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मेरा नाम आकाश है.
आरती मेरे साथ पढ़ती थी.
वो तब बहोट ही खूबसूरत हुआ करती थी.
उसने कभी हिस्सा नही लिया, नही तो ब्यूटी क्वीन हो सकती थी.
लेकिन उसकी पढ़ाई पूरी नही हो पाई थी.
इस के लिए उसका साथ छूट गया था.
कई साल बाद मुझे वो रास्ते मे मिल गई.
पहले जैसा नूवर नही था.
उसकी तबीयत ठीक नही लग रही थी.
मैं उसे घर ले गया.
वहाँ उसने मुझे जो sex story in hindi बताई उसे मैं आरती की ज़ुबानी पेश कर रहा हू-
Hindi Sex Story के अन्य भाग-. पार्ट 1. पार्ट 2.
मैं आरती हू.
अभी अभी 24 साल की हुई हू.
दस साल पहले मेरी मां का देहांत हो गया.
उसके डेढ़ साल बाद पिताजी ने दूसरी शादी कर ली.
नई माँ ने कुच्छ ही समय मे अपना रंग दिखाया और ढाई साल मे तो मुझे घर छोड़’ने पर मजबूर कर दिया.
उस वक्त मैं करीब 18 साल की थी.
मुझे पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी.
मैने वो शहर ही छोड़ दिया.
मैं मुंबई आ गयी.
नौकरी की तलाश शुरू की.
जहाँ भी गयी, मुझे नौकरी तो टुरट ही ऑफर होती थी, लेकिन वो मेरी खूबसूरती का जादू था.
कोई कोई तो पहले ही बेझिझक हो कर प्रपोज़ल रखता था, तो कोई इशारों मे समझाने की कोशिश करता था.
लेकिन मतलब एक ही था, मुझे जॉब दे कर वो मेरे रूप को भोगना चाहते थे.
ऐसी करीब बीस ऑफर मिले.
मैने वो सारी ऑफर ठुकरा दी.
एक जगह जहाँ ऐसी बात नही हुई, तो मैने वो जॉब तुरंत ले ली.
लेकिन एक ही वीक मे वोही अनुभव हुआ.
मैने वो भी छोड़ दिया.
एक और मिली तो वहाँ भी बीस दिन ठीक जाने के बाद वही बात हुई.
मैने वो भी छोड़ दिया, लेकिन अब मैं दर गयी थी.
जान चुकी थी की मेरा ही रूप मेरा बैरी बन चुका है.
लोगो पर से और ईश्वर पर से विश्वास उठता जा रहा था.
मन ही मन सोच’ने लगी की शायद यही इस दुनिया का दस्तूर हो.
इसे स्वीकार कर’ने के ख़याल भी मन में आने लगे.
लेकिन तब मेरी किस्मत बदलने वाली थी.
इत्तेफ़ाक़ से मैं एक ऑफीस मे जैसे पहुँची.
बड़ी साफ सुथरी ऑफीस थी.
मेरा इंटरव्यू खुद बड़े सेठ ने लिया.
रघुबीर नाम था उनका.
एकदम साफ इंटरव्यू रहा.
मेरे रूप की और तो जैसे नज़र ही नही थी.
मैं पास हो गयी और मुझे वो जॉब मिल गयी.
सॅलरी भी मेरी ख्वाहिश से दुगनी थी.
यहाँ कोई आल्टू फालतू बात नही होती थी.
बस काम से काम रहता था.
मैं रघुबीर सर की P.
A.
थी.
वो करीब 45 की उमर के थे.
उनके तीन बेटे थे, मझला मेरी उमर का था.
सभी भाइयों मे 2 साल का अंतर था.
वी पढ़ते थे लेकिन कभी कभी ऑफीस आ जया करते थे किसी काम से.
मैं उन सब से परिचित हो गयी थी.
रघुबीर सर की पत्नी पिछले एक साल से बीमार रहा करती थी.
उसे ले कर रघुबीर सर चिंतित भी रहते थे.
कभी कभी मेरे पास भी वी अपनी चिंता व्यक्त करते थे.
उनकी पत्नी के बच’ने के चान्स कम थे.
मुझे रघुबीर सर से हमदर्दी होने लगी थी और शायद…….
प्यार भी.
कच्ची उमरा का पक्का प्यार…….
आख़िर जीवन मे पहली बार कोई ऐसा आदमी मिला था जो संपूर्णा था, श्रीमंत था, स्वरूपवान था, शिक्षित था, अच्च्चे शरीर सौस्ठव का और बहुत ही अच्च्चे व्यव’हार वाला था.
यूँ कह सकती हूँ, चुंबकिया व्यक्तित्वा था उनका.
वक्त गुजरता जा रहा था.
यूँ ही चार महीने बीत गये.
