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Teacher Kiya Pass Teacher Sex Kahani 2

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विवेक सर ने हमारे ग्लासों से अपना ग्लास टकराकर कहा- चियर्स….. ! तुम दोनों के विज्ञान में पास हो जाने की गारंटी की ख़ुशी में……यह कह कर उन्होंने अपना ग्लास अपने मुख से ना लगाकर परिधि के मुख से लगा दिया तो परिधि ने उसमें से एक घूंट भर लिया। परिधि ने अपना ग्लास मेरे होठों से लगा दिया, मैंने असमंजस की स्थिति में उसमे से एक घूंट भर लिया और यंत्रवत अपने ग्लास को विवेक सर के होंठों से लगा दिया, विवेक सर ने एक घूंट भर लिया और फिर हम अपने-अपने ग्लासों से बीयर पीने लगे। विवेक सर पैंतीस छत्तीस साल के आकर्षक व्यक्ति थे। उनका कद साढ़े पांच फुट या उससे दो एक इंच ज्यादा था, शरीर गठीला था इसलिए हरेक ड्रेस में जंचते थे। इस समय उन्होंने कुर्ते के नीचे लुंगी पहनी हुई थी, कुर्ते के चांदी के बटन खुले हुए थे, जहां से उनके चौड़े सीने के काले-काले घुंघराले बाल दिख रहे थे। यूँ तो मैंने इससे पहले अपने पिता के सीने के बाल देखे थे पर जैसी फिलिंग मुझे इस समय हुई वैसी फिलिंग पहले कभी नहीं हुई थी। उन्होंने भी एक घुटने की पालथी मारी हुई थी और दूसरे को ऊपर उठाया हुआ था। ऊपर उठे घुटने से लुंगी नीचे ढलक गई थी, इस कारण उनकी जांघ भी अंतिम छोर तक दिख रही थी। यूँ तो पूरी टांग पर ही घुंघराले बाल थे पर जांघ पर कुछ ज्यादा ही थे। वयस्क पुरुष की जांघ इस हद तक नंगी मैं पहली बार देख रही थी।. कैसे चुप हो काजल….. क्या कुछ सोच रही हो? विवेक सर ने कहा। जी….
जी…..नहीं तो ……! मैंने अपनी नजर उनकी जांघ से हटा कर कहा और ग्लास में से अंतिम घूंट भर कर ग्लास खाली किया। हालांकि सीलिंग फेन चल रहा था फिर भी मुझे कुछ गर्मी महसूस हुई, बगलों में पसीना भी महसूस हो रहा था, ऐसी ही स्थिति शायद परिधि ने भी महसूस की, तभी तो उसने अपनी शर्ट का एक बटन और खोल कर कहा- उफ ! ज़रा से स्टेप्स में ही कितनी गर्मी लग रही है ! एक और बटन के खुल जाने से उसकी शमीज का जरा सा हिस्सा प्रकट हो गया और स्तनों का ऊपरी भाग जहां शमीज नहीं थी उजागर हो गया।. अब नाचो भई ! जब थोड़ा थक जाओ तो फिर बीयर का दौर चल जाएगा !….
सर ने कहा। परिधि तुरंत खड़ी हो गई और उसने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे भी उठा लिया, मैं यंत्रवत सी उठ गई। परिधि ने म्यूजिक सिस्टम की आवाज जरा बढ़ा दी और फिर थिरकने लगी, वह मुझे भी अपने साथ नचाने लगी, मेरे भी पांव उठ गए, कमरे में गूंजती अंग्रेजी संगीत की स्वर लहरियां कामुकता के स्वर में डूबती जा रही थी और मेरे साथ थिरकती परिधि की हरकतें शरारतों का रूप लेती जा रही थी। वह जब-तब मेरी कमर में हाथ डाल कर उसे मेरे सुडौल नितंबों तक ले जाती, वहाँ से स्कर्ट को उपर सरका कर अपने हाथ उपर ले आती, कभी स्कर्ट को कमर तक घसीट लाती और मेरी जांघें पूरी की पूरी नग्न हो जाती या फिर मेरे गालों पर चुम्बन ही जड़ देती या मेरी बगल में हाथ डाल कर मेरे उन्नत व कठोर स्तनों को ही दबा जाती।. मेरे युवा शरीर में उसकी इन छेड़खानियों से एक रस सा घुलता जा रहा था, उसी रस के नशे में डूब कर मैं उसकी किसी भी हरकत का विरोध नहीं कर रही थी बल्कि स्वयं भी कई बार उसकी हरकतों का अनुसरण करते हुए उसके घुटनों पर हाथ ले जाकर हाथ को उसकी स्कर्ट में डाल देती या फिर उसकी कमर में हाथ डाल कर उसके हिलते स्तनों को पुश कर देती, हम दोनों के इस डांस का विवेक सर आँख फाड़-फाड़ आनंद ले रहे थे। पन्द्रह मिनट तक लगातार नाच कर परिधि ने मेरा साथ छोड़ दिया और विवेक सर के पास जाकर बैठ गई, मैं भी रुक गई और उसके पास जाकर बैठ गई। उफ….
यार विवेक ! ….
गर्मी बहुत है ! ….
शर्ट उतारनी पड़ेगी !….. तुम बीयर डालो….
