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Main Tangewale Ki Randi Bani 2

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इतना बेहतरीन मौका देने के लिये मैंने दिल ही दिल में भगवान का शुक्रिया अदा किया क्योंकि हमारा ट्रेन का सफ़र बहुत ही उबाऊ और बेरंग था। हम ए-सी फर्स्ट क्लास में सफर कर रहे थे इसलिये किसी भी मस्ती-मज़े और. छेड़-छाड़ का कोई ज़रिया नहीं था। खैर हम लोग टाँगे पर बैठे। मैं और मेरी सास पीछे वाली सीट पर बैठे और मेरा देवर आगे वाली सीट पर टाँगे वाले की बगल में बैठा। करीब पंद्रह मिनट के बाद हम पक्की सड़क से एक सुनसान. कच्ची सड़क पर मुड़े। इस सड़क पे कोई रोशनी नहीं थी और ऐसा महसूस हो रहा था जैसे जंगल में से गुज़र रहे हों। कोई और गाड़ी उस सड़क पर नज़र नहीं आ रही थी। मेरी सास तो टाँगे पर बैठते ही सो गयी थी और अब खर्राटे मार. रही थी। यही हाल मेरे देवर का भी था जो टाँगे का साईड का डंडा पकड़े सोया हुआ था।. ठीक ऐसे वक्त पर टाँगेवाले ने टाँगा रोक दिया और बोला, “मेमसाब! आप आगे आके बैठिये, क्योंकि पीछे की तरफ लोड ज्यादा हो गया है घोड़ा बेचारा इतना लोड कैसे खींचेगा, और इस बच्चे को भी पीछे आराम से बिठा दीजिये!”. मैं फौरन समझ गयी कि उसका असली इरादा क्या है लेकिन फिर भी अंजान बनते हुए बोली, “नहीं रहने दो ना ऐसे ही ठीक है!” “ऐसे नहीं चलेगा… घोड़ा तो आपके घाँव तक पहुँचने से पहले ही मर जायेगा… आइये – आप आगे बैठिये!”. मैंने देखा कि मेरी सास अभी भी खर्राटे मार रही थी और मेरे देवर का भी यही हाल था। मजबूरी का नाटक करते हुए मैं टाँगे से उतरी और आगे जा कर अपने देवर को जगाया। “विनोद उठो! जाकर पीछे बैठो… मैं इधर आगे. बैठुँगी!”. विनोद बहुत ही सुस्त सा नींद में वहाँ से उठा और बिना कुछ बोले पीछे वाली सीट पर जा कर बैठ गया और मैं आगे की सीट पर टाँगेवाले की बगल में बैठ गयी। टाँगा फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। पंद्रह-बीस मिनट के बाद. मैंने देखा कि विनोद फिर सो गया है और इस बार उसने अपना सिर मेरी सास की गोद में रखा हुआ था। अब अगर वो अचानक जाग भी जाता तो हमें आगे देख नहीं सकता था। अब मैं बहुत खुश थी क्योंकि उस ठरकी टाँगेवाले को. तड़पाने और लुभाने का और अब तक के बेरंग सफ़र में कुछ मज़ा लेने का ये बेहतरीन मौका था।. वैसे तो मैं हमेशा सलवार-कमीज़ या जींस-टॉप ही पहनती हूँ लेकिन हम शादी में जा रहे थे तो मैंने डिज़ायनर लहंगा-चोली पहना हुआ था और चोली के ऊपर झिनी सी चुनरी थी। नेट के कपड़े का झिना सा लहंगा था इसलिये उसके. नीचे स्लिप (पेटीकोट) भी पहना हुआ था। एहतियात के तौर पे सफर के दौरान ज़ेवर नहीं पहने थे लेकिन पूरा मेक-अप किया हुआ था और पैरों में चार इंच ऊँची पेंसिल हील वाले फैंसी सैंडल पहने हुए थे। मैंने हमेशा महसूस. किया है कि हाई हील के सैंडल पहनने से मेरा फिगर और ज्यादा दिलकश लगता है और मेरी कसी हुई गोल-गोल गाँड इमत्याज़ी तौर पे ऊपर निकल आती है।. मैंने फिर अपनी चुनरी को इस तरह एडजस्ट किया ताकि चोली में कसा मेरा एक मम्मा नज़र आये और फिर टाँगेवाले की तरफ देखते हुए मैंने पूछा, “अरे तुम्हारा घोड़ा तो बहुत धीरे-धीरे चल रहा है! लगता है कि जैसे इसमें जान ही नहीं है!”