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Mera Beta Ab Bada Ho Gaya Hai 2

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करण को यह लगा कि वो जरूर उसे डॉटने आयी है और बताने आयी है कि वो उसकी इस हरकत से कितना शर्मिन्दा है.
अपना मुंह झुकाकर वो इसकी प्रतीक्षा करने लगा.
लेकिन उसे ये सुनकर अचम्भा हुआ कि “ करण मैं तुझे डॉटने नही आयी हूँ.
मैं दरअसल यहाँ सोने आयी हूँ.
तेरे पापा वहाँ इतनी आवाज कर रहे हैं कि मुझे नींद नही आ रही है”.
यह कह कर कविता बिस्तर पर लेट गयी.
“चल अब तू भी आ जा”.
करण ने उसे थोड़ी उलझन से देखा पर कहना मानते हुये उसके पास जाकर बैठ गया.
कविता कुछ समय तक चुप रही फिर उससे पूछा “ करण, तू वो रोज करता है?”.
उसने शरमातें हुये अपनी गरदन हिला दी.
“वो किताब कौन सी है, जिसको तू देख रहा था उस समय? मुझे दिखा जरा”.
करण ने उसे आश्चर्य से देखा कि वो किताब क्यों मांग रही है.
पर जब उसने दुबारा किताब मांगी तो करण ने गद्दे के नीचे से निकाल कर दे दी.
कविता ने रोशनी जलायी और किताब खोल दी.
यह नग्न लड़कियों के लुभावनी मुद्राओं के दृश्यों से भरी हुयी थी.
“करण इनमें से सबसे अच्छा फोटो कौन सा लगता है तुझे?”, जैसे ही करण ने यह सुना उसे उत्तेजना का अनुभव हो लगा.
यद्यपि वो अभी भी बहुत उलझन में था.
जो कुछ भी हो रहा था, उस पर यकीन करना कठिन था-उसकी माँ रात के 4 बजे उसके पास लेटी हुयी एक गन्दी किताब के पृष्ठ पलटते हुये उसकी सबसे मनपसन्द फोटो के बारे में पूछ रही हैं! उसे अपनी माँ के इरादों के बारे में कुछ भी पता नही था, लेकिन यह लगने लगा था कि कुछ दिलचस्प होने वाला है.
कविता ने एक बार फिर उससे पूछा “ बता ना, सबसे अच्छा कौन सा लगता है तुझे?”.
करण ने शरमातें हुये किताब ली और अपनी मनपसन्द फोटो वाला पेज खोल दिया.
कविता ने फोटोवाली लड़की को देखा.
वो एक बड़ी छातियों वाली विलासी लड़की थी.
कविता ने लड़की की छातियों की तरफ इशारा करते हुये करण से पूछा “ ये इतने बड़े-बड़े है, इसीलिये अच्छी लगती हैं ना तुझे?” करण अबतक बुरी तरह से उत्तेजित हो चुका था.
उसने अपनी माँ के चेहरे की ओर देखा.
जो उसकी ओर बड़ी ममता और स्नेह से देख रही थी.
फिर वो मुस्करायी और बोली,”करण इतना शरमा मत.
मेरे सवाल का जवाब दे ना”.
करण ने सिर हिलाया.
बड़ी छातियों की वजह से ही वो लड़की उसे इतनी पसन्द थी.
कविता अब तक पूरी तरह से उत्तेजित हो चुकी थी.
उसने सोचा कि यही समय वो पता करने का है जो वो अपने बेटे से चाहती थी.
उसने साड़ी का पल्लू एक तरफ गिरा कर अपनी छातियों को अपने हाथों में भर लिया और बोली, “देख, मेरे तो इस लड़की से भी ज्यादा बड़े है”.
यह सुन कर करण उसके चेहरे को एकटक घूरता ही रह गया.
उसका आवेश अब चेहरे पर साफ झलक रहा था, यह देखकर कविता का साहस और बढ़ गया.
“रूक मैं तुझे ब्लाउज खोल कर दिखाती हूँ”.
यह कह कर उसने तेजी से अपना ब्लाउज खोल दिया.
ब्रेजरी में कस कर बन्धी उसकी छातियाँ सामने आ गयी.
अब वो करण का एक हाथ ब्रेजरी के हूक पर ले गयी और खोलने को कहा.
कपकपांते हाथों से करण ने हूक खोल दिया.
कविता ने जल्दी से ब्रा उतारी और फर्श पर फेंक दी.
करण उसकी सुन्दर छातियों को एकटक घूरने लगा.
वो बड़ी और सुडौल थीं तथा बाकि के शरीर की तरह ही साँवली थीं.
चूचिया (निप्पल) बड़ी थी और सख्त लग रही थी.
