. “मैं नहीं पहचान सकता, आप खुद ही बताएं आप कौन हैं,”
. “आपकी की मंगेतर हूँ,”
. “ओह, अरे तुम?”
. “janaab आप भी मेरी तरह एक ही नज़र मैं चारों खाने चीत हो गए”,
“यह तुम ….
कैसी …बातें……कर रही हो? फोन पर ऐसी बातें नहीं की जाती”
“तो फिर सामने आ कर बात कीजिये”. “उफ! फिर कभी बात कर लेना सामने तुम्हारे पापाजी बैठे हैं, मैं बात कैसे कर सकता हूँ?’
“शाम को आने का वादा कीजिये,”
“कैसी बातें करती हो? मैं कैसे आ सकता हूँ?”. “चाहे जैसे आइये, मैं आपको देखने के लिए बैचैन हूँ,”
. . “ठीक है शाम को आउंगा,”
वादा करके साहिल नहीं आया, अगले रोज मैं ऑफिस पहुँच गई, मैने पापा को साहिल के साथ घुमने जाने की सुचना दी और साहिल को पकड़ कर बाहर ले आई,
. “आपको दीन – दुनिया का बड़ा लिहाज़ है, मैं आपको देखने के लिए तरस तरस कर मर जाऊं,कोई परवाह नहीं”
मैं दिन भर साहिल के साथ घुमती रही, यहाँ वहाँ की खूब बातें की, शाम को जबरदस्ती घर भी ले आई, उस दिन से साहिल की हिचक दूर हुई और मेरे घर कभी कभी आने लगा,
मैं उसकी तारीफ़ करते नहीं थकती थी, उसकी सुन्दरता को मैं अपनी खुशनशिबी बताती थी, मैं भी उसे बहूत सुंदर लगती थी लेकिन तारीफ़ मैं मैं थोडे ही शब्द उगलता था, वह कुछ दब्बू प्रबृति का लगा, मैने सोचा, ठीक है, पसंद तो है, दब्बू है तो लगाम मेरे हाँथ मैं रहेगी,
मैं रोमांटिक मज़ाक भी कर जाती, जबकि वह सुन लेता था,जवाब मैं रोमांटिक मज़ाक नहीं नहीं करता था,
मैने एक दिन उसकी हथेलियों को चूम लिया तो बोला “अरे!”. बहूत दबाव डाला तो मेरे साथ फिल्म देखने को राजी हुआ, हमने कार्नर की टिकटें लीं और अंदर जा बैठ गए, मैं किनारे वाली सीट पर बैठी थी,बत्ती बुझी तो मैने उसका हाँथ अपने हाँथ मैं ले लिया, फिल्म देखते हुवे मैं उसका हाँथ सहलाते जा रही थी,
. बीच मैं एक दृश्य से प्रभावित होकर मैने उसका हाँथ अपने सीने से लगाया ही था की उसने हाँथ खीच लिया, मुझे तो निरा बुढहू ही लगा, मैं और खुश हुई की मेरा मनपसंद बलमा बुद्धू भी है, मैने उसे चिढाने के उद्देश्य से अपना हाँथ उसकी जांघ पर रख कर ऊँगली गडा दी,
. “बहुत बदतमीज लड़की हो” यह कह कर साहिल झटके से उठा और से हाल बाहर चला गया,बड़ी देर तक मैने इन्तजार किया, वह लौटा ही नहीं,मैं रोमांटिक मुड़ मैं थी, वह मज़ा किरकिरा गया था,
. इंटरवेल मे मैने बाहर निकल कर देखा, साहिल कहीं नज़र नहीं आया,मैं लौट कर अपनी सीट पर बैठ गई,
. साहिल की सीट खाली पड़ी थी,उस सीट के बाद जो युवक बैठा था, बार बार मेरी ऑर देखने लगा, दो – तीन बार उससे नज़र भी मिली,
. फिल्म आगे शुरू नहीं हुई थी,बत्तियां जल रही थी,वह युवक उठ कर करीब आया और पूछने लगा,
. “यह सीट खाली है क्या?’. मेरे जवाब देने से पहले ही वह मेरी बगल में साहिल की सीट पर बैठ गया, खुश्बू का एक झोंका आया,मन प्रफुळित हो उठा, उसने कोई बहुत ही अछ्छा सेंट लगा रखा था,मैने उसकी ऑर ताक़ दीया,
वह युवक निम्न स्तर का नहीं था, इसलिए मैने वहाँ बैठने पर विरोध नहीं किया, उसके जिस्म से उठने वाली खुशबु ने मुझे साहिल की ऑर से लापरवाह बना दिया, में बार बार उस युवक की ऑर देख बैठती थी,
बत्ती बुझी, फिल्म शुरू हो गई,
यह तो निश्चित है की वह मेरे रूप के आकर्षण से मेरे समीप आ बैठा था, लेकिन में सोच भी नहीं सकती थी की वह युवक मेरे हाँथ पर हाँथ रख बैठेगा, मैने अपना हाँथ नहीं हटाया रोमांटिक मूड में तो में पहले से ही थी, थोडी देर बाद उसने मेरी हथेली पर हथेली रख कर उंगुलियों में उंगुलियां फंसा ली,
. मैने उसकी ऑर एक नज़र देखकर आँख पर्दे पर टीका दी,
कभी-कभी वह किसी सीन से प्रभावित होता तो मेरी हथेली को जोर से दबा देता था,ऐसा एकाध बार में भी भूलकर कर बैठी थी, वह फिल्म ख़त्म होने तक हाँथ को अपने कब्जे में किये रहा, उसने आगे और कोई बदतमीजी नहीं की, इसलिए मुझे अच्छा लग गया, फिल्म ख़त्म होने पर दरवाजे तक मेरा पकडे पकडे गया, लेकिन बाहर निकालने से पहले हाँथ छोड़ दिया, उसे शायद चिंता थी की मेरा नाराज साथी न देख ले….
