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Naukar Naukrani Maa Village Sex Kahani

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जब मैं शहर से वापिस अपने गाँव पंहुचा तो मुझे अपने घर का माहौल थोडा अजीब लगा। ऐसा लग रहा था की घर के नौकर मुझे लेकर कुछ मेरी माँ से माँगना चाह रहे थे। पर क्या? जानिए इस village sex kahani में.. जब यह सब मादक घटनाएं घटना शुरू हुईं तब मैं काफी छोटा था। अभी अभी किशोर अवस्था में कदम रखा था। गाँव के बड़े पुश्तैनी मकान में मैं कुछ ही दिन पहले माँ के साथ रहने आया था। नौ साल की उम्र से मैं शहर में. मामा के यहाँ रहता था और वहीँ स्कूल में पड़ता था। तब गाँव में सिर्फ प्राइमरी स्कूल था , इसलिए माँ ने मुझे पढने शहर भेज दिया था। अब गाँव में हाई स्कूल खुल जाने से माँ ने मुझे यहीं बुलवा लिया था कि दसवीं तक की पूरी पढाई मैं यहीं कर सकूँ।.  . घर में माँ, मैं हमारा जवां 22 साल का नौकर राजू और उसकी माँ चमेली रहते थे। चमेली हमारे यहाँ घर में नौकरानी थी। चालीस के आस पास उम्र होगी। घर के पीछे खेत में एक छोटा मकान रहने को माँ ने उन्हें दे दिया था। जब मैं वापस आया तो माँ के साथ साथ चमेली और राजू को भी बहुत ख़ुशी हुई। मुझे याद है कि बचपन से चमेली और राजू मुझे बहुत प्यार करते थे। मेरे सारी देखभाल बचपन में राजू ही किया करता था।.  . वापिस आने के दो दिन में ही मैं समझ गया था कि माँ राजू और चमेली को कितना मानती थी। वे हमारे यहाँ बहुत सैलून से थे। मेरे जन्म के भी बहुत पहले से। असल में माँ उन्हें शादी के बाद मायके से ही ले आई थी। अब. मैंने महसूस किया कि माँ की उनसे घनिष्टता और बढ़ गयी थी। वे उनसे नौकर जैसा नहीं बल्कि घर के सदस्य जैसा बर्ताव करती थी। राजू तो माँ जी मां जी कहता हमेशा उसके आगे पीछे घूमता रहता था।. घर का सारा काम माँ ने चमेली के सपुर्द कर रखा था। कभी कभी चमेली माँ से ऐसे पेश आती थी। जैसे चमेली नौकरानी नहीं बल्कि माँ की जेठानी हो। कई बार वो माँ पर अधिकार जताते हुए उनसे डांट डपट भी करती थी। पर माँ. चुपचाप मुस्कराकर सब सहन कर लेती थी। इसका कारण मुझे जल्दी ही पता चल गया। जब से मैं आया था तब से चमेली और राजू मुझपे ख़ास ध्यान देने लगे थे। चमेली बार बार मुझे पकड़ कर सीने से लगा लेती थी और चूम लेती।.  . “मुन्ना, बड़ा प्यारा हो गया है तू , बड़ा होकर अब और खूबसूरत लगने लगा है , बिलकुल छोकरियों जैसे सुन्दर है, गोरा चिकना” चमेली कहती। माँ यह सुनकर अक्सर कहती, “अरे अभी बहुत छोटा बच्चा है , बड़ा कहाँ हुआ है।” तो चमेली कहती, “हमारे काम के लिए काफी बड़ा है , मालकिन” और आँखें नचाकर हंसने लगती। माँ फिर उसे डांट कर चुप करा देती। चमेली की बातों में छुपा अर्थ बाद में मुझे समझ में आया। राजू भी मेरी और देखता और अलग तरीके से हँसके बोलता. मुन्ना नहला दूं? बचपन में मैं ही नह्लाता था तुझे। मैं नराज होकर उसे डांट देता। वैसे बात सही थी। मुझे कुछ कुछ याद था कि बचपन में राजू मुझे नंगा करके नह्लाता था। तब वो 15 साल का होगा। मुझे वो कई बार चूम. भी लेता था। मेरी लुल्ली और चूतडों को वो खूब साबुन लगाकर रगड़ता था और मुझे वो बड़ा अच्छा लगता था। एक दो बार खेल खेल में राजू मेरी लुल्ली और चुतड चूम भी लेता