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तो रुपाली कहने लगी- पंकज सच में?. मैंने कहा- हाँ !. रुपाली ने कहा- मजा आ गया।. रुपाली कहने लगी- पंकज, मैं जिन्दगी में तुमको कभी नहीं छोडूँगी, मैं तुम को हद से ज्यादा पसन्द करती हूँ। मैंने कहा- उतरो ! मैं बाईक पार्किग में लगा दूँ रुपाली जी !. रुपाली को ना चाहते हुए भी उतरना पड़ा। मैंने दुकान वाले से पूछ कर बाईक लगा दी।. मैंने तभी आकाश को फोन किया, पूछा- किस जगह पर हो? आकाश ने कहा- अभी तो हम लोगों को देर लगेगी पहुँचने में ! तुम कहाँ पर हो?. मैंने कहा- हम तो पहुँच गये हैं।. ठीक है, आकाश ने कहा- किस जगह मिलोगे? मैंने कहा- हम लोग मेन गेट पर मिलेंगे ! थोड़ी जल्दी आना !. तभी रुपाली कहने लगी- आकाश को फोन करने की क्या जरुरत थी?. मैंने कहा- रुपाली जी, सबका सोचना पड़ेगा ! अब मैंने सोचा कि उन लोगों के आने से पहले रुपाली का नशा कैसे उतारूँ?. तभी मुझे सामने पकोड़े वाली दुकान नजर आई। मैंने रुपाली से कहा- चलो पकोड़े खाते हैं !. और हम लोगों ने गर्मागर्म पकोड़े खाये और बातें करते रहे। उसके बाद हम दोनों दुकान से बाहर आकर मुख्य दरवाजे की तरफ चल दिए, जगह देखकर हम लोग बैठ गये और इधर उधर की बातें करने लगे। मैंने अचानक ही रुपाली से कहा- रुपाली जी, आप रात को क्या कर रही थी? तो रुपाली कहने लगी- वही जिसके लिये तुमको बुलाया हैं !. मैंने कहा- मैं समझा नहीं तुम क्या कह रही हो?. तो रुपाली कहने लगी- जो रात को मैं आपके साथ कर रही थी, उसके बारे में सब लोगों को मालूम है, इसीलिये तो कविता ने कहा था कि सबकी जिम्मेदारी मैं लेती हूँ ! समझे मियाँ? और कहकर हँसने लगी। मुझको एकदम से झटका लगा, मैं अपना सर पकड़ कर बैठ गया और रुपाली मेरे सर को सहलाने लगी। तभी मैंने रुपाली को कहा- मेरी एक बात का जवाब दोगी?. रुपाली ने कहा- हाँ ! एक नहीं दस बात पूछो !. मैंने कहा- आकाश को मैं भाई की तरह मानता हूँ और उसके परिवार को बहुत सालों से जानता हूँ, क्या आपस में यह सब कुछ जायज़ हैं रुपाली जी? आपके परिवार वाले मेरे बारे में अब तक क्या सोचते हैं? इसके बाद और क्या सोचेंगे? आप मेरी जगह हों तो आप क्या करोगी?. रुपाली ने कहा- आकाश के मम्मी, पापा आपको आकाश की तरह से ही चाहते हैं, मेरी शादी को चार साल हो चुके हैं, आकाश के परिवार ने मुझे हर खुशी दी है, कभी भी मेरी किसी भी बात या काम को मना नहीं किया। और तो और आकाश ने भी मुझे तन-मन-धन हर प्रकार का सुख दिया है, आकाश हर तरह से एक सम्पूर्ण पुरूष हैं, मैं भी आकाश को अपनी जान से बढ़कर प्यार करती हूँ। परन्तु चार महीने पहले हम लोग अपने डाक्टर के पास गये तो डाक्टर ने आकाश के वीर्य में स्पर्म कम बताये तो हम लोगों की तो पैरों तले से जमीन निकल गई। सभी ने आपस में बैठ कर बात की कि अब क्या हो सकता है।. पापा कहने लगे- रुपाली, मेरी बेटी, हम लोगों ने तुम्हें हर तरह का प्यार दिया है और यह कहकर रोने लगे। मैंने पापा से कहा- चलो कोई बात नहीं ! हमारी किस्मत में जो लिखा था वही होगा ना?. हम लोगों ने आकाश का इलाज अच्छे से अच्छे डाक्टर से कराया, पर कोई फायदा नहीं हुआ और आख़िर में आकाश ने पापा से आपके बारे में बात की तो पापा कहने लगे- पंकज मेरे बेटे जैसा है, हम उसको कहें? वो खुद इस काम के लिये तैयार