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Masterji Shishya Sex Hindi Kahani

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एक अनुभवी गुरु और एक मासूम शिष्या के बीच एक सेक्सुअल तनाव का माहौल बना हुआ है, दोनों जानते है क्या होने वाला है.
पर कैसे होने वाला है? जानिए इस sex hindi kahani के आखिरी भाग में- Sexy Story के अन्य भाग-. पार्ट 1. पार्ट 2. पार्ट 3. गुरूजी रसोई से शरबत के दो ग्लास ले कर आये और नव्या की तरफ एक ग्लास बढ़ाते हुए दूसरे ग्लास से खुद घूँट लेने लगे। नव्या ने ग्लास ले लिया। गर्मी में चलकर आने में उसे प्यास भी लग गई थी। शरबत ख़त्म हो गया।. दोनों ने कोई बातचीत नहीं की। दोनों को शायद बोलने के लिए कुछ सूझ नहीं रहा था। दोनों के मन में आगे जो होने वाला है उसकी शंकाएँ सर्वोपरि थीं।. गुरूजी ने अंततः चुप्पी तोड़ी,”कैसी हो ?” नव्या सिर नीचा कर के चुप रही।. “मालिश के लिए तैयार हो?”. नव्या कुछ नहीं बोली।. “मैं थोड़ी देर में आता हूँ, तुम मालिश के लिए तैयार होकर लेट जाओ।” यह कहकर गुरूजी बाथरूम में चले गए। नव्या ने अपने कपड़े उतार कर सोफे पर करीने से रख दिए और चड्डी और चोली पहने ज़मीन पर गद्दे पर लेट गई और चादर से अपने आप को ढक लिया। अपने दोनों हाथ चादर के बाहर निकाल कर दोनों तरफ रख लिए।. गुरूजी , वापस आये तो बोले,” अरे तुम तो सीधी लेटी हो !! चलो उल्टी हो जाओ।” नव्या चादर के अन्दर ही अन्दर पलटने की नाकाम कोशिश करने लगी तो गुरूजी ने बोला,”नव्या , अब मुझसे क्या शर्माना। चलो जल्दी से पलट जाओ।” नव्या ने चादर एक तरफ करके करवट ले ली और उल्टी लेट गई। लेट कर चादर ऊपर लेने का प्रयास करने लगी तो गुरूजी ने चादर परे करते हुए कहा,”अब इसकी कोई ज़रुरत नहीं है। ” “और इनकी भी कोई ज़रुरत नहीं है।” कहते हुए उन्होंने नव्या की चड्डी नीचे खींच दी और टांगें उठा कर अलग कर दी। फिर चोली का हुक खोल कर नव्या के पेट के नीचे हाथ डाल कर उसे ऊपर उठा लिया और चोली. खींच कर हटा दी। अब नव्या बिलकुल नंगी हो गई थी। हालाँकि वह उल्टी लेटी हुई थी, उसने अपने हाथों से अपनी आँखें बंद कर लीं उसके नितम्बों की मांसपेशियाँ स्वतः ही कस गईं।गुरूजी को नव्या की यही अदाएं लुभाती थीं। उन्होंने उसकी पीठ और सिर पर हाथ फेर कर उसका हौसला बढ़ाया और उसकी मालिश करने में जुट गए।. गर्म तेल की मालिश से नव्या को बहुत चैन मिल रहा था। कल के मुकाबले आज गुरूजी ज़्यादा निश्चिंत हो कर हाथ चला रहे थे। उन्हें नव्या के भयभीत हो कर भाग जाने का डर नहीं था क्योंकि आज तो वह सब कुछ जानते हुए. भी अपने आप उनके घर आई थी। मतलब, उसे भी इस में मज़ा आ रहा होगा। गुरूजी ने सही अनुमान लगाया। थोड़ी देर के बाद गुरूजी ने नव्या के ऊपर घुड़सवारी सा आसन जमा लिया और अपना कुर्ता उतार दिया। अब वे सिर्फ लुंगी पहने हुए थे। लुंगी को उन्होंने घुटनों तक चढ़ा लिया था अपर उनका लिंग अभी भी लुंगी में छिपा. था।. इस अवस्था में उन्होंने नव्या के पिछले शरीर पर ऊपर से नीचे, यानि कन्धों से कूल्हों तक मालिश शुरू की। जब वे आगे की तरफ जाते तो जान बूझ कर अपनी लुंगी से ढके लिंग को नव्या के चूतड़ों से छुला देते। कपड़े के छूने से नव्या को जहाँ गुलगुली होती, गुरूजी के लंड की रगड़ से उसे वहीं रोमांच भी होता। गुरूजी को तो अच्छा लग ही रहा था, नव्या को भी मज़ा आ रहा था। गुरूजी ने अपने आसन को इस तरह तय किया कि जब वे आगे को हाथ ले जाएँ, उनका लंड नव्या के चूतड़ों के बीच में, किसी हुक की मानिंद, लग जाये और उन्हें और आगे जाने से रोके। एक दो ऐसे वारों के बाद नव्या ने अपनी टाँगें स्वयं थोड़ी खोल दीं जिससे उनका लंड अब नव्या की गांड के छेद पर आकर रुकने लगा। जब ऐसा होता, नव्या को सरसराहट सी होती और उसके रोंगटे से खड़े होने लगते। उधर गुरूजी को नव्या की इस व्यवस्था से बड़ा प्रोत्साहन मिला और उन्होंने जोश में आते हुए अपनी लुंगी उतार फेंकी।.  . अब वे दोनों पूरे नंगे थे। गुरूजी ने नव्या के हाथ उसकी आँखों पर से हटा कर बगल में कर दिए। अब वह एक तरफ से कुछ कुछ देख सकती थी। गुरूजी ने अपने वार जारी रखे जिसके फलस्वरूप उनका लंड तन कर प्रबल और विशाल. हो गया और नव्या की गांड पर व्यापक प्रभाव डालने लगा।.  . गुरूजी आपे से बाहर नहीं होना चाहते थे सो उन्होंने झट से अपने आप को नीचे की तरफ सरका लिया और नव्या की टांगों पर ध्यान देने लगे। उनके हाथ नव्या की जांघों के बीच की दरार में खजाने को टटोलने लगे। नव्या से. गुदगुदी सहन नहीं हो रही थी। वह हिलडुल कर बचाव करने लगी पर गुरूजी के हाथों से बच नहीं पा रही थी। जब कुछ नहीं कर पाई तो करवट ले कर सीधी हो गई। अपनी टाँगें और आँखें बंद कर लीं और हाथों से स्तन ढक लिए।. गुरूजी इसी फिराक़ में थे। उन्होंने नव्या के पेट, पर हाथ फेरते हुए नव्या के हाथ उसके वक्ष से हटा दिए।  . तेल लगा कर अब वे उसकी छाती की मालिश कर रहे थे। नव्या के उरोज दमदार और मांसल लग रहे थे। उसकी चूचियां उठी हुई थीं और वह जल्दी जल्दी साँसें ले रही थी। गुरूजी का लंड नव्या की नाभि के ऊपर था और कभी कभी. उनके लटके अंडकोष उसकी योनि के ऊपरी भाग को लग जाते। नव्या बेचैन हो रही थी। उसमें वासना की अग्नि प्रज्वलित हो चुकी थी और उसकी योनि प्रकृति की अपार गुरुत्वाकर्षण ताक़त से मजबूर गुरूजी के लिंग के लिए. तृषित हो रही थी। सहसा उसकी योनि से द्रव्य पदार्थ रिसने लगा।. नव्या की टांगें अपने आप खुल गईं और गुरूजी के लिंग के अभिवादन को तत्पर हो गईं। गुरूजी को समझ आ रहा था। पर वे जल्दी में नहीं थे। वे न केवल अपने लिए इस अनमोल अवसर को यादगार बनाना चाहते थे वे नव्या के लिए. भी उसके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षण को ज़्यादा से ज़्यादा आनंददायक बनाना चाहते थे। वे उसकी लालसा और बढ़ाना चाहते थे।. उन्होंने आगे खिसक कर नव्या की आँखों पर पुच्ची की और फिर एक एक करके उसके चेहरे के हर हिस्से पर प्यार किया। जब तक उनके लब नव्या के अधरों को लगे, नव्या मचल उठी थी और उसने पहली बार कोई हरकत करते हुए गुरूजी को अपनी बाँहों में ले लिया और ज़ोर से उनका चुम्बन कर लिया। जीवन में पहली बार उसने ऐसा किया था। ज़ाहिर था उसे इस कला में बहुत कुछ सीखना था।. गुरूजी ने उसे चुम्बन सिखाने के लिए उसके मुँह में अपनी ज़ुबान डाली और उसके मुँह का निरीक्षण करने लगे। थोड़ी देर बाद, एक अच्छी शिष्या की तरह उसने भी अपनी जीभ गुरूजी के मुख में डाल कर इधर उधर टटोलना शुरू किया। अब गुरूजी नव्या के ऊपर लेट गए थे और उनका सीना नव्या के भरे और उभरे हुए उरोजों को दबा कर सपाट करने का बेकार प्रयत्न कर रहा था। नव्या की चूचियां गुरूजी के सीने में सींग मार रहीं थीं। गुरूजी ने कुछ. ही देर में नव्या को चुम्बन कला में महारत दिला दी। अब वह जीभ चूसना, जीभ लड़ाना व मुँह के अन्दर के हिस्सों की जीभ से तहकीकात करने में निपुण लग रही थी।
स्रोत:इंटरनेट