! परिधि ने लापरवाही से यह कहते हुए शर्ट के सारे बटन खोल कर उतार दिया और एक कोने में डाल दिया।. उसके तने हुए स्तनों पर एक मात्र पारदर्शी शमीज रह गई, शमीज में से स्तनों के गुलाबीपन का पूरा नजारा हो रहा था, स्तनों की कठोर घुन्डियाँ शमीज में उभरी हुई थी। विवेक सर तीनों ग्लासों में बीयर डाल रहे थे, पसीना मुझे भी आ रहा था, मेरी कनपटियाँ बगलें और सीना पसीने से भीग रहे थे। परिधि ने अचानक ही मुझसे कहा- अरे पसीने में तो तू भी नहा रही है, उतार दे ये शर्ट ! …… थोड़ी हवा लगने दे बदन को ! …….. यह कहते हुए उसने अपने हाथ बढ़ाये और फुर्ती से मेरी शर्ट के बटन खोलती चली गई।. मैं गुमसुन की स्थिति में उसे रोक न पाई और देखते ही देखते उसने मेरी शर्ट मेरे बाजुओं से निकाल कर अपनी शर्ट के पास फेंक दी, मेरे स्तन परिधि से जरा भारी थे, उनका रंग भी शमीज से बाहर झाँक रहा था, दोनों स्तनों के अनछुए मगर कठोर निप्पल शमीज में अलग से ही उभर रहे थे, मुझे यह इतना बुरा नहीं लग रहा था कि मैं परिधि और विवेक सर से विदा ले लेती, अब सवाल विज्ञान में पास या फेल होने का नहीं रह गया था बल्कि अब तो मेरा युवा शरीर अपनी सामयिक आवश्यकता के हाथों मुझे विवश कर चुका था और मैं परिधि और विवेक सर का साथ ना चाह कर भी दे रही थी।. विवेक सर ने भी अपना कुर्ता उतार दिया, उनका चौड़ा सीना अनावृत हो गया, उनके सीने के दोनों छोटे-छोटे निप्पल अनायास ही मुझे आकर्षित कर गये थे, सीने से मेरी नजर फिसली तो फिसलती चली गई, उनके सपाट पेट के नीचे गहरी नाभि और फिर नाभि से काले-काले बालों का क्षेत्र आरंभ हुआ तो लुंगी के ढीले बंधन के नीचे जाकर ही लुप्त हो रहा था। मेरे मन में तीव्र उत्कंठा उत्पन्न हुई यह जानने की कि लुंगी के नीचे ये बालों का. क्षेत्र कहाँ तक गया है ! उन्होने लुंगी के नीचे कुछ पहना भी नहीं था अगर अंडर वीयर पहना होता तो उसका नेफा तो दिखाई देता ही !. हम तीनों ने बीयर का एक-एक ग्लास और पिया, ठंडी बीयर मेरे सीने में ठंडक बिछाती चली गई। तूने देखा काजल ….
अपने विवेक सर का सीना कैसा फौलादी है और बाल कैसे घुंघराले हैं ! किसी भी लड़की का ईमान डिगा देने वाली कठोर छातियाँ हैं इनकी ! परिधि ने उन्मुक्त शब्दों का प्रयोग किया। मुझे तनिक अचरज हुआ, मैने चौंकती नजर से विवेक सर के चेहरे को देखा कि शायद परिधि के उन्मुक्त शब्दों पर कुछ कठोर प्रतिक्रया करें पर वहाँ तो प्रसन्नता के भाव थे, उल्टे विवेक सर ने परिधि की नंगी जांघ पर हाथ की थपकी देकर रंगीन से स्वर में कहा- इन मरमरी जाँघों से तो हार्ड नहीं है मेरा सीना ! उनके स्वर में मजाक का पुट था, परिधि तुंरत उठ खड़ी हुई और संगीत की स्वर लहरियों पर थिरकने लगी।. अचानक उसने उस कैसेट को निकाल कर एक अन्य कैसेट लगा कर स्विच ऑन कर दिया, इस कैसेट मैं फिमेल सिंगरों की कामुक आवाजों में उत्तेजक गाने थे। मेरी अंग्रेजी अच्छी थी, गानों के बोल मेरी समझ में आ रहे थे, कुछ लड़कियां लड़कों के शारीरिक सौन्दर्य के बारे में अपनी बे-बाक राय को गीत की शक्ल में गा रही थी, मैं भी उस माहौल की गिरफ्त में आती जा रही थी। परिधि ने देखा कि मैने अपना ग्लास खाली कर दिया है तो उसने मेरी और हाथ बढ़ाया, मैने उसके हाथ को थाम लिया और उठ खड़ी हुई, हल्का-हल्का सुरूर मेरी नसों में घुलने लगा था, परिधि की भांति मेरी आँखों में भी सुर्ख डोरे उभरने लगे थे, मैं भी नाचने में उसका सहयोग करने लगी थी, संगीत की स्वर लहरियां यौनोत्तेजना को बढ़ाती जा रही थी। अचानक परिधि ने अपनी स्कर्ट का हुक ओर जिप खोल कर उसे टांगों से निकाल दिया, उसकी चिकनी ओर गोरी जांघें ट्यूब लाइट के दूधिया प्रकाश में रौशन हो उठी, वह बड़े ही उत्तेजक ढंग से अंग संचालन हर रही थी, आसमानी रंग की पेंटी उसके नितंबों पर मढ़ी हुई सी प्रतीत हो रही थी, उसने मेरी बगल में हाथ डाल कर मेरी शमीज को जरा उपर सरका कर मेरा सपाट पेट अनावृत करके उसे आहिस्ता-आहिस्ता सहलाना शुरु कर दिया था। उसके स्पर्श ने मेरे शरीर में एक विशेष प्रकार की अग्नि भड़का डाली थी, जिसे मैंने पहली ही दफा महसूस किया था और मेरी दीवानगी यह थी कि मैं खुद उस अग्नि में जल जाने को बेताब हुई जा रही थी, मेरा हाथ स्वतः ही उसके चिकने नितंबों पर फिसल रहा था, मेरा हलक सूखने लगा था और बजाय रुकने के मेरे पांवों में और तेजी आती जा रही थी।
स्रोत:इंटरनेट