नहीं होगा !. यह कहकर रुपाली मुझे बाहों में भरकर रोने लगी।. मैंने कहा- रुपाली जी, घबराने की कोई जरुरत नहीं ! सब कुछ ठीक हो जायेगा। तो रुपाली कहने लगी- पंकज, कैसे ठीक हो जायेगा? मैंने कहा- मैं हूँ ना? मैं जरूर कोई ना कोई उपाय ढूँढ लूँगा और मैं पापा और आकाश से बात कर लूँगा।. तभी मैंने आकाश को फोन किया- कहाँ पर हो? आकाश ने कहा- बस 5 मिनट में पहुँचने वाले हैं।. मैंने रुपाली को कहा- अपना मुँह धो लो, मुझे रोते चेहरे अच्छे नहीं लगते। सामने नल था और हाथ-मुँह धोकर रुपाली वापस आ गई, मैंने भी हाथ-मुँह धोये और इतने में ही आकाश और सब लोग आ गये, कहने लगे- पंकज कब पहुँचे? मैंने कहा- 40 मिनट हो गए हैं, पर आप कहाँ रह गये थे? आकाश के पापा ने कहा- हम लोग रास्ते में नाश्ता करने लगे थे, तुमने नाश्ता किया या नहीं? मैंने कहा- हाँ अंकल हम लोग तब से दो बार नाश्ता कर चुके हैं, क्यों रुपाली जी। रुपाली ने कहा- हाँ पापा जी ! हम लोग नाश्ता कर चुके हैं।. मैंने कहा- चलो अब दर्शन करते हैं।. हम लोगों ने प्रसाद लिया, प्रसाद चढ़ा कर वापस मन्दिर से बाहर आये तो मैंने कहा- अंकल अबकी बार इस रास्ते से चलो, यह रास्ता लम्बा तो जरुर है पर आप लोग थकोगे नहीं ! आकाश कहने लगा- ठीक है !. हम लोग चलने लगे, जैसे ही हम लोग बाईक के पास पहुँचे, तो मैंने कहा- आप लोग चलो, मैं बाईक से आता हूँ ! तो अंकल कहने लगे- बेटे, रुपाली को भी साथ में लेते आना। वो लोग चलने लगे तो रुपाली और कविता ने आपस में कुछ बात की और आकाश से बोली- भाई, मैं भी रुपाली भाभी और पंकज के साथ आती हूँ। आकाश कहने लगा- नहीं तुम हमारे साथ ही चलो।. रुपाली कहने लगी- आकाश, कविता हमारे साथ आ जायेगी, आप जाओ। मैंने रुपाली को बीच में बैठने को कहा और कविता पीछे बैठ गई। हम लोग धीरे-धीरे उतरने लगें तो मैंने देखा कि कविता ने रुपाली का हाथ पकड़कर मेरे लण्ड पर रख दिया और अपनी भाभी को कान में कुछ कहने लगी। अब मैं. कुछ ज्यादा तो कह नहीं सकता था, बाईक रोककर कहा- कविता और रुपाली जी, ऐसे मजा नहीं आयेगा। यार मुँह से भी कुछ बोलो ना ! ऐसा लगे कि हम मजे कर रहे हैं, पर ध्यान रखना कि आप लोग हिलना-डुलना नहीं। तो कविता कहने लगी- पंकज, सही कह हो। हम लोग तेज तो चल नहीं सकते थे पर कभी धीरे-धीरे तो कभी तेज !. जब हम लोग सभी लोगों के पास से निकले तो रुपाली और कविता जो पहले ही शोर मचा रही थी, उनको देखकर और भी तेजी से शोर मचाया। हम लोगों को देखकर सब लोग हँसने लगे और हम लोग उनसे आगे निकल गये। थोड़ी नीचे आने के बाद मैंने बाईक रोकी और कविता से अपना बैग लेकर बोतल निकाल कर एक पैग मारा और जैसे ही चलने वाला था, रुपाली ने कहा- पंकज, एक मेरे लिये भी !. मैंने कहा- नहीं, अब आपको डर थोड़े ही लग रहा है। अब तो तुम्हें मजा आ रहा है। रुपाली ने कहा- नहीं पंकज, आप मेरे बारे में सब कुछ जान चुके हो, फिर भी ऐसी बात करते हो? दो ना ! मैंने रुपाली की आँखों में मायूसी देखी और एक पैग बना कर दे दिया। रुपाली ने जल्दी से पैग खत्म किया, मैंने रुपाली को चूम कर कहा- दुखी होने की कोई जरूरत नहीं ! मैं हूँ ना ! रुपाली को बाहों में भर लिया तो इतने में कविता कहने लगी- पंकज यह सब क्या चल रहा है?. अब मैं तो कुछ कह नहीं सकता था, रुपाली ने कहा- कविता, कुछ नहीं।
स्रोत:इंटरनेट