एक रोज़ शनिवार के दिन दोपहर को वो बोले,
“आरती चलो” ( अब वो मेरा पूरा नाम नही कहते थे, आरती से बुलाते थे).
मैने पुचछा,
“कहाँ ?” वो कड़क टोने मे बोल उठे,
“चलो भी” और खुद चल दिए.
मैं भी साथ हो गयी.
नीचे आ कर वो अपनी नई होंडा क्र्व मे बैठे.
मेरे लिए बाजुवाला दरवाज़ा खोल दिया.
मैं भी बाजू मे बैठ गयी.
पुचचाने की हिम्मत ही नही हुई कहाँ जा रहे है.
कार चल पड़ी और थोड़ी देर मे हम शहर से बाहर आ गये.
वो गुमसूँ थे.
मैं भी कुच्छ बोली नही.
गाड़ी पहाड़ो मे होती हुई खंडाला जा पहुँची और ‘डूक्स’ रिट्रीट मे एंट्री ली.
बड़ी शानदार जगह थी.
उन्हों ने एक सूट ऑफीस से फोन कर के बुक किया हुआ था.
यहाँ उन्हे सब जानते थे.
काउंटर पर रिसेप्षनिस्ट ने मुस्कराते हुए कहा,
“युवर सूट इस चिल्ड, सर, आंड मिनी फ्रीज़ इस फुल वित स्टॉक”.
उसने रूम की की दे दी, रघुबीर सर ने कार की की वहाँ दे दी और हम अंदर चले गये.
सूट आलीशान था और एकदम ठंडा भी.
एर-कंडीशनर पहले से ही ओं था.
रूम बॉय आ कर कार मे से रघुबीर सर की छोटी सी बैग ला कर रख गया और कार की चाबी छोड़ गया.
अंदर पहुँच के उन्होने कोट उतार फैंका और नेक्टिये ढीली करते हुए सोफे मे जा गिरे, जुटे उतरे और पावं लंबा कर के सेंटर टिपोय पर रखते हुए बोले. ” आरती, तुम सोच रही होगी , ये सब मैं क्या कर रहा हूँ, है ना ?” मैने मुंडी हिलाई.
उन्हों ने पास बैठने का इशारा किया.
मैं बाजू मे जा कर बैठी.
उन्हों ने मुझे नज़दीक खींचते हुए कहा (मैं उनके इतने पास कभी नही बैठी थी पहले). ” आरती, आज डॉक्टर ने जवाब दे दिया.
संगीता (उनकी पत्नी) अब 20-25 दिन की मेहमान है.
” गिड़गिड़ती आवाज़ मे आयेज कहा,
“हमारा 23 साल का साथ च्छुत जाएगा, मैं अकेला हो जौंगा”.
मैने सांत्वना दी, ” ये सब तो उपरवाले के हाथ मे है.
लेकिन आप खुद को अकेला ना सम’झे.
मैं जो साथ हूँ.
” वो आयेज झुके और मेरी आँखों मे झाँकते हुए कहा,
“सच ? क्या तुम वाकई मेरे साथ हो ?” मेरी आँखों मे झाँकति हुई उनकी आँखों मे कुच्छ अजीब से भाव मैने महसूस किए पर मैं समझ नही पाई और बोली,
“हन, सर” उनका दूसरा प्रश्ना पिच्चे ही आया,
“संगीता की तरह ?” मैं चौंकी, पर बोल उठी,
“हन, सर”.
वापस सोफे की बॅक का सहारा लेते हुए बोले,
“चलो अच्च्छा है….. ज़रा फ्रीज़ से विस्की और सोडा ला.
और तुम भी सफ़र से ताकि होगी.
जा, नहा के फ्रेश हो जा.
” मैने उनका पेग भरते हुए कहा,
“मैं तो कपड़ा भी नही लाई.
नहा के क्या पहनूँगी ? मुझे नही नहाना.
” मुस्कराते हुए उन्हों ने अपनी बाग से कुर्ता और लूँगी निकल के फैंकते हुए कहा,
” ले, ये तुझ पर बहोट जाचेगा.
” मैं ने उसे उठाया और शरमाते हुए बोली,
“लेकिन आप की बाग मे ब्रा और पनटी थोड़ी होगी ?” विस्की की सीप लेते हुए वो बोल उठे,
” अब जा भी, एक दिन ब्रा-पनटी नही पहनेगी तो नंगी नही दिखेगी” खिल खिल हंसते मैं कपड़े उठा के अंदर चली गयी.
बातरूम बड़ा लग्षूरीयस था.
पूरे कद का मिरर लगा हुआ था.
मैने अपने कपड़े उतरे और अपने ही फिगर को आडमाइर करते हुए देख’टी रही.
सोचा, वे सब लोग जो मुझे जॉब देते समय मेरे रूप के पागल होते थे…….
