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Dolly Tractor Trolly Xxx Sex Stories

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नौकर के साथ हुई पहली चुदाई के साथ ही मेरी जिंदगी बदलने की शुरुआत हो चुकी थी.
अब सिर्फ उस एक लौड़े से मेरी जिज्ञासा नहीं मिट रही थी, मुझे और चाहिए.
इन जबरदस्त xxx sex stories का आखिरी भाग- Indian Sex Story के अन्य भाग-. पार्ट 1. पार्ट 2. थोड़ी देर में मेरा शारीर अकड़ने लगा और फिर एक जोर का ज्वालामुखी मेरी चूत में छुट पड़ा और गरम गरम लावा मेरी चूत में निकल पड़ा। दोनों शरीरों से निकले लावा ने हम दोनों को तृप्त कर दिया था।. जब उसने मुझे छोड़ा तो हम दोनों हांफने लगे थे। कुछ देर चित्त लेटने के बाद हम दोनों ने कपड़े पहने और वो घर से बाहर निकल गया।. एक अलग सा स्वाद वो मेरे जीवन में छोड़ गया और मेरे चेहरे पर संतुष्टि झलक रही थी।. वीरू के साथ मेरे शारीरक संपर्क बन चुके थे और हम जब मौका मिलता मस्ती के सागर में डूब जाते थे। तो इसी चक्कर में एक बार वीरू ने मुझे मोटर घर में पकड़ लिया और हम दोनों की गर्मी ने अपना रंग दिखाना शुरू कर. दिया। हमें कुछ नहीं मालूम था, बस उसका काला लौड़ा मेरी चूत को हलाल करने में लगा था। जब हम अलग हो कर होश में आये तो सामने नंदू को देख हमारे चेहरे पर तोते उड़ने लगे। मैं सम्पूर्ण नंगी थी, एक भी कपड़ा तन पर नहीं था। जल्दी से मैंने अपने हाथों से अपनी चूत को छुपाने की कोशिश की और जब मैंने अपनी सलवार खींच कर चूत को ढकने की कोशिश की तो मेरे मम्मे दिखने लगे।. नंदू बोला,”वाह मेम साहब ! इस वीरू की पाँचों उँगलियाँ घी में रहती हैं।” मैं सलवार सीधी कर पहनने लगी तो उसने मुझे रोक दिया।. मैंने उससे गुस्से में कहा,”नंदू ! जाओ यहाँ से।” वह अपने लंड को अपने लुंगी के ऊपर ही मसलते हुए बोला,”हमें स्वाद नहीं लेने दोगी जवानी का डॉली रानी ?” “मैं रंडी नहीं हूँ जो हर किसी से करवाऊँ!” मैं गुस्से में लाल हुए जा रही थी।. यह सुन कर वो मेरी बाहें पकड़ कर मुझे लगभग खींचते हुए बोला,”साली रंडी से कम भी नहीं है तू ! एक शादी शुदा नौकर के साथ रंगरलियाँ मानते वक़्त याद नहीं आया कि रंडी क्या होती है?” वीरू ने अपने कपड़े ठीक किये और धीरे से निकल गया। नंदू ने आगे बढ़ कर मुझे अपनी बाहों में दबोच लिया और पागलों की तरह मुझे चूमने लगा।. मैंने उसका विरोध करना चाह रही थी मगर मुझे अपने भेद का खुल जाने का डर था।. मेरे मम्मों को ऊपर से ही दबाते हुए वो बोला,”डॉली ! बचपन से देखा है तुझे ! बिल्कुल अपनी माँ पर गई है।” “नंदू दिमाग मत खराब कर और मुझे छोड़ दे !” मैंने उससे विनती की।. मगर वो कहाँ मानने वाला था। उसने जल्दी से मुझे लिटाया और ज़बरदस्ती मुझे मसलने लगा।. वह मेरे मम्मे दबाने लगा और फिर उन्हें अपने मुँह में डालकर चूसने लगा। उसने अपनी लुंगी उतार कर अपना लौड़ा निकाला और मेरी जांघों में घुसाने लगा। उसने मेरी दोनों टांगें फैला दी और मेरी चूत पर थूक लगाया।. उसके लौड़े को अभी तक मैं देख भी नहीं पाई थी। जब उसने अपना लौड़ा मेरी चूत पर सटा कर एक झटका दिया तब मुझे पता चला कि उसका लौड़ा कितना तगड़ा है।. मैं छटपटाने लगी। कितना बड़ा और कितना मोटा लौड़ा होगा उसका यह सोच कर मेरी जान निकल रही थी।. उसने ना तो मेरी चूत चाटी और ना ही मेरे होंठ चूमे बस देसी लौंडे की तरह