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Masterji Shishya Sex Hindi Story 2

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धीरे धीरे गुरूजी ने तलवों को छोड़ कर घुटनों के नीचे तक की टांगों को तेल लगाना शुरू किया। यह करने के लिए उन्होंने नव्या के घुटने ऊपर की तरफ मोड़ दिए। चादर पहले ही जाँघों तक उघड़ी हुई थी। घुटने मोड़ने. से नव्या की योनि प्रत्यक्ष हो गई। नव्या ने तुंरत अपनी टाँगें जोड़ लीं। पर इस से क्या होता है !? उसकी योनि तो फिर भी गुरूजी को दिख रही थी हालाँकि उसके कपाट बिलकुल बंद थे। गुरूजी ने खिसक कर अपने आप को. नव्या के और समीप कर लिया जिस से उनके हाथ नव्या की जांघों तक पहुँच सकें।.  . नव्या की साँसें और तेज़ हो गईं और उसने अपने दोनों हाथ अपनी आँखों पर और कस कर बांध लिए। गुरूजी ने नव्या के घुटनों से लेकर उसकी जांघों तक की मालिश शुरू की। वे उसकी जांघों की सब तरफ से मालिश कर रहे थे और. उनके अंगूठे नव्या की योनि के बहुत नज़दीक तक भ्रमण कर रहे थे। नव्या को बहुत गुदगुदी हो रही थी और वह अपनी टाँगें इधर उधर हिलाने लगी। ऐसा करने से गुरूजी के अंगूठों को और आज़ादी का मौका मिल गया और वे उसकी. योनि के द्वार तक पहुँचने लगे। नव्या ने शर्म से अपनी टांगें सीधी कर लीं और आधी सी करवट ले कर रुक गई। उसने अपनी टाँगें भी जोर से भींच लीं। गुरूजी ने उसकी इस प्रतिक्रिया का सम्मान किया और कुछ देर तक कुछ. नहीं किया। नव्या की प्रतिक्रिया उसके कुंवारेपन और अच्छे संस्कारों का प्रतीक था और यह गुरूजी को अच्छा लगा। उनकी नज़र में जो लड़की लज्जा नहीं करती उसके साथ सम्भोग में वह मज़ा नहीं आता। वे तो एक कमसिन, आकर्षक, गरीब, असहाय और कुंवारी लड़की का सेवन करने की तैयारी कर रहे थे और उन्हें लगता था वे मंजिल के काफी नज़दीक पहुँच गए हैं। थोड़े विराम के बाद उन्होंने नव्या को करवट से सीधा किया और बिना टांगें मोड़े उसकी मालिश करने लगे। उन्हें शायद नहीं पता था कि नव्या की योनि फिर से गीली हो चली थी और इसीलिए नव्या ने इसे छुपाने की कोशिश. की थी। नव्या ने अपने होंट दांतों में दबा रखे थे और वह किसी तरह अपने आप को क़ाबू में रख रही थी जिससे उसके मुँह से कोई ऐसी आवाज़ न निकल जाए जिससे उसको मिल रहे असीम आनंद का भेद खुल जाए। गुरूजी ने स्थिति. का समझते हुए नव्या की जांघों पर से ध्यान हटाया। उन्होंने उसके पेट पर से चादर को ऊपर लपेट दिया और उसके पतले पेट पर तेल लगाने लगे। नव्या को लग रहा था मानो उसका पूरा शरीर ही कामाग्नि में लिप्त हो गया हो।. गुरूजी जहाँ भी हाथ लगायें उसे कामुकता का आभास हो। यह आभास उसकी योनि को तर बतर करने में कसर नहीं छोड़ रहा था और नव्या को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे !! उसे लगा थोड़ी ही देर में उसकी योनि के नीचे बिछी. चादर गीली हो जायेगी। गुरूजी को शायद उसकी इस दशा का भ्रम था। कुछ तो वे उसकी योनि देख भी चुके थे और कुछ वे नव्या के शारीरिक संकेत भी पढ़ रहे थे। उन्हें पुराने अनुभव काम आ रहे थे।.  . नव्या के पेट पर हाथ फेरने में गुरूजी को बहुत मज़ा आ रहा था। इतनी पतली कमर और नरम त्वचा उनके हाथों को सुख दे रही थी। वे नाभि में अंगूठे को घुमाते और पेट के पूरे इलाके का निरीक्षण करते। उनकी आँखों के. सामने नव्या की योनि के इर्द गिर्द थोड़े बहुत घुंघराले बाल थे जो योनि को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। नव्या ने अपनी टाँगें कस कर जोड़ रखी थीं जिससे योनि ठीक से नहीं दिख रही थी पर फिर भी गुरूजी की. नज़रों के सामने थी और उनकी नज़रें वहां से नहीं हट रही थीं।. अब गुरूजी ने नव्या की छाती पर से चादर हटाते हुए उसके सिर पर डाल दी। अब वह कुछ नहीं देख सकती थी और उसके हाथ भी चादर के नीचे क़ैद हो गए थे। गुरूजी को यह व्यवस्था अच्छी लगी। इसकी उन्होंने योजना नहीं. बनाईं थी। यह स्वतः ही हो गया था। गुरूजी को लगा भगवान् भी उसका साथ दे रहे हैं।. गुरूजी ने पहली बार नव्या के स्तनों को तसल्ली से देखा। यद्यपि वे इतने बड़े नहीं थे पर मनमोहक गोलनुमा आकार था और उनके उभार में एक आत्मविश्वास झलकता था। उनके शिखर पर कथ्थई रंग के सिंघासन पर गौरवमई. चूचियां विराजमान थीं जो सिर उठाए आसमान को चुनौती दे रही थीं।. नव्या की आँखें तो ढकी थीं पर उसे अहसास था कि गुरूजी उसके नंगे शरीर को घूर रहे होंगे। यह सोच कर उसकी साँसें और तेज़ हो रही थीं उसका वक्ष स्थल खूब ज्वार भाटे ले रहा था। गुरूजी का मन तो उन चूचियों को. मूंह में लेकर चूसने का कर रहा था पर आज मानो उनके लिए व्रत का दिन था। तेल हाथों में लगाकर उन्होंने नव्या के स्तनों को पहली बार छुआ। इस बार उन्हें बिजली का झटका सा लगा। इतने सुडौल, गठीले और नरम वक्ष उन्होंने अभी तक नहीं छुए थे। उनका स्पर्श पा कर स्तन और भी कड़क हो गए और चूचियां तन कर और कठोर हो गईं।. जब उनकी हथेली चूचियों पर से गुज़रती तो वे दबती नहीं बल्कि स्वाभिमान में उठी रहतीं। गुरूजी को स्वर्ग का अनुभव हो रहा था। इसी दौरान उन्हें एक और अनुभव हुआ जिसने उन्हें चौंका दिया, उनका लिंग अपनी मायूसी त्याग कर फिर से अंगडाई लेने की चेष्टा कर रहा था। गुरूजी को अत्यंत अचरज हुआ। उन्होंने सोचा था कि दो बार के विस्फोट के बाद कम से कम १२ घंटे तक तो वह शांत रहेगा। पर आज कुछ और ही बात थी। उन्हें अपनी. मर्दानगी पर गरूर होने लगा। चिंता इसलिए नहीं हुई क्योंकि नव्या का सिर ढका हुआ था और वह कुछ नहीं देख सकती थी। गुरूजी ने अपने लिंग को निकर में ही ठीक से व्यवस्थित किया जिस से उसके विकास में कोई बाधा न. आये।.  . जब तक नव्या की आँखें बंद थीं उन्हें अपने लंड की उजड्ड हरकत से कोई आपत्ति नहीं थी। वे एक बार फिर नव्या के पेट के ऊपर दोनों तरफ अपनी टांगें करके बैठ गए और उसकी नाभि से लेकर कन्धों तक मसाज करने लगे।. इसमें उन्हें बहुत आनंद आ रहा था, खासकर जब उनके हाथ बोबों के ऊपर से जाते थे। कुछ देर बाद गुरूजी ने अपने आप को खिसका कर नीचे की ओर कर लिया और उसके घुटनों के करीब आसन जमा लिया। अपना वज़न उन्होंने अपनी टांगों पर ही रखा जिससे नव्या को थकान या तकलीफ़ न हो।. गुरूजी के घर से चोरों की तरह निकल कर घर जाते समय नव्या का दिल जोरों से धड़क रहा था। उसके मन में ग्लानि-भाव था। साथ ही साथ उसे ऐसा लग रहा था मानो उसने कोई चीज़ हासिल कर ली हो। गुरूजी को वशीभूत करने का. उसे गर्व सा हो रहा था। अपने जिस्म के कई अंगों का अहसास उसे नए सिरे से होने लगा था। उसे नहीं पता था कि उसका शरीर उसे इतना सुख दे सकता है। पर मन में चोर होने के कारण वह वह भयभीत सी घर की ओर जल्दी जल्दी. कदमों से जा रही थी।. जैसे किसी भूखे भेड़िये के मुँह से शिकार चुरा लिया हो, गुरूजी गुस्से और निराशा से भरे हुए दरवाज़े की तरफ बढ़े। उन्होंने सोच लिया था जो भी होगा, उसकी ख़ैर नहीं है।
स्रोत:इंटरनेट