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Teacher Kiya Pass Teacher Sex Kahani 3

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अचानक परिधि मेरे साथ नाचना छोड़ कर विवेक सर के पास जाकर लहराई और विवेक सर को हाथों से पकड़ कर अपने साथ नाचने के लिए उठा लिया, विवेक सर जैसे ही खड़े हुए उनकी लुंगी नीचे गिर गई, वह बंधी हुई नहीं थी बस ऐसे ही उनकी जाँघों के जोड़ पर लिपटी हुई थी शायद और उनकी जाँघों के मध्य लटकते उनके काले रंग के काफी लंबे अंग को देख कर मैं ठिठक सी गई। मैं जानती थी कि यह उनका लिंग है मगर किसी पुरुष का लिंग इतना बड़ा. हो सकता है, यह मेरे लिए आश्चर्य का विषय था। परिधि और विवेक सर एक दूसरे के शरीर पर हाथों से संवेदनशील स्पर्श देते हुए नाचने लगे, उनका नृत्य धीमा था लेकिन था अति-कामुक ! उनके स्टेप्स देख कर मेरे शरीर में चींटियाँ सी दौड़ने लगी, मैं नाचना भूल गई थी और चुपचाप आश्चर्य और अजीब से आकर्षण में बंधी उन दोनों के क्रियाकलाप देखने लगी। विवेक सर ने देखते ही देखते परिधि की शमीज की जिप खींच कर उसे उसके गोरे शरीर से अलग कर दिया, परिधि के स्तन किसी फ़ूल की भाँति खिल उठे। विवेक सर ने उन्हें अपने हाथों में संभाल लिया, वे उन्हें बड़े प्रेम से सहलाने लगे, परिधि उनके पुष्ट नितंबों पर हथेलियाँ टिका कर आँखें बंद किये धीरे-धीरे नाच रही थी, विवेक सर भी हल्के-हल्के थिरकते हुए उसके स्तनों को तो कभी गहरे गुलाबी रंग के निप्पलों को चुटकियों से मसल रहे थे, परिधि के होंठ बार-बार खुल रहे थे और उसके कंठ से मादक सिसकारियां उभर रही थी। अचानक ही विवेक सर ने अपना सर झुका कर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उसके अधरों का रस पान करने लगे। परिधि का शरीर हल्के-हल्के कंपन से भरने लगा था, उसका हाथ अभी भी विवेक सर के नितंबों पर गर्दिश कर रहे थे। सर का लगभग बारह इंच का लिंग अपने पूरे आकार में तन गया था, वह बार – बार झटके लेकर परिधि की पेंटी के उस स्थान से टकरा रहा था जिसके नीचे उसकी योनि छिपी थी। मैं भी उत्तेजना के भंवर में फंसती जा रही थी, मेरे हाथ अपनी शमीज में घुस गए थे और अपने कठोर स्तनों को मैं स्वयं ही मसलने लगी थी, इस क्रिया ने मेरे मस्तिस्क को झंकृत कर दिया था, मैं उन्मादित हुई जा रही थी, जाने कब मेरे हाथों ने मेरी शमीज को शरीर से निकाल दिया था, मैं अपने स्तनों को मसलते हुए बार-बार आनंद की हिलोरों में अपनी आँखें बंद कर लेती थी, मेरा हलक प्यास के कांटों से भर गया था, मैं कामोत्तेजना की तरंग के घूंट से पी रही थी, मेरी आँखें खुली तो देखा की अब विवेक सर ने अपने होंठ परिधि के स्तनों पर लगा दिए थे, वे बारी-बारी से दोनों काम पुष्पों का मानो रस पी रहे थे, परिधि उनके सर को सहला रही थी और मादक सिसकारियों से उसका कंठ भर गया था, अब उसके हाथों में सर का काफी लंबा और काफी मोटा लिंग मानो एक नई शक्ल पाने जा रहा था। मैं अपने आप को रोक ना सकी और आगे बढ़ कर परिधि से लिपट सी गई, मैने