कर तैयार हो कर चोपड़ा जी घर जाती और फिर घंटा डेढ़ घंटा उनसे गप्पे मार कर अपने घर आती और फिर दोपहर का खाना बनाती। इतनी देर में मेरे पीछे से हमारी काम वाली आती और घर के सारे काम कर जाती। ऐसे ही एक. दिन मैं चोपड़ा भाभी के घर बैठी थी, तो भाई साहब का फोन आ गया कि उन्होंने बाहर कहीं जाना था, तो मैं वापिस अपने घर आ गई। घर में अंदर दाखिल हुई और किचन में गई, अभी तो बर्तन भी साफ नहीं हुये थे, झाड़ू पोंछे का काम भी अभी अधूरा था। मैंने सोचा ‘लगता आज रजनी आई नहीं’ तो मैंने उसे फोन लगाया। उसने फोन उठाया, मैंने पूछा- रजनी कहाँ हो? वो उधर से बोली- दीदी, मैं तो आपके घर में हूँ, झाड़ू लगा रही हूँ। मुझे बड़ा गुस्सा आया कि मुझसे झूठ बोल रही है, मैं किचन से बाहर आई तो देखा झाड़ू पोंछा सब हाल में पड़ा था, और उधर से रजनी ने फोन भी काट दिया। मेरे गुस्से की कोई सीमा नहीं रही, मैं अभी दोबारा उसे फोन करने ही वाली थी, तभी मुझे चाचा जी के रूम से उनके बोलने की आवाज़ आई। मैं सोचने लगी, अगर झाड़ू पोंछा बाहर है तो रजनी अंदर क्या कर रही है। मेरे मन में शंका सी पैदा हुई तो मैं चुपके से चाचा के रूम के दरवाजे के पास गई। दरवाजा बंद तो नहीं था, तो मैंने दरवाजे के साथ कान लगा कर सुना, मुझे दोनों के हंसने की आवाज़ आई। पहले भी चाचाजी रजनी से बात करते थे, मगर आज उनकी हंसी कुछ अलग सी थी। मैंने बड़े धीरे से दरवाजा खोला और थोड़ा सा खोल कर अंदर झाँक कर देखा, अंदर तो जैसे आग लगी पड़ी थी, चाचाजी अपने बेड पर बिल्कुल नंगे लेटे थे, मोटा, लंबा काला लंड और रजनी अपनी सारी साड़ी ऊपर अपने पेट के पास पकड़ कर चाचा जी के पेट पर चढ़ी बैठी थी, और चाचाजी का लंड पकड़ कर अपनी चूत पर सेट कर रही थी.
और अगले ही पल चाचाजी का लंड उसकी चूत में घुस गया और जैसे जैसे वो नीचे को बैठती जा रही थी, उसकी चूत चाचाजी का लंड निगलती जा रही थी। और ये लो… वो तो चाचाजी का सारा लंड खा गई… फिर लगी ऊपर नीचे होने। मैं बाहर खड़ी उस दादा पोती की उम्र लोगों की काम लीला देख रही थी। मैं तो खुद सेक्स की हर वक़्त भूखी रहती थी, तो ये कैसे संभव था कि ये दृश्य मुझ पर असर न करता। मेरा हाथ अपने आप मेरी चूत तक चला गया। अंदर रजनी चाचा जी से चुदवा रही थी और दरवाजे के बाहर खड़ी मैं चाचाजी के लंड की दीवानी हो रही थी कि इस उम्र में भी चाचाजी में क्या दम था। रजनी के गोरे चूतड़ों. में चाचाजी का काला लंड अंदर बाहर जाने लगा। रजनी की चूत भी पानी छोड़ रही थी, जिस वजह से चाचाजी का लंड भीगा हुआ था। कहानी जारी रहेगी.
[email protected] कहानी का अगला भाग: साठा पे पाठा मेरे चाचा ससुर-2
स्रोत:इंटरनेट