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Masterji Shishya Sex Hindi Kahani 2

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गुरूजी ने अगले पाठ की तरफ बढ़ते हुए अपने आप को नीचे सरका लिया और नव्या के स्तनों को प्यार करने लगे। उसके बोबों की परिधि को अपनी जीभ से रेखांकित करके उन्होंने दोनों स्तनों के हर पहलू को अच्छे तरह से. मुँह से तराशा। फिर जिस तरह कुत्ते का पिल्ला तश्तरी से दूध पीता है वे उसकी चूचियां लपलपाने लगे। गुदगुदी के कारण नव्या लेटी लेटी उछलने लगी जिससे उसके स्तन गुरूजी के मुँह से और भी टकराने लगे। थूक से बोबे. गीले हो गए थे और इस ठंडक से उसे सिरहन सी हो रही थी।.  . अब गुरूजी ने थोड़ा और नीचे की ओर रुख किया। उसके पेट और नाभि को चाटने लगे। नव्या कसमसा रही थी और गुलगुली से बचने की कोशिश कर रही थी। कभी कभी अपने हाथों से उनके सिर को रोकने की चेष्टा भी करती थी पर. गुरूजी उसके हाथों को प्यार से अलग करके दबोच लेते थे।. अब उनका मुँह नव्या की योनि के बहुत करीब आ गया था। उसकी योनि पानी के बाहर तड़पती मछली के होटों की तरह लपलपा रही थी। गुरूजी ने अपनी जीभ से उसकी योनि के मुकुट मटर की परिक्रमा लगाई तो नव्या एक फ़ुट उछल. पड़ीं मानो घोड़ी दुलत्ती मार रही हो। गुरूजी ने घोड़ी को वश में करने के लिए अपनी पकड़ मज़बूत की और जीभ से उसके भग-शिश्न को चाटने लगे। नव्या पूरी ताक़त से अपने आप को गुरूजी की गिरफ्त से छुटाने का प्रयास कर. रही थी। गुरूजी ने रहम करते हुए पकड़ ढीली की और अपने जीभ रूपी खोज उपकरण को नव्या की योनि के ऊपर लगा दिया। नव्या की दशा आसमान से गिरे खजूर में अटके सी हो रही थी।.  .  .  . उसका बदन छटपटा रहा था। उसकी उत्तेजना चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी।. गुरूजी ने कुछ देर योनि से छेड़छाड़ के बाद अपनी जीभ योनि के अन्दर डाल दी। बस, नव्या का संयम टूट गया और वह आनंद से कराहने लगी। गुरूजी जान बूझ कर उसकी योनि का रस पान करना चाहते थे जिससे बाद में वे नव्या से अपने लिंग का मुखाभिगम आसानी से करवा पायें। जो सुख वे नव्या को दे रहे हैं, सूद समेत वापस लेना चाहते थे। नव्या की योनि तो पहले से ही भीगी हुई थी, गुरूजी की लार से और भी गीली हो गई। अब गुरूजी को लगा कि वह घड़ी आ गई है जिसकी उन्हें इतनी देर से प्रतीक्षा थी।  . उन्होंने ने नव्या से पूछा,”कैसा लग रहा है?” नव्या क्या कहती, चुप रही। गुरूजी,”भई चुप रहने से मुझे क्या पता चलेगा…। अच्छा, यह बताओ कोई तकलीफ तो नहीं हो रही?” नव्या,”जी नहीं !” गुरूजी,”चलो अच्छा है, तकलीफ नहीं हो रही। तो अच्छा लग रहा है या नहीं?” नव्या चुप रही और अपनी आँखें ढक लीं।. गुरूजी,”तुम तो बहुत शरमा रही हो। शरमाने से काम नहीं चलेगा। मैं इतनी मेहनत कर रहा हूँ, यह तो बताओ कि मज़ा आ रहा है या नहीं?” यह पूछते वक़्त गुरूजी ने अपना लंड नव्या की चूत से सटा दिया और हल्का हल्का हिलाने लगे। उनके हाथ नव्या के पेट और उरोजों पर घूम रहे थे।. “जी, मज़ा आ रहा है।” नव्या ने सच उगल दिया। गुरूजी,”तुम बहुत अच्छी लड़की हो। तुम चाहो तो इससे भी ज़्यादा मज़ा लूट सकती हो….
