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Masterji Shishya Sex Story In Hindi 2

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नव्या ने पूछा,”क्या करना होगा?” गुरूजी ने बोला,”घबराने की बात नहीं है। मेरे पास एक आयुर्वैदिक तेल है जिसको पूरे शरीर पर कुछ दिन लगाने से ठीक हो जायेगा। मेरे परिवार में भी 1-2 जनों को था। इस तेल से वे ठीक हो गए। अगर तुम चाहो तो मैं लगा दूं।”. नव्या सोच में पड़ गई कि क्या करे। उसका असमंजस दूर करने के लिए गुरूजी ने सुझाव दिया कि बेहतर होगा यह बात कम से कम लोगों को पता चले वरना लोग इसे छूत की बीमारी समझ कर तुम्हारे परिवार को गाँव से बाहर. निकाल देंगे। फिर थोड़ी देर बाद खुद ही बोले कि तुम्हारा इलाज मैं यहाँ पर ही कर दूंगा। तुम अगले ७ दिनों तक स्कूल के बाद यहाँ आ जाना। यहीं पर तेल की मालिश कर दूंगा और उसके बाद स्नान करके अपने घर चले जाया. करना। किसी को पता नहीं चलेगा और तुम्हारे यह दाग भी चले जायेंगे। क्या कहती हो?.  . बेचारी नव्या क्या कहती। वह तो गुरूजी के बुने जाल में फँस चुकी थी। घरवालों को गाँव से निकलवाने के डर से उसने हामी भर दी। गुरूजी अन्दर ही अन्दर मुस्करा रहे थे।. गुरूजी ने कहा, “नेक काम में देरी नहीं करनी चाहिए। अभी शुरू कर देते हैं !” वे उठ कर अन्दर के कमरे में चले गए और वहां से एक गद्दा और दो चादर ले आये। गद्दे और एक चादर को फर्श पर बिछा दिया और दूसरी चादर नव्या को देते हुए बोले,”मैं यहाँ से जाता हूँ, तुम कपड़े उतार कर इस गद्दे पर उल्टी लेट जाओ और अपने आप को इस चादर से ढक लो।” जब तुम तैयार हो जाओ तो मुझे बुला लेना। नव्या को यह ठीक लगा और उसने सिर हिला कर हाँ कर दी। गुरूजी फट से दूसरे कमरे में चले गए।. उनके जाने के थोड़ी देर बाद नव्या ने इधर उधर देखा और सोफे से उठ खड़ी हुई। उसने कभी भी अपने कपड़े किसी और घर में नहीं उतारे थे इसलिए बहुत संकोच हो रहा था। पर क्या करती। धीरे धीरे हिम्मत करके कपड़े. उतारने शुरू किये और सिर्फ चड्डी में गद्दे पर उल्टा लेट गई और अपने ऊपर चादर ले ली। थोड़ी देर बाद उसने गुरूजी को आवाज़ दी कि वह तैयार है।. गुरूजी अन्दर आ गये और गद्दे के पास एक तेल से भरी कटोरी रख दी। वे सिर्फ निकर पहन कर आये थे। कदाचित् तेल से अपने कपड़े ख़राब नहीं करना चाहते थे। उन्होंने धीरे से नव्या के ऊपर रखी चादर सिर की तरफ से हटा. कर उसे पीठ तक उघाड़ दिया। नव्या पहली बार किसी आदमी के सामने इस तरह लेटी थी। उसे बहुत अटपटा लग रहा था। उसने अपने स्तन अपनी बाहों में अच्छी तरह अन्दर कर लिए और आँखें मींच लीं। उसका शरीर अकड़ सा रहा था. और मांस पेशियाँ तनाव में थी। गुरूजी ने सिर पर हाथ फेर कर उसे आराम से लेटने और शरीर को ढीला छोड़ने को कहा। नव्या जितना कर सकती थी किया। पर वह एक अनजान सफ़र पर जा रही थी और उसके शरीर के एक एक हिस्से को. एक अजीब अहसास हो रहा था।.  . गुरूजी ने कुछ देर उसकी पीठ पर हाथ फेरा और फिर दोनों हाथों में तेल लेकर उसकी पीठ पर लगाने लगे। ठंडे तेल के स्पर्श से नव्या को सिरहन सी हुई और उसके रोंगटे खड़े हो गए। पर गुरूजी के हाथों ने रोंगटों को. दबाते हुए मालिश करना शुरू कर दिया। शुरुआत उन्होंने कन्धों से की और नव्या के कन्धों की अच्छे से गुन्दाई करने लगे । नव्या की तनी हुई मांस पेशियाँ धीरे धीरे आराम महसूस करने लगीं और वह खुद भी थोड़ी. निश्चिंत होने लगी। धीरे धीरे गुरूजी ने कन्धों से नीचे आना शुरू किया। पीठ के बीचों बीच रीढ़ की हड्डी पर अपने अंगूठों से मसाज किया तो नव्या को बहुत अच्छा लगा। अब वे पीठ के बीच से बाहर के तरफ हाथ चलाने. लगे। पीठ के दोनों तरफ नव्या की बाजुएँ थीं जिनसे उसने अपने स्तन छुपाए हुए थे। गुरूजी ने धीरे से उसके दोनों बाजू थोड़ा खोल दिए जिस से वे उसकी पीठ के दोनों किनारों तक मालिश कर। सकें। गुरूजी ने तेल की. कटोरी अपने पास खींच ली और नव्या की पीठ के ऊपर दोनों तरफ टांगें कर के उसके ऊपर आ गए। इस तरह वे पीठ पर अच्छी तरह जोर लगा कर मालिश कर सकते थे।.  . नव्या के नितंब अभी भी चादर से ढके थे। गुरूजी के हाथ रह रह कर नव्या के स्तनोंके किनारों को छू जाते। पर वह इस तरह मालिश कर रहे थे मानो उन्हें नव्या के शरीर से कुछ लेना देना न हो। उधर नव्या को अपने. स्तनों के आस पास के स्पर्श से रोमांच हो रहा था। वह आनंद ले रही थी। यही कारण था कि उसके बाजू स्वतः ही थोड़ा और खुल गए जिस से गुरूजी के हाथों को और आज़ादी मिल गई। गुरूजी पुराने पापी थे और इस तरह के. इशारे भांप जाते थे सो उन्होंने अपनी मालिश का घेरा थोड़ा और बढ़ाया। दोनों तरफ उनके हाथ नव्या के स्तनों को छूते और नीचे की तरफ नितंबों तक जाते।. नव्या के इस छोटे से प्रोत्साहन से गुरूजी में और जोश आया और वे उसकी पीठ पर ऊपर से नीचे तक और दायें से बाएं तक मालिश करने लगे। कभी कभी उनकी निकर नव्या के चादर से ढके नितंब को छू जाती। नव्या की तरफ से. कोई आपत्ति नहीं होते देख गुरूजी ने उसके नितंब को थोड़ा और ज़ोर से छूना शुरू कर दिया। जिस तरह एक पहलवान दंड पेलता है कुछ उसी तरह गुरूजी नव्या के ऊपर घुटनों के बल बैठ कर उसकी पीठ पेल रहे थे। कभी कभी. उनका लिंग, जो कि इस प्रक्रिया के कारण उठ खड़ा था, निकर के अन्दर से ही नव्या के चूतडों को छू जाता था। नव्या आखिर जवानी की दहलीज पर कदम रखने वाली एक लड़की थी, उसके मन को न सही पर तन को तो यह सब अच्छा ही लग रहा था।. अब गुरूजी ने पीठ से अपना ध्यान नीचे की तरफ किया। पर नितम्बों की तरफ जाने के बजाय वे नव्या के पाँव की तरफ आ गए। उन्होंने नव्या के ऊपरी शरीर को चादर से फिर से ढक दिया और पाँव की तरफ से घुटनों तक उघाड़. दिया। इससे नव्या को दुगनी राहत मिली। एक तो ठंडी पीठ पर चादर की गरमाई और दूसरे उसे डर था कहीं गुरूजी उसकी मजबूरी का फ़ायदा न उठा लें। गुरूजी को मन ही मन वह एक अच्छा इंसान मानने लगी। उधर गुरूजी , लम्बी दौड़ की तैयारी में लगे थे। वे नहीं चाहते थे कि नव्या आज के बाद दोबारा उनके घर लौट कर ही न आये। इसलिए बहुत अहतियात से काम ले रहे थे। हालाँकि उनका लिंग बेकाबू हो रहा था। इसी लिए उन्होंने निकर के नीचे. चड्डी के बजाय लंगोट बाँध रखी थी जिसमें उनके लिंग का विराट रूप समेटा हुआ था। वरना अब तक तो नव्या को कभी का उसका कठोर स्पर्श हो गया होता।.  . गुरूजी ने नव्या के तलवों पर तेल लगा कर मालिश शुरू की तो नव्या यकायक उठ गई और बोली, “यह आप क्या कर रहे हैं?”  . ऐसा करने से नव्या के नंगे स्तन गुरूजी के सामने आ गए। हड़बड़ा कर उसने जल्दी से अपने आपको हाथों से ढक लिया। पर गुरूजी को दर्शन तो हो ही गए थे। गुरूजी के लिंग ने ज़ोर से अंगड़ाई ली और अपने आपको लंगोट की. बंदिश से बाहर निकालने की बेकार कोशिश करने लगा। नव्या के स्तन छोटे पर गोलाकार और गठे हुए थे। अभी इन्हें और विकसित होना था पर किसी मर्द को लालायित करने के लिए अभी भी काफी थे। इस छोटी सी झलक से ही गुरूजी. के मन में वासना का अपार तूफ़ान उठ गया पर वे दूध के जले हुए थे। इस छाछ को फूँक फूँक कर पीना चाहते थे। उन्होंने दर्शाया मानो कुछ देखा ही न हो। बोले, “नव्या यह तुम्हारे उपचार की क्रिया है। इसमें तुम्हे संकोच नहीं होना चाहिए। तुम मुझे गुरूजी के रूप में नहीं बल्कि एक चिकित्सक के रूप में देखो। एक ऐसा चिकित्सक जो कि तुम्हारा हितैषी और दोस्त है। अब लेट जाओ और मुझे मेरा काम करने दो वरना तुम्हें घर. लौटने में देर हो जायेगी।”.
स्रोत:इंटरनेट