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Thakurain Ka Insaaf Desi Adult Kahani

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Hindi Sex Story के अन्य भाग-. पार्ट 1. पार्ट 2. पार्ट 3. फ़िर सोचने लगी, क्या सच में पंडिताईन की चुत मस्त है ?.. पर व एक जवान लडके की मां है, फिर भी दिखती एकदम जवान लौंडिया जैसी । पंडिताईन ती चूत की कल्पना कर उनकी लंड में एक सिहरन सी दौड़ गई, साथ ही साथ उसके गाल भी लाल हो गये । करीब घंटा भर व. बिस्तर पर वैसे ही लेटी हुई पंडिताईन की चुत और पिछली बार बेला की सुनाई चुदाई की कहानियों को याद करती, अपनी जांघों के मध्य लंड को भींचती करवटें बदलती रही । ज्वाला देवी ने सतनाम के यहाँ नौकर भेज कर पंडिताईन को बुलवाया । पंडिताईन हड़बड़ाया सा वैसे ही चली आयी । ज्वाला देवी ने पंडिताईन को हड़बड़ाया हुआ देखा तो मन ही मन मुस्कुराई और पुछा, – “आम के बगीचे पर नहीं जाना क्या आज। तू जाती भी है या योंही ।. “हाँ जाती हूँ मालकीन । अभी आपने बुलाया इसलिए बगैर कपड़े बदले जल्दी से चली आयी अभी घर जा के बदल लूँगी तब जाऊँगी ।”. “जब तू जाती है तो इतने आम कैसे चोरी हो रहे हैं ?” इसी तरह जमीन- जायदाद की देखभाल की जाती है ? तुझसे अकेले नहीं सम्हलती तो नौकरों की मदद ले लेती…।”. “नौकर ही तो सबसे ज्यादा चोरी करवाते हैं …सब चोर है । इसीलिए तो मैं वहां अकेली ही जाती हूँ ।”. ज्वाला देवी गम्भीरता से बोली-. “तो ये बात तूने मुझे पहले क्यों नही बताई…? कोई बात नही, मगर मुझे बता देती तो कोई भरोसे का आदमी साथ कर देती…।” “अरे नहीं मालकीन, उसकी कोई जरुरत नहीं, मैं सब सम्भाल लूँगी ।” कहते हुए पंडिताईन उठने लगी । ज्वाला देवी पंडिताईन की सुडौल भारी बदन को घूरती हुई बोली-. “ना ना, अकेले तो जाना ही नहीं है…। मैं चलती हूँ तेरे साथ… मैं देखती हुँ चोरों को ।” “नहीं मालकीन, आप वहां क्या करने जाओगी ?… मुझे अभी कपड़े भी बदलने हैं । …मैं अकेला ही …।” “नहीं, मैं भी चलती हुं और तेरे कपड़े ऐसे ही ठीक हैं । …बहुत टाईम हो गया… बहुत पहले गर्मीयों में कई बार ठाकुर साहिब के साथ वहां पर जाती थी यहाँ तक कि सोती भी थी… कई बार तो रात में ही हमने आम तोड़. के भी खाये थे…चल मैं चलती हूँ ।”. शारदा विरोध नही कर पायी ।. “ठहर जा, जरा टार्च तो ले लुं…।” फिर ज्वाला देवी टार्च लेकर पंडिताईन के साथ निकल पड़ी । ज्वाला देवी ने अपनी साड़ी बदल ली थी, और अपने आप को संवार लिया था । ठकुराइन ने पंडिताईन को नजर भर कर देखा एकदम बनी ठनी, बहुत खूबसुरत लग रही थी । दोनों बगीचे पर पहुंच कर खलिहान या मकान जो भी कहिये उसका दरवाजा ही खोला था, दोनों अंदर दाखिल हुए । अन्धेरा तो बहुत ज्यादा था, मगर फिर भी किसी बिजली के खम्भे की रोशनी बगीचे में आ रही थी। ठकुराइन ने देख लिया बाहर गेट पर दो औरतें टहल रही थी और ठकुराइन ज्वाला देवी की आवाज गूँजी, “कौन घुस रहा है बगीचे में,,,,,…?।” पंडिताईन ने भी पलट कर देखा, इस से पहले की कुछ बोल पाती, कि ठकुराइन की कड़कती आवाज इस बार पूरे बगीचे में गुंज गई, “कौन है, रे ?!!!…ठहर.