आख़िर ग़लत तो नही थे !! मैं हूँ ही ऐसी.
फिर पानी भरे टब मे लेती और आज के बारे मे सोचने लगी.
टुरट ख़याल आया, रघुबीर सर आज कुच्छ बदले बदले लग रहे है.
वैसे भी औरत किसी भी मर्द की नियत को जल्दी ही समझ लेती है.
मुझे भी वो पल याद आया, जब उन्हों ने मेरी आँखों मे अपनी आँखो से झाँकते हुए कहा था ;. “सच ? क्या तुम वाकई मेरे साथ हो ?” और दूसरा प्रश्ना था,
“संगीता की तरह ?” मुझे बात समझ मे आने लगी.
भले ही इतने समय रघुबीर सर ने नेक व्यवहार किया हो, आज की बात कुच्छ और है.
आज वो भी उसी लाइन पर है और मुझे भोगना चाहते है.
लेकिन आश्चर्या !!!! पहले जहाँ मैं ऐसे हर मौके पर जॉब ठुकरा के भागी थी, इस बार मान मे कोई विरोध उठना तो दूर रहा, एक मीठी गुदगुदी सी हो रही थी.
मैने टब मे अपने ही स्तन को सहलाते हुए अपने मान को टटोला.
नतीजा सामने था.
इन चार महीनो मे मैं मान ही मान उन्हे पसंद करने लगी थी.
और संगीता की जान लेवा बीमारी की बात ने तो ये आशा भी जगाई थी की उसकी मृत्यु के बाद मैं म्र्स.
रघुबीर भी बन सकती हू.
ये ख़याल आते ही मान पुलकित हो उठा.
फ्रेश हो के बाहर आई तो वो दूसरी ही आरती थी.
मैं बाहर आई तो देखा की रघुबीर सर सोफे से बेड पर आ गये थे, कपड़े बदल के अब सर्फ़ शॉर्ट्स मे थे.
उपर का बदन खुला था, मैं उनके कसे हुए सिने को लोलूपता से देख रही थी.
वो दो पेग पी चुके थे.
उनकी नज़र मुझ पर पड़ी तो आँखे फाड़ कर देखते ही रह गये.
कुर्ता लूँगी मे, बिना ब्रा-पनटी के, मैं बहोट ही सेक्सी लग रही थी.
बालों से पानी तपाक रहा था, और मेरे स्तनों के उपर गिर के कुर्ते के उस भाग को गीला कर रहा था.
गीला कुर्ता मेरे स्तनों से चिपक कर , मुझे और सेक्सी लुक दे रहा था.
मैं बेड पर उनके बाजू मे बाईं और जा के लेती और एक गहरी साँस ले के मेरे स्तनों को उभरा.
कुर्ते का उपरी बटन भी खुला छोड़ रखा था मैने.
मेरी आधी क्लीवेज सॉफ नज़र आ रही थी.
उनके दिल मे हल्का सा तूफान तो उठा ही हुआ था.
अब मेरी हरकत से उनके दिल मे खलभाली मची.
उन्हों ने पेग साइड टेबल पर छोड़ दिया और मेरी और मुड़े.
एक ही झटके मे उनका दाया पैर मेरी दोनो जाँघो पर आ गया, उनका दाया हाथ मेरे बाएँ मुममे पर आ गया, और उनके होठ मेरे दाएँ कान के पास आ गये.
वी बिना कुच्छ कहे, जैसे अपना अधिकार समझ कर, शुरू हो गये.
मेरे कान की बूट्ती (र्लोबस) को अपने मूह मे ले कर चूसने लगे, साथ ही जो हाथ मेरे मुममे पर था उस से उसे सहलाने लगे और जो पावं मेरी जाँघो पर आ चक्का था उसे उपर नीचे करने लगे.
उनके लिए यह सब नया नही था, सिर्फ पात्र बदल गया था.
पर मैं तो जीवन मे पहली बार किसी मर्द का अनुभव कर रही थी.
बदन पर एक साथ तीन तीन जगह स्पर्श हो रहा था.
कान, मुममे और जाँघ पर.
मुममे और जाँघ पर तो कपड़े के उपर से हो रहा था, लेकिन कन-बूट्ती पर तो सीधा ही हो रहा था.
एक झंझनाहट सी महसूस हो रही थी.
मैं आँखे मूंद कर पड़ी रही.
कान तो एकदम गरम हो रहा था.
उतने मे उन्हों ने एक हल्की सी बीते ले ली, रलोब पर.
मेरे मुँह से सिसकारी निकल गयी.
दर्द हो रहा था… पर अच्च्छा भी लग रहा था.
जाँघो पर उनके वज़नदार पावं उपर नीचे हो रहे थे.
उस वजन के नीचे सिल्की लूँगी का मुलायम स्पर्श मेरी लचीली जांघों को उत्तेजित कर रहा था.