. बेहयाई से मेरे मम्मों को देखते हुए टाँगेवाला बोला, “अरे मेमसाब जी! अभी आपने मेरा घोड़ा देखा ही किधर है! जब उसे देखोगी तो घबरा कर अपना दिल थाम लोगी!” उसे और शह देने के मकसद से मैंने अपनी चोली का एक हुक खोल दिया। चोली में तीन ही हुक थे और बैकलेस चोली होने की वजह से मैंने नीचे ब्रा भी नहीं पहनी हुई थी। एक तो मेरी चोली पहले से ही बेहद लो-कट थी और अब. हुक खोलने से मेरे मम्मों की घाटी का काफी हिस्सा टाँगेवाले की नज़रों के सामने नुमाया हो गया। टाँगे के ऊपर लटके लालटेन की हल्की रोशनी में ये नज़ारा देख कर टाँगेवाले को सही इशारा मिल गया। वो बोला, “मेमसाब! कभी मौका देकर तो देखिये हमारे घोड़े को… सवारी करके आपका दिल खुश हो जायेगा! पूरा मज़ा ना आये तो नाम बदल दूँगा!”. मैं कहने ही वाली थी कि “अपना या फिर…”लेकिन फिर जाने दिया। मैं उसकी दोहरे मतलब वाली बातें समझ रही थी कि हकीकत में वो ये कहना चाह रहा था कि मैं उसे अपनी चूत चोदने का एक मौका दे दूँ तो वो पूरी तरह मेरी. दिलभर कर तसल्ली करवा देगा। उसे और तड़पाने के लिये मैं थोड़ा आगे को झुकते हुए बोली, “सवारी क्या खाक करायेगा! मुझे तो लगता है कि तुम्हारा घोड़ा तो एकदम बुड्ढा हो गया है देखो कैसी मरियल चाल है इसकी!” टाँगेवाला बोला, “वो तो मेरा घोड़ा मेरे काबू में है… जब तक मैं इसे सिगनल नहीं दूँगा, ये उठेगा और भगेगा नहीं!”ये कहते हुए वो लुंगी के ऊपर से ही खुल्लेआम अपना लौड़ा सहलाने लगा। उसकी दोहरी मतलब वाली बातों से मेरी चुदास भड़क रही थी और ज्यादा मज़ा लेने के लिये मैं उसकी तरफ थोड़ा और खिसक गयी। अब मेरा एक मम्मा टाँगे के हिचकोलों के साथ उसके कंधे को छू रहा था। टाँगेवाले ने जब देखा कि. मैं उसे पूरी शह दे रही हूँ तो वो अपनी कोहनी से मेरे मम्मों को दबाने लगा। मुझे तो इसमें कोई एतराज़ था ही नही लेकिन मैंने एक बार पीछे की सीट पर ये तहकीक करने के लिये नज़र डाली मेरी सास और देवर गहरी नींद. सो तो रहे हैं।फिर मुझे अपने जिस्म के उससे सटने के असर का भी एहसास हुआ – टाँगेवाले का लंड ने लुंगी में खड़े होकर उसे तंबू की शकल देदी थी।. मैंने हंसते हुए मज़ाक में उसे छेड़ा, “अरे! तुम्हारा घोड़ा तो उठने लग गया!” “अरे मेमसाब! इसे खाने का सामान दिखेगा तो बेचारा अपना मुँह तो खोलेगा ही ना… आखिर कब तक भूखा रहेगा!”. अब मुझे तड़पाने की बारी उसकी थी। इसलिये उसने अपनी लुंगी इस तरह धीरे से सरकायी कि उसकी जाँघें बिल्कुल नंगी हो गयी और एक झटके में ही वो किसी भी पल अपना लंड मेरे सामने नुमाया कर सकता था। मैं तो उसका लण्ड. देखने के मरी जा रही थी। लुंगी के पतले से कपड़े में से उसके लंड की पूरी लंबाई नामोदार हो रही थी। करीब आठ-नौ इंच लंबे उस गोश्त को अपने हाथों में पकड़ने की मुझे बेहद आरज़ू हो रही थी। इसलिये टाँगेवाले को और. उकसाने के लिये मैं मासूमियत का नाटक करते हुए अपने मम्मे उसके कंधे पर और ज्यादा दबानेलगी जिससे उसेये ज़ाहिर हो कि टाँगे के हिचकोलों की वजह से ये हो रहा है। मेरे मम्मों की गर्मी उसे महसूस हो रही थी जिसके. असर से लुंगी में उसका तंबू और बुलंद होने लगा और खासा बड़ा होकर खतरनाक नज़र आने लगा। मैं समझ नहीं पा रही थी कि अब भी वो टाँगेवाला खुद पे काबू कैसे कायम रखे हुए था। फिर लालटेन की मद्धम रोशनी में मैंने. नोटिस किया कि उसके लंड का सुपाड़ा लुंगी के किनारे से नज़र आ रहा था।. “या मेरे खुदा!” मैं हैरानी से सिहर गयी। उसके लंड का सुपाड़ा वाकय में बेहद बड़ा था – किसी बड़े पहाड़ी आलू और लाल टमाटर की तरह। रात के अंधेरे में वो पूरी शान और अज़मत से चमक रहा था। मैं जानती थी कि. इतना बड़ा सुपाड़ा देखने के बाद अब मैं ज्यादा देर तक खुद पे काबू नहीं रख पाऊँगी। उसे अपने हठों में लेकर उसे चूमने और उसे चाटने के लिये मैं तड़प उठी थी।.
स्रोत:इंटरनेट