अभी बताती हूँ ।” इसके साथ ही ज्वाला देवी ने दौड़ लगा दी ।. “ साली, आम चोर कुतिया,,,,,! ठहर वहीं पर…!।” भागते-भागते एक डन्डा भी हाथ में उठा लिया था । दोनों औरतें बेतहाशा भागी । पीछे ठकुराइन हाथ में डन्डा लिये गालियों की बौछार कर रही थी । दोनों जब बाउन्ड्री के गेट के बाहर भाग गई तो ज्वाला देवी रुक गई ।. गेट को ठीक से बन्द किया और वापस लौटी । पंडिताईन खलिहान के बाहर ही खड़ी थी ।. ज्वाला देवी की सांसे फुल रही थी । डन्डे को एक तरफ फेंक कर, अन्दर जा कर धम से बिस्तर पर बैठ गई और लम्बी-लम्बी सांसे लेते हुए बोली,- “साली हरामजादियाँ,,,,,, देखो तो कितनी हिम्मत है !?? शाम होते ही आ गई चोरी करने !,,,,,अगर हाथ आ जाती तो सुअरनियों की चूतड़ों में डन्डा पेल देती…हरामखोर साली, तभी तो इस बगीचे से उतनी कमाई नहीं होती, जितनी पहले होती थी…। मादरचोदियां, अपनी चूत में आम भर-भर के ले जाती है… रण्डियों का चेहरा नहीं देख पाई…।” पंडिताईन ज्वाला देवी के मुंह से ऐसी मोटी-मोटी भद्दी गालियों को सुन कर सन्न रह गयी । हालांकि व जानती थी कि ठकुराइन कड़क स्वभाव की है, और नौकर चाकरो को गरि याती रहती है । मगर ऐसी गन्दी-गन्दी गालियां उसके मुंह से पहली बार सुनी थी, हिम्मत करके बोली- “अरे मालकीन, छोड़ो ना आप भी… भगा तो दिया…अब मैं रोज इसी समय आया करूँगी ना , देखना इस बार अच्छी कमाई…।”. “ना ना,,,,,ऐसे इनकी आदत नहीं छुटने वाली…जब तक पकड़ के इनकी चूत में मिर्ची ना डालोगे बेटा, तब तक ये सब भोसड़चोदीयां ऐसे ही चोरी करने आती रहेंगी…। माल किसी का, खा कोई और रहा है…।” पंडिताईन ने कभी ठकुराइन को ऐसे गालियां देते नहीं सुना था । बोल तो कुछ सकती नही थी, मगर जब गन्दी- गन्दी बातजब ज्वाला देवी ने दो-चार और मोटी गालियां निकाली तो उनके इस छिनालपन को देख पंडिताईन की मन में वासना जाग उठी । फिर इस घबराहट को छुपाने के लिये जल्दी से बिस्तर पर ठकुराइन के सामने बैठ गयी ।. ज्वाला देवी की सांसे अभी काफ़ी तेज चल रही थी, उसने साड़ी खोल एक ओर फेंक दिया, और फिर पेटिकोट को फिर से घुटने के थोड़ा ऊपर तक खींच कर बैठ गई, और खिड़की के तरफ मुंह घुमा कर बोली,- “लगता है, आज बारिश होगी ।” पंडिताईन कुछ नहीं बोली उसकी नजरे तो ज्वाला देवी की गोरी-गठीली पिन्डलियों का मुआयना कर रही थी । घुमती नजरे जांघो तक पहुंच गई और व उसी में खोयी रहती, अगर अचानक ज्वाला देवी ना बोल पड़ती, “शारदा, आम खाओगी …!!?” पंडिताईन ने चौंक कर हड़बडाते हुए तुरंत बोली-. “आम,,,,? कहाँ है, आम…? अभी कहाँ से…?” “आम के बगीचे में बैठ कर…आम नहीं दिख रहे…!!!! बावला हो रही है क्या?” कह कर मुस्कुराई……।. “पर, रात में,,,,,,आम !?”, “चल बाहर चलते हैं।”, कहती हुई, पंडिताईन को एक तरफ धकेलती बिस्तर से उतरने लगी । “क्या मालकीन आपको भी इतनी रात में क्या-क्या सूझ रहा है… इतनी रात में आम कहाँ दिखोगे !”. “ये टार्च है ना,,,,,,बारिश आने वाली है…नहीं तोड़ेंगे तो जितने भी पके हुए आम है, गिर कर खराब हो जायेंगे…।” मजबुरन पंडिताईन भी अपनी साडी खोल केवल पेटीकोट में टार्च उठा कर बाहर की ओर चल दी और उसके पिछे ठकुराइन । ठकुराइन की ध्यान बराबर उसकी मटकती, गुदाज कमर और मांसल हिलते चूतड़ों की ओर चली गयी । एकदम गदराये-गठीले चूतड़, पेटिकोट के ऊपर से देखने से लग रहा था की हाथ लगा कर अगर पकड़े, तो मोटे मांसल चूतड़ों को रगड़ने का मजा आ जायेगा । ऐसे ठोस चूतड़ की, उसके दोनों भागों को अलग करने के लिये भी मेहनत करनी पड़ेगी । फिर उसके बीच चूतड़ों के बीच की नाली बस मजा आ जायेगा ।.
स्रोत:इंटरनेट