। ” नव्या चुप रही पर उसका रोम रोम जो कह रहा था वह गुरूजी को साफ़ सुनाई दे रहा था। फिर भी वे उसके मुँह से सुनना चाहते थे।. गुरूजी,”क्या कहती हो?” “जैसा आप ठीक समझें।” नव्या ने लाज शर्म त्यागते हुए कह ही दिया।. गुरूजी,”मैं तो इसे ठीक समझता ही हूँ पर तुम्हारी सहमति भी तो जरूरी है। बोलो और मज़े लेना चाहती हो?” नव्या ने हाँ मैं सिर हिला दिया।. गुरूजी,”ऐसे नहीं। जो भी चाहती हो बोल कर बताओ !” नव्या,”जी, और मज़े लेना चाहती हूँ।” गुरूजी,” शाबाश। हो सकता है इसमें शुरू में थोड़ी पीड़ा हो। बोलो मंज़ूर है ?” नव्या,”जी मंज़ूर है।” गुरूजी ने अपना लंड नव्या के योनि द्वार पर लगा ही रखा था। जैसे ही उसने अपनी मंजूरी दी, उन्होंने हल्का सा धक्का लगाया। चूंकि नव्या की चूत पूरी तरह गीली थी और वह मानसिक व शारीरिक रूप से पूर्णतया उत्तेजित थी, गुरूजी का औसत माप का लिंग उसकी तंग योनि में थोड़ा घुस गया। नव्या के मुँह से एक हिचकी सी निकली और उसने पास रखे गुरूजी के बाजुओं को कस कर पकड़ लिया। गुरूजी उसे कम से कम दर्द देकर उसका कुंवारापन लूटना चाहते थे। गुरूजी ने आश्वासन के तौर पर लंड बाहर निकाला। नव्या की पकड़ थोड़ी ढीली हुई और उसने एक लम्बी सांस छोड़ी। जैसे ही नव्या ने सांस छोड़ी, गुरूजी ने एक और वार किया। इस बार लंड थोड़ा और अन्दर गया पर नव्या की कुंवारी योनि को नहीं भेद पाया। उसकी झिल्ली पहरेदार की तरह उनके लंड का रास्ता रोके खड़ी थी। नव्या को इतना अचम्भा नहीं हुआ जितना पहली बार हुआ था. फिर भी शायद वह वार के लिए तैयार नहीं थी। उसके मुँह से एक हल्की सी चीख निकल गई। गुरूजी ने फिर से लंड बाहर निकाल लिया पर योनिद्वार पर ही रखा।.  .  .  . गुरूजी ने उसके चूतड़ों को सहलाया और घुटनों पर पुच्ची की। हालाँकि वे उसे कम से कम दर्द देना चाहते थे पर वे जानते थे कि कुंवारेपन की झिल्ली कई बार कठोर होती है और आसानी से नहीं टूटती। शायद नव्या की. झिल्ली भी ऐसी ही थी। वे उसका ध्यान बँटा कर अचानक वार करना चाहते थे जिससे उसे कम से कम दर्द हो। जैसे डॉक्टर जब बच्चों को इंजेक्शन लगता है तो इधर उधर की बातों में लगा कर झट से सुई अन्दर कर देता है। नहीं. तो बच्चे बहुत आनाकानी करते हैं और रोते हैं।. गुरूजी,”नव्या, तुम्हारा जन्मदिन कब है?” “जी, २६ अगस्त को।” “अच्छा, जन्मदिन कैसे मनाते हो ?” “जी, कुछ ख़ास नहीं। मंदिर जाते हैं, पिताजी मिठाई लाते हैं। कभी कभी नए कपड़े भी मिल जाते हैं !” गुरूजी,”तुम यहाँ पर कितने सालों से हो ?” यह सवालात करते वक़्त गुरूजी अपने लंड से उसके योनिद्वार पर लगातार धीरे धीरे दस्तक दे रहे थे जिससे एक तो लंड कड़क रहे और दूसरा उनका निशाना न बिगड़े।. “जी, करीब पांच साल से।” “तुम्हारे कितने भाई बहन हैं?”. “जी, हम तीन बहनें हैं। भाई कोई नहीं है!” “ओह, तो भाई की कमी खलती होगी !” “जी”. “कोई लड़का दोस्त है तुम्हारा ?”. “जी नहीं” नव्या ने ज़ोर से कहा। मानो ऐसा होना गलत बात हो।. “इसमें कोई गलत बात क्या है। हर लड़की के जीवन में कोई न कोई लड़का तो होना ही चाहिए !”. “किसलिए ?”. “किस लिए क्या ? किस करने के लिए और क्या !! आज तुम्हें चुम्मी में मज़ा नहीं आया क्या ?”. “जी आया था !”. गुरूजी ने अपने लंड के धक्कों का माप थोड़ा बढ़ाया।. “क्या तुम लड़की को ऐसी चुम्मी देना चाहोगी?”. “ना ना ..। कभी नहीं !” “तो फिर लड़का होना चाहिए ना ?”. “जी”. “अगर कोई और नहीं है तो मुझे ही अपना दोस्त समझ लो, ठीक ?” “जी ठीक”. उसके यह कहते ही गुरूजी ने एक ज़ोरदार धक्का लगाया और उनका लंड इस बार नव्या की झिल्ली के विरोध को पछाड़ते हुए काफी अन्दर चला गया।. नव्या बातों में लगी थी और गुरूजी की योजना नहीं जानती थी। इस अचानक आक्रमण से हक्की बक्की रह गई। उसकी योनि में एक तीव्र दर्द हुआ और उसको कुछ गर्म द्रव्य के बहने का अहसास हुआ। उसके मुँह से ज़ोर की चीख. निकली और उसने गुरूजी के हाथ ज़ोर से जकड़ लिए।.
स्रोत:इंटरनेट