. आयुषी ने आगे कहा- अब मम्मी जी, जरा यह बताइए कि आज के जमाने में भी विर्जिनिटी की क्या वैल्यू है? वो बोलती रही- यह आपका पढ़ा लिखा कंप्यूटर इंजीनियर पुत्र जो पिछले दो महीने से मेरे साथ घूम फिर कर, शादी के मण्डप में मुझे चूम कर अपने आपको आधुनिक साबित करना चाह रहा है, आपका वही बेटा अब सुहागरात को मेरे पास सफ़ेद चादर लेकर आया है! क्या मतलब है इसका? क्या साबित करूं मैं? ये खुद तो वर्जिन है नहीं पर बीवी वर्जिन चाहिये। नलिन भी गुस्से में बोला- जस्ट यू शट अप आयुषी … तुम में जरा भी संस्कार नाम की चीज है या नहीं … क्या ड्रामा कर रही हो यहाँ सबके सामने? तुम्हें यह नहीं पता कि किससे किस तरह की बात करनी. चाहिए? आयुषी- मम्मी, हमेशा ऐसा क्यों होता है कि एक लड़की, एक औरत को ही इन सब दकियानूसी बातों से गुजरना पड़ता है? पुरुष चाहे कितनी भी बार सेक्स कर ले लेकिन वो शतप्रतिशत पाक साफ़ रहेगा.
परन्तु लड़की … हाँ लड़की को तो सुहाग की सेज पर सफ़ेद चादर पर दाग छोड़ना पड़ता है … है न मम्मी जी? पुरुष जीवन भर औरत के बदन पर हुकूमत करता है, वह जो चाहे, कर सकता है … लेकिन क्या एक लड़की अपनी चाहत एक बार भी पूरी नहीं कर सकती? इतने में नलिन की बहन मीता आयुषी के पास आकर उसके कंधे पर अपना हाथ रखते हुए बोली- आप ठीक कह रही हो भाभी! “भाभी … इसको भाभी मत कहो!” नलिन चीखा! मीता- भैया, भाभी की तरह मैं भी वर्जिन नहीं हूँ। मेरा भी एक बॉयफ्रेंड है और मैं अपना कौमार्य उसे दे चुकी हूँ.
मीता की मम्मी बोली- यह क्या कह रही हो मीता तुम? तुम्हारा दिमाग अपने ठिकाने पर है या नहीं? “हाँ मम्मी … मैं भी कुंवारी नहीं हूँ!” मम्मी ने अपना सर पकड़ लिया- हे राम … मैं यह क्या सुन रही हूँ? मीता- मम्मी जी, भैया … तकलीफ हुई ना सुन कर? लेकिन घबराइये मत … मैंने ऐसा कुछ नहीं किया.
मैंने किसी से कोई सेक्स नहीं किया लेकिन मुझे मालूम है कि मेरी कौमार्य झिल्ली टूट चुकी है.
मैं बैडमिंटन खेलती हूँ, योगा करती हूँ, कसरत करती हूँ, बचपन में साइकिल भी चलाती रही हूँ.
ये सब करते वक्त लड़कियों का हाइमन टूट जाना सामान्य है। अब जब मेरी शादी होगी तो मैं खुद को सफ़ेद चादर पर कुंवारी साबित नहीं कर पाऊँगी और मेरा पति भी मुझे इसी तरह से बदचलन समझेगा जैसे अभी मेरा अपना भाई मेरी भाभी को समझ रहा है.
नलिन- मीता … तुम चुप करो … क्या बकवास करे जा रही हो? मीता- भैया, मैं आपको अच्छी तरह से जानती हूँ, आपका चुप रहना ही बेहतर है.
दो एक को तो मैं भी जानती हूँ.
मम्मी- मीता … बेटा … ये सब क्या है … मेरा तो सर चकरा रहा है! “ममा, आपको पता है दुनिया भर की लाखों लड़कियां चाहे वो एथलीट हों या किसी और कारण से अपना योनि पटल खो देती हैं और फिर सफ़ेद चादर वाली परीक्षा में फेल हो जाती हैं, उनका पति उन पर शक करता है और उनका जीवन बर्बाद हो जाता है.
अगर किसी लड़की की सुहागरात पर सफ़ेद चादर पर लाल दाग आ गया तो वह अपने पति की नजर में पवित्र बन जाती है.
पवित्रता का यह दिखावा कब तक चलता रहेगा? बताइए आप कि कब तक यों ही हम लड़कियों को इस आग के दरिया से गुजरना होगा? कब तक लड़कियों को अपने नीचे सफ़ेद चादर बिछाते रहना होगा?” “ममा बताओ ना यह सब कब तक होता रहेगा … आखिर कब तक?” अब आयुषी बोली- असल में पूरी दुनिया में पुरुष नारी को अपना गुलाम समझता रहा है, पुरुष ने कभी नारी की इज्जत करना नहीं सीखा.
पुरुष को तो बस नारी के तन की जरूरत है.
वो तो बस उसकी … मीता- आप सही कहा रही हो भाभी … आयुषी- जिस दिन औरत को मर्द के बराबर हक़ भी मिलने लगेगा तो यह सफ़ेद चादर का सिलसिला भी बंद हो जाएगा.
नलिन गुस्से से पागल हो कर बोला- यह लड़की बेशर्मी की सारी सीमाएं पार कर चुकी है! मम्मी जी इससे कहो कि ये अभी मेरा घर छोड़ दे … चली जाए यहाँ से! मम्मी बोली- बहू कहीं नहीं जायेगी … यह अपनी जगह सही है.
अब वक़्त आ गया है बदलने का सुहाग के बिस्तर पर सफ़ेद की जगह लाल चादर बिछाने का वक़्त आ गया है.
पुरुषों की सोच बदलने का वक़्त आ गया है! नलिन तुम सफ़ेद चादर बिछाना चाहते तो पहले मुझे बताओ कि क्या तुम वर्जिन हो? साबित करोगे? अगर नहीं साबुत कर सकता तो तू इस घर को छोड़ने की सोच … यह घर तेरा नहीं मेरा है … आयुषी को मैं इस घर की लक्ष्मी बना कर लाई हूँ.
ये तो यहीं रहेगी.
स्रोत:इंटरनेट