और फिर कहता कि मैं माँ से ना कहूँ। वो मुझे. इतना प्यार करता और दिन भर मेरे साथ खेलकर मेरा मन बहलाता रहता इसलिए मैं चुप रहता था।. वैसे चमेली की यह बात सच थी कि अब मैं बड़ा हो गया था। माँ को भले ना मालूम हो पर चमेली ने शायद मेरे तने लंड का उभार पेंट में से देख लिया होगा। इस कमसिन उम्र में भी मेरा लंड खड़ा होने लगा था और पिछले ही. साल से मेरा मुठ मारना भी शुरू हो गया था। शहर में मैं गंदी किताबें चोरी से पड़ता था और उनमें कई नंगी औरतों की तस्वीरें देख कर मूठ मारता। बहुत मजा आता था औरतों के प्रति मेरी रूचि बहुत बढ़ गयी थी। खास कर. बड़ी खाए पिए बदन की औरतें मुझे बहुत अच्छी लगती थी।. गाँव आने के बाद गंदी किताबें मिलना बंद हो गया था। इसलिए अब मैं मन के लड्डू खाते हुए तरह तरह की औरतों के नंगे बदन की कल्पना करते हुए मूठ मारा करता था। आने के बाद माँ के प्रति मेरा आकर्षण बहुत बढ़ गया. था। सहसा मैंने महसूस किया था कि मेरी माँ एक बड़ी मतवाली नारी थी। उसके इस रूप का मुझ पर जादू सा हो गया था। शुरू में एक दिन मुझे अपराधी जैसा लगा था। पर फिर लंड में होती मीठी टीस ने मेरे मन के सारे बंधन. तोड़ दिए थे।.  .  . मेरी माँ दिखने में साधारण सुन्दर थी। भले ही बहुत रूपवती ना हो पर बड़ी सेक्सी लगती थी। 35 साल की उम्र होने से उसमें एक पके फल सी मिठास आ गयी थी। थोडा मोटा खाया पिया गोरा चिट्टा मांसल शरीर , गाँव के स्टाइल में जल्दी जल्दी पहनी ढीली ढीली साड़ी,चोली और चोली में से दिखते सफ़ेद ब्रा में कसे बड़े बड़े मुम्मे , इनसे वो बड़ी चुदैल सी लगती थी , बिलकुल मेरी ख़ास किताबों में दिखाई गईं चुदैल रंडियों जैसी।  . मैंने तो अब उसके नाम से मूठ मारना शुरू कर दिया था। अक्सर धोने को डाले हुए उसकी ब्रा या पैंटी मैं चुप चाप कमरे में ले आता और उसमें मूठ मारता। उन कपड़ों में से आती उसके शरीर की सुंगंध मुझे मतवाला कर. देती थी।.  . एक दो बार मैं पकडे जाते हुए बचा। माँ को अपनी पैंटी और ब्रा नहीं मिले तो वो चमेली को डांटने लगी। चमेली बोली कि माँ ने धोने डाली ही नहीं। किसी तरह से मैं दुसरे दिन उन्हें फिर धोने के कपड़ों में छुपा. आया। चमेली को शयद पता चल गया था क्योंकि माँ की डांट खाते हुए वो मेरी और देखकर मंद मंद हंस रही थी पर कुछ बोली नहीं बस माँ को बोली , “आजकल आपके कपडे ज्यादा मैले हो जाते हैं मालकिन , ठीक से धोने पड़ते हैं”।.  . मेरी जान में जान आई। मुझे ज्यादा दिन प्यासा नहीं रहना पड़ा। माँ वास्तब में कितनी चुदैल और छिनाल थी और घर में क्या गुल खिलते थे। यह मुझे जल्द ही मालूम हो गया। मैं एक दिन देर रात को अपने कमरे से पानी. पीने को निकला। उस दिन मुझे नींद नहीं आ रही थी। माँ के कमरे से कराहने की आवाजें आ रही थी। मैं दरवाजे से सट कर खड़ा हो गया और कान लगाकर सुनने लगा , सोचा माँ बीमार तो नहीं हैं। आहा… मर गयी रे….
चमेली… तू मुझे मार डालेगी आज …उइइइइ सीसीसी….
माँ की हल्की चीख सुनकर मुझे लगा कि ना जाने चमेली , माँ को क्या यातना दे रही है। इसलिए मैं अन्दर घुसने के लिए दरवाजा खटखटाने ही वाला था कि चमेली कि आवाज़ आई, “मालकिन , नखरे मत करो , अभी तो सिर्फ ऊँगली ही डाली है आपकी चूत में , रोज की तरह जीभ डालूँगी तो क्या करोगी” ?
स्रोत:इंटरनेट