बाहर निकल कर मुझसे पूछा “मेरे साथ चाय पीना पसंद करेंगी आप,”
. में इनकार नहीं कर सकी,हम दोनों कैंटीन में जा बैठे, थोडी देर बाद दूसरा शो शुरू हो गया तो कैंटीन में सन्नाटा छा गया, वह युवक बड़ी मीठी मीठी बातें कर रहा था, में बहूत देर तक उसके साथ बैठी बातें करती रही, इतनी देर में दुनिया ही बदल गई उसने मेरा दिल जीत लिया था,मुझे उससे और उसे मुझसे प्यार हो गया, उसका नाम हरमन है,
हम फिर मिलने का स्थान और समय तय करके विदा होने लगे तो वह बोला, “चलिए में आपको बस में बिठा दूँ”
. मुझे अच्छा लगा, कैंटीन के आगे जब हम गैलरी में पहुंचे तो वह ठिठक गया,
. “कुछ तो दे जाइए, ताकि उसके सहारे वक्त कट जाए”
. में समझ गई, मुस्करा कर पलकें झुका लीं, हरमन ने मेरे चेहरे को थाम कर मेरे होंठों पर एक चुम्बन अंकित कर दिया, मैने पूछा “बस? इसी के सहारे ककत काट लोगे,”
. “हाँ! कुछ वक्त! कल मिलने तक का वक्त!”सारी उम्र तो अब आपके बगैर नहीं काट सकूँगा,” इसके बाद हम विदा हो गए,
साहिल की तुलना में हरमन ने मुझे ज्यादा प्रभावित किया,फिर भी मैने अगले रोज साहिल को फोन किया तो बोला
“जरा धीरज रखो, शादी हो जाने दो फिर चाहे जितना मेरे साथ घूमना, चाहे जितना मुझे देखना,”
मैने फोन काट दिया,
. अगले रोज मैने हरमन के साथ फिर एक फिल्म देखी, उस दिन हाँथ के अलावा उसने मेरे उरोजों को भी सहलाया, और जब मेरी जांघ पर हाँथ रखा तो मैने भी उसकी जांघ पर हाँथ रख दिया, बीच में हरमन ने लोगों की नज़र बचा कर बड़ी मुश्किल से एक चुम्बन भी लिया,
उसने ऊँगली योनी पर गडा कर कहा, “साथ में महबूब हो तो फिल्म देखने का मज़ा आ जता है,”
मैने उसके कठोर लिंग को पेंट के उपर से ही दबा कर कहा,”सच तुम्हारे साथ तो फिल्म देखने का मज़ा आ गया,”
. हकीकत भी यही थी,
मेरे दिलो दिमाग में मंगेतर साहिल का कोई मह्त्व नहीं रह गया था, उसकी जगह हरमन ने ले ली थी,यह परिवर्तन मात्र २४ घंटो के अंदर हुआ था, सूरत शक्ल में साहिल थोडा सा आगे जरूर था, लेकिन हरमन उसकी तरह न तो बुद्ध था और न ही रुढिवादी लगा, यही कारण है की हरमन का वजूद बढ़ गया और साहिल का घट गया, यह स्पस्ट हो गया की साहिल वेशभूषा के माध्यम से आधुनिकता का दिखावा करता है, जबकि उसका मन-मस्तिष्क निरा गंवार है और हरमन तन और मन से भी आधुनिक और एडवांस था,
हरमन ने समीपता हासिल करते ही मुझे यौन-भावनाओं में सराबोर ही दिया था, उसके अंदर शर्म और हिचक नाम मात्र को ही थी, मैने खुद ऐसे प्रेमी की कामना की थी जो बहुत तेज सेक्सी उड़ान भर सकता हो, और मेरी ये कामना पूरी होती नज़र आई हरमन को पा कर,
तीसरे दिन हरमन मुझे ऐसी जगह ले गया जिसके बारे में मैने सुन तो रखा था लेकिन देखा नहीं था,वहाँ आमतौर पर पैसे वाले लोग ही जाते हैं, जिनकी रग-रग में आधुनिकता समां चुकी होती है, शादी से पहले उस जगह को देखने की मेरी औकात नहीं, शादी के बाद जरूर उम्मीद रखती थी की वहाँ जाया करुँगी,
स्रोत:इंटरनेट