करण पहली बार किसी औरत की छातियाँ देख रहा था और ये छातियाँ किसी और की नही बल्कि उसकी अपनी माँ की है, यह ख्याल उसे बुरी तरह उत्तेजित कर रहा था.
इतना आवेश उसने पहले कभी अनुभव नही किया था.
अभी तक करण ने अपनी माँ के अलावा किसी ओर नजर से नही देखा था पर पहली बार उसे लगा उसकी माँ भी एक कामोत्तेजक औरत है.
वास्तव में उसके स्कूल के दोस्त अगर उसकी माँ को देखेंगे तो “माल” बोलेंगे.
करण अब कविता की छातियों को छूने के लिये बेताब हो रहा था और जब कविता ने उससे शरारती आवाज में कहा,”करण, इनको छूने का मन नही कर रहा क्या तेरा?”, उसने तुरंत अपने हाथ कविता की छातियों पर रख दिये.
छातियों पर फेरते समय उसके हाथ उत्त्तेजना से काँपने से लगे.
उसके दिमाग में कहीं न कहीं यह था कि जो कुछ हो रहा है वो गलत और पाप है पर अत्यधिक काम-वासना के कारण अपनी माँ की तरह वो भी आत्मा की आवाज की परवाह नही कर रहा था.
फिर भी उसे यह सोचकर डर लगा कि कहीं उसके पापा उठ गये और उन्होने ने उन लोंगो को इस तरह देख लिया तो! इसीलिये उसने अपनी माम से कहा,”मम्मी, पापा या अजय जाग गये तो!”.
कविता जानती थी कि जो कुछ भी वो कह रहा था वो नामुमकिन नहीं था.
लेकिन अशोक बहुत गहरी नीन्द में सोता था इसलिये उसके उसके जागने की सम्भवना बहुत कम थी.
उसका छोटा बेटा अजय भी गहरी नीन्द में सोने वालों में था.
इससे भी ज्यादा इस समय उस के ऊपर वासना इस कदर सवार थी कि अब वो रूकना नही चाहती थी.
बड़ी मुलायम और शान्त आवाज में वह बोली,”उसकी चिंता मत कर.
तेरे पापा रात को एक बार सोते हैं, तो फिर सीधा सुबह को ही उठते हैं.
और तेरा छोटा भाई भी वैसा ही है.
” अब दोनों ही संयम खोते जा रहे थे.
और अब तक उन्हें पता चल गया था कि उन्हें एक दूसरे की जरूरत है.
नमता भी उतावली होने लगी थी.
जल्दी से उसने अपने बेटे की शर्ट खोल दी.
फिर पैंट खोल कर घुट्ने तक उतार दी.
लिंग के कसाव के कारण उसकी अण्डी एक तम्बू की तरह लग रही थी.
व्यग्रतासे कविता ने उसे नीचे उतार दिया.
वो एकटक अपने बेटे के पूरे कसाव को देखने लगी.
प्यार से उसने लिंग को हाथ में लिया और कोमलता से उसे सहलानी लगी.
वो नही चाहती थी कि करण का अभी से वीर्यपतन हो.
उसे लगा कि अब पूरे कपड़े उतारने का समय आ गया है.
वो बिस्तर के पास खड़ी हो गयी और अपनी साड़ी उतार दी.
इसके बाद पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया, पेटीकोट घुटनों से होता हुआ फर्श पर गिर पड़ा.
फिर उसने पहले से ही खुले हुये ब्लाउज को उतार कर फर्श पर फेंक दिया.
जब पेंटी की बारी आयी तो उसने सोचा कि ये काम करण को करने देते हैं.
”करण ये उतार”.
करण उत्साहपूर्वक उसकी पेंटी उतारने लगा.
माँ की रोयेंदार झाड़ियाँ सामने आने पर उसने किसी तरह अपनी उत्तेजना को दबाया.
उन रोयेंदार झाड़ियों के बीच ही उसकी माँ की योनि थी.
वो इतनी सुन्दर लग रही थी कि वो उसे छूने के लिये उतावला हो गया.
अपनी पेंटी उतारने के बाद कविता ने अपने बेटे को पूर्ण नग्न होने में मदद की.
फिर वो बिस्तर पर लेट गयी और करण से फुसफुसा कर बोली,”चल मेरे उपर आ जा”.
करण के ऊपर आने पर कविता ने उसे अपनी बाँहों मे कस लिया.
दोनों ने एक क्षण के लिये एक दूसरे को देखा.
अब कविता ने फुसफुसा कर कहा,” करण, एक पप्पी दे अपनी मम्मी को”.
यह सुनते ही उसने अपने होंट कविता के होंटों पर रख दिये.
मुंह खोलने पर जब उनकी जीभे मिली तो ऐसे आनन्द की अनुभूति हुयी, जो पहले कभी भी नही हुआ था.

स्रोत:इंटरनेट