. उस दिन के बाद रोजाना दिव्या का फोन आता और कुछ देर सामान्य बातें होती तथा बाकी समय उसकी रचना के बारे में बातें होती रहती। लगभग तीन सप्ताह के बाद दिव्या ने उसके द्वारा लिखी रचना को मेरे पास भेजा और. उसे पढ़ कर मैंने उससे बहुत से स्पष्टीकरण मांगें तथा कुछ सुझाव भी दिए। दो सप्ताह के बाद दिव्या ने मेरे द्वारा पूछे गये स्पष्टीकरण के उत्तर भेजे तथा मेरे सुझावों के अनुसार उस रचना में बदलाव करके भेजा।. दिव्या द्वारा भेजी गयी अपक्व पांडुलिपि में भाषा एवम् व्याकरण का सुधार, त्रुटियों को सम्पादित तथा घटना के विवरण को क्रमानुसार करने के पश्चात उभर कर आई निम्नलिखित रचना आपके लिए प्रस्तुत है। *** अन्तर्वासना की पाठिकाओं एवम् पाठकों का हार्दिक अभिनंदन। मेरा नाम दिव्या है और मैं परिवार के निम्नलिखित सदस्यों के साथ भारत के बड़े राज्य में एक बहुत ही छोटे से कस्बे में अपने सास विहीन ससुराल में रहती. हूँ। मेरे परिवार में कुल चार सदस्य हैं मेरे ससुर डॉक्टर अमोल रत्नाकर, मेरे पति आलोक रत्नाकर, मैं दिव्या और मेरा दो वर्षीय पुत्र ध्रुव। मेरे पति के विदेश जाने के बाद पिछले ढाई वर्षों से मैं, मेरा दो वर्षीय पुत्र और तिरेपन वर्षीय ससुर उनके पूर्वजों के पुश्तैनी घर में ही रह रही हूँ। इस छोटे से कस्बे के मध्य में से गुज़रते राष्ट्रीय राजमार्ग पर हमारी एक पैतृक इमारत है जिसके भूतल में चार दुकानें हैं. और ऊपर के तल पर हमारा घर है। उस इमारत के पहले तल पर बने हमारे घर में एक बैठक एवम् भोजन कक्ष, दो शयन-कक्ष, एक रसोई, एक बाथरूम तथा एक स्टोर है। भूतल में चार दुकानों में से दो दुकानों में मेरे ससुर का दंत चिकित्सा क्लिनिक बना रखा है, तीसरी दुकान एक केमिस्ट को किराये पर दे रखी है और चौथी दुकान खाली पड़ी है। आलोक से मेरा विवाह चार वर्ष पहले हुआ था लेकिन विवाह के तीन माह उपरान्त ही मेरी सास का निधन हो गया तथा इस सास विहीन घर के सभी कार्यों का बोझ मेरे कन्धों पर पड़ गया। सास के स्वर्गवास के बाद अपने पति, ससुर और घर की देख-रेख में इतनी व्यस्त रही कि पता ही नहीं चला कि कब डेढ़ वर्ष बीत गए। मेरे विवाह को जब डेढ़ वर्ष ही हुए थे तब मेरे पति की कंपनी ने उनकी पदोन्नति कर के कंपनी कार्य के लिए तीन वर्षों के लिए विदेश भेज दिया। क्योंकि पति के विदेश जाने के समय मैं तीन माह से गर्भवती थी इसलिए बिलकुल नहीं. चाहती थी कि वे विदेश जाएं, लेकिन उनकी तरक्की एवम् उज्ज्वल भविष्य में बाधा भी नहीं बनना चाहती थी इसलिए उन्हें जाने दिया। पति के विदेश जाने के कुछ दिनों बाद ही दिन भर घर में अकेले रहना मुझे अखरने लगा तथा अपने प्यार से भरपूर जीवन में अचानक अकेलापन आने से बहुत सूनापन महसूस होने लगा। गर्भावस्था की स्थिति में मेरे शरीर में हो रहे बदलाव तथा आंतरिक हलचल को अपने पति की अनुपस्थिति में किसी और के साथ साझा. नहीं कर पाने के कारण मैं खिन्न रहने लगी। मेरे स्वभाव में आए बदलाव को देखकर मेरे ससुर ने मेरी मानसिक स्थिति को भांप लिया और मुझे व्यस्त रखने के लिए उन्होंने घर के साथ उनके क्लिनिक के देखरेख की. ज़िम्मेदारी भी मुझे दे दी। दिन में मैं घर का काम करके जब भी खाली होती तब नीचे क्लिनिक में चली जाती और वहाँ आने वाले रोगियों के पंजीकरण करती तथा उन्हें क्रम अनुसार ससुर जी के पास भेज देती। ससुर जी भी. मेरा बहुत ख्याल रखते और मेरी सभी आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयत्न करते लेकिन मेरे एकाकीपन को दूर करने में अपने आप को हमेशा असमर्थ ही पाते। घर के अथवा क्लिनिक के काम में अपने को व्यस्त रखते हुए मैंने. अपनी गर्भावस्था के बाकी छह माह भी पूरे करे तथा प्रसव का समय करीब आते ही मुझे उसकी चिंता सताने लगी। मैंने अपने पति से बात करी और उन्हें प्रसव के दिनों में मेरे पास आने की विनती करी लेकिन उन्होंने. छुट्टी नहीं मिलने के कारण अपनी असमर्थता बता दी। प्रसव के अनुमानित तिथि से दो दिन पहले जब मैं परीक्षण के लिए ससुर जी के साथ लेडी डॉक्टर के पास गयी तब उसने जांच करने के बाद यह बताया कि बच्चे के पैदा. होने में अभी समय है। मेरी जांच करने के बाद डॉक्टर ने योनि के द्वार को ढीला करने के लिए तीन तरह के व्यायाम एवम् खाने के लिए कुछ औषधियाँ लिख कर दीं तथा घर पर ही आराम करने के लिए कहा। डॉक्टर का घर हमारी. इमारत के साथ वाली चौथी इमारत में था और वह मेरे ससुर जी को बहुत ही अच्छे से जानती थी इसलिए उसने एक सप्ताह बाद फिर दिखाने के लिए कहा। जब ससुर जी ने डॉक्टर से पूछा कि अगर समय असमय आपात स्थिति में क्या. करें तब उसने कह दिया कि तब वह मुझे उसके घर पर भी दिखा सकते हैं। घर वापिस आने के बाद ससुर जी ने मुझे क्लिनिक में काम करने से मना कर दिया और घर पर ही आराम करने के लिए कहा। खाना बनाने एवम् रसोई के काम. तथा घर की सफाई आदि के लिए एक नौकरानी थी जिसे आदेश देकर मैं काम कराती थी इसलिए अधिकतर आराम करने लगी। कहानी जारी रहेगी.
[email protected] कहानी का अगला भाग: सास विहीन घर की बहू की लघु आत्मकथा-2
स्रोत:इंटरनेट