भी उसके एक स्तन को थाम लिया और निप्पल को चूसने लगी, अब विवेक सर ने मेरे भारी स्तन थाम लिए और उन्हे मसलते हुए मेरे अधरों को चूसने लगे। परिधि का एक हाथ मेरी स्कर्ट को नीचे खिसकाने की असफल कोशिश करने लगा तो मैने स्वयं ही अपनी स्कर्ट उतार दी। अब वह मेरी गुलाबी रंग की पेंटी को नीचे खिसकाते हुए मेरे नितंबों में आग जैसी भरने लगी।. विवेक सर ने मुझे नीचे झुकाया तो झुकाते चले गए, मैं पेट के बल झुक गई, परिधि मेरे बीच पीठ के बल लेट गई, मेरे हाथ कालीन पर टिक गए, मैने अपने नितंब नीचे करने चाहे तो विवेक सर ने उन्हें उपर ही रोक दिया, मेरे घुटने कालीन में जम गए तो विवेक सर मेरे नितंबों को सहलाने लगे, उन्होंने पेंटी पहले ही नीचे कर दी थी जिसे मैने टांगों से निकाल दिया, विवेक सर अपनी जीभ से मेरी योनि चाटने लगे थे, मेरे शरीर में बिजलियाँ दौड़ने लगी थी, परिधि मेरे नीचे लेटी मेरे स्तनों को मसले जा रही थी, मैं कामुक सीत्कार कर रही थी। मेरी योनि में मौजूद भंगाकुर को मानो चूस-चूस समाप्त कर देने की कसम ही खा ली थी विवेक सर ने ! उनकी इस क्रिया ने मेरी नस-नस सुलगा दी थी।. अचानक उन्होंने मेरी योनि में ढेर सारा थूक लगाया और अपने चिकने लिंग मुंड को योनि द्वार पर टिका कर धक्का मारा, मुझे भारी दर्द महसूस हुआ, लेकिन लिंग-मुंड के फिसल जाने के कारण ज्यादा पीड़ा नहीं हुई। विवेक सर ने अपने हांथों से मेरी जाँघों को चौड़ा किया और अपनी दो उंगुलियों से योनि को चौड़ा कर लिंग-मुंड को फिर से फंसा कर धक्का मारा तो मैं धम्म से परिधि पर गिर पड़ी, परिधि भी चीख पड़ी, लिंग मुंड फिर भी नहीं घुस पाया।. ओफ्फो…….
तुम जरा अपना वजन अपने हाथों पर नहीं रोक सकती ?….. परिधि इसकी हेल्प करो जरा ! ….. विवेक सर ने मेरे नितंबों को पकड़ कर फिर से उठाते हुए कहा। मैं भी परेशान सी हो गई थी, शरीर में आग लगी थी और अभी तक लिंग भी प्रवेश नहीं हुआ था। जरा आराम से करो !….. परिधि मेरे कन्धों को थाम कर बोली। विवेक सर ने इस बार फिर योनि के द्वार को चौड़ा कर लिंग मुंड फंसाया और मेरी पतली कमर पकड़ कर हल्का सा धक्का दिया, लिंग मुंड योनि को लगभग फाड़ते हुए उसमें उतर गया। दर्द के मारे मेरी चीख निकल गई ….. आ ई ई ई ऊई मां मर गई मैं तो !….. लिंग है या जलता हुआ लोहा !….
प्लीज….
निकालो इसे ! … मैं टूटे शब्दों में इतना ही कह पाई थी कि विवेक सर ने मेरी पतली कमर पकड़ कर थोड़ा पीछे हट कर एक धक्का और मारा, मैं बुरी तरह चीखी- उफ ….. आई… मां प्लीज … सर प्लीज ओह….
और दर्द के मारे मैं आगे कुछ नहीं कह पाई, और अपने सर को कालीन से सटा लिया, मेरी आँखों के आगे तारे से नाच गए थे। परिधि मेरे नीचे से निकल गई थी उसने मेरी पीठ को सहलाते हुए कहा- बस ….
यार… ! हो गया काम ! ….
तू तो बड़ी हिम्मत वाली है ! पूरा का पूरा अन्दर ले गई ! इतनी हिम्मत तो मुझमें भी नहीं थी। दोस्तों केसी लगी आपको मेरी teacher sex kahani बताना जरुर. और भी मस्त के लिए आते रहिये  my hindi sex stories पर.
स्रोत:इंटरनेट