और साथ ही मेरा मुम्मा पहली बार किसी मर्द के हाथों दबाया जा रहा था.
(वैसे ये अनुभव पूरी तरह से नया नही था.
हर लड़की यौवन प्रवेश पर अपने ही हाथों अपने स्तनों को दबा के ये अनुभव ले लेती है.
मैने भी लिया था.
पर मान’ना पड़ेगा… मर्द के हाथों स्तन दबाने पर जो अनुभव होता है, वो अपने हाथों चाहे कितना ही दबा लो, उस से अलग ही होता है).
अब उनका मुँह मेरे कान छोड़ कर गालों पर आ गया.
उनकी साँसे मेरे गाल पर टकरा रही थी और उनके होत जो अब गीले हो चुके थे गाल पर किस कर रहे थे.
पूर गाल को चूमते हुए, वो थोड़े उपर उठे और मेरे रसीले होठों पर अपने गरम गीले होत रख दिए.
वो पूरी तरह उपर नही उठे थे.
सर्फ़ सीना और मुँह उपर उठाया था.
उपर उठ के आने की वजह से अब उनका खुल्ला सीना मेरे दाएँ मुममे को दबा रहा था.
स्तनों पर मर्द का वजन कैसा रंगीन लगता है, ये तो लड़कियाँ ही जानती है.
साथ ही बायन मुममे जो अब तक सहलाया जा रहा था, अब मसाला जा रहा था.
जांघों पर पावं की मूव्मेंट भी थोड़ी तेज हो गयी.
लूँगी सिल्की थी.
इतनी लंबी और अब तो तेज मूव्मेंट से खुल गयी और नीचे की और उतार गयी.
मैने आप’नी और से सह’योग देते हुए, अपने पावं चौड़े किए.
अब पावं की मूव्मेंट के साथ उनका खुल्ला घुटना मेरी खुली छूट को टच करने लगा.
उपर से नीचे तक सब जगह मज़ा आ रहा था….
मेरे कान छोड़ कर गालों पर आ गया.
उनकी साँसे मेरे गाल पर टकरा रही थी और उनके होठ जो अब गीले हो चुके थे गाल पर किस कर रहे थे.
पूर गाल को चूमते हुए, वो थोड़े उपर उठे और मेरे रसीले होठों पर अपने गरम गीले होत रख दिए.
वो पूरी तरह उपर नही उठे थे.
सर्फ़ सीना और मुँह उपर उठाया था.
उपर उठ के आने की वजह से अब उनका खुल्ला सीना मेरे दाएँ मुममे को दबा रहा था.
स्तनों पर मर्द का वजन कैसा रंगीन लगता है, ये तो लड़कियाँ ही जानती है.
साथ ही बायां मुममे जो अब तक सहलाया जा रहा था, अब मसाला जा रहा था.
जांघों पर पावं की मूव्मेंट भी थोड़ी तेज हो गयी.
लूँगी सिल्की थी.
इतनी लंबी और अब तो तेज मूव्मेंट से खुल गयी और नीचे की और उतार गयी.
मैने आप’नी और से सह’योग देते हुए, अपने पावं चौड़े किए.
अब पावं की मूव्मेंट के साथ उनका खुल्ला घुटना मेरी खुली चूत को टच करने लगा.
उपर से नीचे तक सब जगह मज़ा आ रहा था….
अचानक एक ख़याल मान मे उठा, `ये मैं क्या करने जा रही हू ? क्यों उन्हे रोकती नही हू? ऐसे तो मेरा यौवन भ्रष्टा हो जाएगा.
’ पर मन की कौन सुनता था ! अब तो दिल ही हावी था !! कहयाल जैसा उठा वैसा ही दफ़न हो गया.
मैं वापस मज़ा लेने मे मगन हो गयी… अब उन्हों ने पूरा बदन उठाया और मेरे उपर आ गये.
उनका पूरा बदन मेरे बदन पर ही था.
मैं उनके भारी वजन के नीचे दबति जा रही थी.
क्रश हो रही थी.
और क्या मज़ा आ रहा था !! मैने अपने हाथ उनकी खुली पीठ पर फैलाए और पसारने लगी.
कभी कभी नीचे शॉर्ट्स के उपर से हिप्स पर भी फिरा लेती थी.
वो अब तेझी से मेरे पुर चह’रे पर किस किए जा रहे थे.
मैं भी अब उन्हे किस मे साथ दिए जा रही थी.
मैने उनके होठों पर मेरे होठ रख दिए और एक लंबी किस शुरू की.
दोनो ने होठ थोड़े खोले और मैने अपनी जीभ उनके मुँह के अंदर डाल दी.
अंदर चारो और फिरते हुए उनकी जीभ से जीभ टकराई.
होठ से होठ तो मिल ही रहे थे.
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स्रोत:इंटरनेट