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Masterji Shishya Sex Hindi Story

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मास्टरजी अपनी कुंवारी मासूम शिष्या की ऊपर से नीचे तक मसाज कर रहे है, देखते है वो बेचारी लड़की कब तक अपने आप पे काबू रख पायेगी.. इस sex hindi story का अगला भाग.. Sex Kahani के अन्य भाग-. पार्ट 1. पार्ट 2. पार्ट 3. उनके हाथ नव्या के चूतडों पर सरपट फिर रहे थे। रह रह कर उनकी उंगलियाँ चूतडों के पाट के बीच चली जातीं। जब ऐसा होता, नव्या हिल हिल कर आपत्ति जताती। वज्रासन से थक कर गुरूजी अपने घुटनों के बल बैठ गए और मालिश जारी रखी। उनकी उंगलियाँ नव्या की योनि के द्वार तक दस्तक देने लगीं। ऐसे में भी नव्या हिलडुल कर मनाही कर देती।. अब गुरूजी ने नव्या के ऊपर से पूरी चादर हटा दी और मालिश का वार पिंडलियों से लेकर पीठ और कन्धों तक करने लगे। जब वे आगे को जाते तो उनकी निकर नव्या के चूतडों से छू जाती।. हालाँकि गुरूजी एक बार लिंगराज को राहत दिला चुके थे और आम तौर पर उनका लंड एक दो घंटे के विश्राम के बाद ही दुबारा तैयार होता था, इसी विश्वास पर तो उन्होंने लंगोट उतार दी थी। पर आज आम हालात नहीं थे। लिंगराज के लिए कठिन समय था। उनके सामने एक अत्यंत कामुक और आकर्षक लड़की उनकी गिरफ्त में थी। वह नंगी और कई तरह से असहाय भी थी। उनके संयम की मानो परीक्षा हो रही थी। मन पर तो गुरूजी ने काबू पा लिया पर तन. का क्या करें। उनका लंड ताव में आ गया और उसके तैश के सामने बेचारी निकर का कपड़ा कमज़ोर पड़ रहा था। वह उसके बढ़ाव और उफ़ान को अपने में सीमित रखने में नाकामयाब हो रहा था। अतः गुरूजी का लंड निकर को उठाता. हुआ आसमान को सलामी दे रहा था। गुरूजी के इरादों का विद्रोह करते हुए उन्हें मानो अंगूठा दिखा रहा था। यह तो अच्छा था कि नव्या उलटी लेटी हुई थी वरना लिंगराज की यह हरकत उससे छिपी नहीं रह सकती थी। सावधानी. बरतते बरतते भी उनकी लंड-युक्त निकर नव्या की गांड को छूने लगी।.  . कुछ भी कहो, सामाजिक आपत्ति और विपदा एक बात है और प्रकृति के नियम और बात हैं। नव्या या उसकी जगह कोई और लड़की, का सम्भोग के प्रति विरोध सामाजिक बंधनों के कारण होता है ना कि उसके तन-मन की आपत्ति के कारण। तन-मन से तो सबको सम्भोग का सुख अच्छा लगता है बशर्ते सम्भोग सम्मति के साथ किसी प्रियजन के साथ हो। यहाँ भी, हालाँकि नव्या के संस्कार उसको ग्लानि का आभास करा रहे थे, पर गुरूजी के लंड का उसके चूतड़ों पर हल्का हल्का स्पर्श, उसके शरीर को रोमांचित और मन को प्रफुल्लित कर रहा था। नव्या की योनि से सहसा पानी बहने लगा।  . गुरूजी क्योंकि पीठ की मालिश में मग्न थे, नव्या की योनि गीली होने का दृश्य नहीं देख पाए। उनकी नज़र पीठ की तरफ और ध्यान चूतड़ों से स्पर्श करती अपनी निकर पर था जिसके कारण उनका लिंग कठोर से कठोरतर होता जा रहा था। उन्हें याद नहीं आ रहा था कि इससे पहले उनका लंड इतनी जल्दी कब दुबारा सम्भोग के लिए तैयार हुआ हो !! उन्हें अपने आप पर गर्व होने लगा पर साथ ही चिंता भी होने लगी कि इस अवस्था से कैसे निपटें ? वे. नहीं चाहते थे कि नव्या को उनका विराट लंड दिख जाये। उन्हें डर था वह घबरा कर भाग न जाए। स्थिति पर काबू पाने के लिए वे नव्या के ऊपर से हट गए और उसकी बगल में बैठ कर उसकी गर्दन और कन्धों को सहलाने लगे।. उन्होंने नव्या के निचले शरीर पर चादर भी उढ़ा थी। नव्या के कामोत्तेजन को जैसे अचानक ब्रेक लग गया। उसे थोड़ा बुरा लगा पर राहत भी महसूस की। उसे अपने ऊपर गुस्सा भी आ रहा था कि अपने ऊपर संयम क्यों नहीं रख. पा रही है। उसे लगा कि गुरूजी क्या सोचेंगे अगर उन्हें पता लगा कि उसके शरीर में