अपना काम निकाल रहा था वो। वो तो बस अपने लौड़े को चूत में डाल कर अपना काम निकाल रहा था, किला फतह करने की कला उसमें नहीं थी। मेरे मुख से निकला,”निकालो अपने लौड़े को ! चूत फट रही है मेरी।” उसने कहा,”अभी मजा आएगा कुछ देर सह ले मेरी जान।” और सच में कुछ ही देर में मैं नीचे से खुद ही हिलने लगी और उसने अपनी पकड़ ढीली कर दी।. वो खुश होते हुए बोला,”आया ना मजा साली !” मैंने उससे कहा,”तुम बहुत गंदे हो नंदू। तुमने मुझे चोद दिया। मैं माँ को बता दूंगी यह सब।” उसने अपने दांत दिखाते हुए कहा,”चल न, इकट्ठे चलते हैं तेरी माँ के पास ! मैंने बताऊंगा तेरी माँ को कि उसकी छोरी वीरू के नीचे लेटी थी और उसे देख कर मेरा खड़ा हो गया ! अब तू ही बता कि मैं क्या करता.. मेरे सामने नन्ही मुन्नी सी डॉली नंगी लेटी थी और मैंने उसे पकड़ लिया। और जब अब पकड़ ही लिया था तो चोदना तो बनता ही है न !”. मुझे उसकी हरामीपने की बातें सुन कर शर्म आ रही थी मगर मुझे उसके धक्कों से मजा भी आ रहा था।. आह्ह्ह्ह …..आआह्ह्ह्ह……..हम दोनों की कमर एक साथ चल रही थी और हम दोनों आनन्द के सागर में मजे ले रहे थे। थोड़ी देर बाद हम दोनों साथ साथ झड़े।. सच में नंदू का लौड़ा बड़ा मस्त निकला और मेरे तो दोनों हाथों में लड्डू आ गए।. कभी वीरू के साथ तो कभी नंदू के साथ में मोटर घर में मजे कर रही थी।. रोज का नियम सा बन गया था यह। कभी कभी तो दोनों के एक साथ भी मजे लेती थी।. एक दिन कि बात है। मेरे फूफाजी आये हुए थे। किसी शादी के लिए बुआ जी और माँ को शहर ले जा कर उनको खरीदारी करवानी थी।. मैंने फूफाजी को खाना-वाना खिलाया और डिब्बे में खाना डाल कर मोटर घर की तरफ चल पड़ी मेरे वीरू को खाना खिलाने।. वीरू तो मेरी राह देख ही रहा था। मेरे पहुँचते ही उसने मुझे दबोच लिया। काफी दिनों के बाद हम मिले थे और नंदू अभी वहाँ नहीं था।. देखते ही देखते हम दोनों वहाँ लेट कर रंगरलियाँ मानाने लगे। उसने मुझे चूमते हुए मेरे कपड़ो के ऊपर से मेरे मम्मे दबाते हुए मेरी सलवार खोल दी।. उसका लौड़ा खड़ा था और मुझे मेरी टांगो के बीच में चुभ रहा था।. “वीरू आज तो तेरा पप्पू बड़ा जल्दी खड़ा हो गया रे?”. “अरे यह तो पहले से ही खड़ा था ! चल इसे दो-चार चुप्पे नहीं लगाएगी?” उसने बड़ी ही बेसब्री से कहा।. मैंने नीचे झुक कर उसका लौड़ा मुँह में लिया और चूसने लगी।. “दोनों गेंदों को निगल कर चूस रे छिनाल !” उसने कहा।. कुछ ही देर में मेरी चूत जवाब देने लगी और मुझे रह पाना अब नामुमकिन हो रहा था।. “डाल दे न अपना मूसल मेरे चूत में ! हाय कितना तड़पा रहा है रे ठरकी ! देख न कैसे पनिया रही है मेरी मुनिया ..” मैंने उसके सामने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा। वीरू ने मुझे दबोच लिया और अपना हाथ नीचे ले जाकर निशाने पर तीर रख कर डाल दिया मेरी चूत में अपना लौड़ा।. मेरी बहुत खुश थी, आखिर बहुत दिनों बाद मुझे वीरू का लौड़ा मिला था। मैंने उससे कहा, “हाय रे वीरू ! बड़े दिनों बाद तेरा लौड़ा मिला है रे ! आज तो जी भर के चोद ले अपनी डॉली को।” वो जोश में आते हुए बोला,” साली झूठ बोलती है ! नंदू था न तेरे पास !” “नंदू है तो सही, लेकिन उसमें तेरे जैसा जोश नहीं है रे मेरे वीरू !” ऐसा मैंने उसे और जोश दिलाने के लिए कहा, मैं तो चाहती थी कि आज वो मेरी चूत को फाड़ कर तृप्त कर दे।
स्रोत:इंटरनेट