कैसी कशिश चल रही है। वे तो उसका इलाज करने में लगे हैं और वह किसी और प्रवाह में बह रही है !. अपने ऊपर नव्या को शर्म आने लगी और मन ही मन गुरूजी का धन्यवाद किया कि वे उसके ऊपर से उठ गए और उसको ढक दिया। अब उन्हें नव्या की योनि की अवस्था का पता नहीं चलेगा, जो कि सम्भोग के लिए तत्पर हो रही थी। थोड़ी देर में गुरूजी का लिंग मायूस हो कर सिकुड़ गया और नव्या की योनि भी बुझ सी गई। दोनों को इससे राहत मिली। नव्या नहीं चाहती थी कि गुरूजी को उसकी कामोत्तेजना के बारे में पता चले। कहीं वे उसे बुरी और. बदचलन लड़की न समझने लगें। उधर गुरूजी नहीं चाहते थे कि नव्या उनके लिंग के विराट रूप को देख ले। उन्हें डर था नव्या डर के मारे भाग ही न जाए। वे नव्या के साथ अपने रिश्ते को धीरे धीरे विकसित करना चाहते थे. और एक लम्बा सम्बन्ध बनाना चाहते थे।.  . गुरूजी को जब यकीन हो गया कि उनका लंड नियंत्रण में आ गया है और उनकी निकर के आकार को नहीं ललकार रहा तो वे उठ खड़े हुए और नव्या को चित लेट जाने का आदेश दे कर कमरे से बाहर चले गए। नव्या एक आज्ञाकारी. शिष्या कि भांति चादर के नीचे ही करवट बदल कर सीधी हो गई। हालाँकि वह चादर के नीचे थी, फिर भी सहसा उसने अपने हाथों से अपने स्तन ढक लिए ताकि उसके वक्ष की रूपरेखा चादर पर न खिंचे।  . वहां गुरूजी ने गुसलखाने में जाकर अपने नटखट लंड को नियंत्रण में लाने के लिए एक बार फिर मामला हाथ में लिया और हस्त मैथुन करने लगे। वे दुबारा अपने आप को ऐसी स्थिति में नहीं लाना चाहते थे जहाँ उन्हें. नव्या से हाथ धोना पड़े। कुछ देर के प्रयास के बाद गुरूजी का लंड एक बार फिर लावा उगलने लगा, पर इस बार पहले की भांति का ज्वालामुखी नहीं था। एक फुलझड़ी के मानिंद था। गुरूजी को इस राहत से तसल्ली मिली और वे एक नए भरोसे के साथ नव्या के पास आ गए। उनका लिंग एक भीगी बिल्ली की तरह असहाय सा निकर में लटक रहा था और गवाएँ हुए दो मौकों का अफ़सोस कर रहा था।.  . नव्या के चित्त लेटने से एक समस्या यह खड़ी हुई कि अब दोनों एक दूसरे को देख सकते थे। पर दोनों ही एक दूसरे से आँख नहीं मिलाना चाहते थे क्योंकि दोनों के मन में ग्लानि भाव था।एक अजीब सी चुप्पी का वातावरण. छा गया था। इतने में नव्या ने अपने हाथ चादर से बाहर निकाल कर अपनी आँखों पर रख लिए और आँखें मूँद लीं। उसे शायद ज्यादा शर्म महसूस हो रही थी क्योंकि नंगी तो वह थी !!! उसकी इस हरकत से दो फायदे हुए। एक तो. दोनों की आँखों का संपर्क टूट गया और दूसरे नव्या के वक्ष स्थल से उसके हाथों का बचाव चला गया। नव्या की साँसें उसकी छाती को ऊपर नीचे कर रहीं थीं जिस से उसके स्तनों के ऊपर रखी चादर ऊपर नीचे खिसक रही थी।. इस चादर की रगड़ से उसकी चूचियों में गुदगुदी हो रही थी और वे उभर कर खड़ी हो गई थीं। उसके वक्ष की रूप रेखा अब चादर पर स्पष्ट दिखाई दे रही थी। गुरूजी को यह दृश्य बहुत अच्छा लगा।. गुरूजी ने अपने काम पांव की तरफ से आरम्भ किया। वे नव्या की छाती पर पड़ी चादर को नहीं छेड़ना चाहते थे। उन्होंने नव्या के पांव से लेकर जांघों तक की चादर उघाड़ दी और तेल की मालिश करने लगे। तलवे तो पहले ही. हो चुके थे फिर भी उन्होंने तलवों पर कुछ समय बिताया क्योंकि वे नव्या को गुदगुदा कर उसकी उत्तेजना को कायम रखना चाहते थे। तलवों के विभिन्न हिस्सों का संपर्क शरीर के विभिन्न अंगों से होता है और सही जगह. दबाव डालने से कामेच्छा जागृत होती है। इसी आशा में वे उसके तलवों का मसाज कर रहे थे। नव्या को इसमें मज़ा आ रहा था। कुछ देर पहले उसकी कामुक भावनाओं पर लगा अंकुश मानो ढीला पड़ रहा था। गुरूजी की उंगलियाँ. उसके शरीर में फिर से बिजली का करंट डाल रही थीं।.
स्रोत:इंटरनेट