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Ye Main Kisse Chud Gayi Stranger Sex Stories 3

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वह थोड़ा ऊपर उठा और मुझपर से नीचे उतरा। उसने मेरे पाँव घुटनों से मोड़ दिये और घुटनों को किताब के पन्नों की तरह फैला दिया। गंतव्य को टटोला। लिंग को हाथ से पकड़कर छेद के मुँह पर लाया। वहाँ उसने ऊपर नीचे. रगड़कर रस में अच्छी तरह भिंगोया। मैं दम साधे प्रतीक्षारत थी। क्या करता है। मेरे पैरों के पंजे मेरे नितम्बों के पास नमस्कार की मुद्रा में जुड़े थे। वह लिंग के मुंह को मेरे छेद पर लाकर टिकाया और हल्के से. ठेला। तब मुझे उसके थूथन के मोटेपन का पता चला और मैं डर गई। इतना मोटा मेरे छोटे छेद के अंदर कैसे जाएगा? मेरे छेद का मुँह फैला और उसपर आकर उसका शिश्न टिक गया। अब उसके इधर उधर फिसल जाने का डर नहीं था।. शिश्न को वहीं टिकाए उसने हाथ हटाया और मेरे उपर झुक गया। मेरे बगलों के नीचे हाथ घुसाकर उसने मेरे कंघों को उपर से जकड़ लिया। उसके वजन से ही शिश्न अंदर धँसने लगा।. अब मैं जा रही थी। लुट रही थी। चोर मेरा सबसे अनमोल मेरे हाथों से ही धीरे धीरे छीन रहा था। मेरे राजीनामे के साथ। और मैं कुछ नहीं कर रही थी। विरोध नहीं करके उसे छीनने में मदद कर रही थी। अंधेरा मुझे लुट. जाने के लिए प्रेरित कर रहा था। किसे पता चलेगा? फिर प्राब्लम क्या है? रुकना किस लिए? अंधेरा मेरी इच्छा के विरुध्द मेरी मदद कर मुझे छल रहा था। अंधेरा उसे भी छल रहा था क्योंकि मैं उसकी मोना नहीं थी, मगर उसकी मदद भी कर रहा था क्योंकि उसने मुझे निश्चिंत करके मुझको उसे उपलब्ध करा दिया था। कुंवारी लड़की की सबसे अनमोल चीज। कितनी बड़ी भेंट वह अनजाने में पा रहा था ! जानते हुए में क्या मैं उसे हाथ भी लगाने. देती! हाथ लगाना तो दूर अपने से बात करने के लिए भी तरसाती। मगर अनजाना होनेपर मैं क्या कर रही थी। वह मेरा कौमार्य भंग कर रहा था और मैं सहयोग कर रही थी।. उसका लिंग मेरी योनि के मुँह पर दस्तक दे रहा था।. एक घक्का लगा और उसका शिश्न थोड़ा और भीतर धँस गया। छेद मानो खिंचकर फटने लगी। मैं दर्द से बिलबिला उठी। जोर लगाकर उसे हटाना चाहा मगर खुद को छुड़ा नहीं पाई। ऊपर वह मुझे कंधों से जकड़े हुए था और नीचे मेरे. पैरों को मोड़कर सामने से अपने पैरों से चाँपे था। छूटती किस तरह! उसने और जोर से दबाया। आह, मैं मर जाउंगी। शिश्न की मोटी गर्दन कील की तरह छेद में धँस गई। वह ठहर गया। शायद छेद को फैलने के लिए समय दे रहा था। मैंने उसे बगलों से पकड़कर ठेलकर छुड़ाने की कोशिश की। मगर सफलता नहीं मिली। वह कसकर मुझे जकड़े था। कोई उपाय नहीं। कोई सहायता नहीं। बुरी तरह फँसी हुई थी।. वह उसी दशा में रुका था। कुछ देर में योनि के खिंचाव का दर्द कुछ कम होने लगा। हल्की सी राहत मिली। झेल पाने की हिम्मत बंधी। मगर तभी एक जोरदार धक्का आया और धक्के के जोर से मेरा सारा बदन ऊपर ठेला गया।. शिश्न मुझे लगभग फाड़ते हुए मेरे अंदर घुस गया। मैं दर्द से चीख उठी मगर उसने मेरा मुँह बंद कर आवाज अंदर ही घोंट दी। वह बेरहम हो रहा था। लगा आज वह मुझे मार ही डालेगा। जिस तरह कुल्हाड़ी लकड़ी को फाड़ती है उसी. तरह मैं फटी जा रही थी। वह मुझे छटपटाने भी नहीं दे रहा था। हर तरफ से जकड़े था। मुँह पर हाथ दबाए था और नीचे दोनों पाँव जुड़े हुए उसके पैरों से मेरे नितम्बों पर दबे थे। उपर से कंधे जकडे था। हिलना भी. मुश्किल था। अब वह कोई दया दिखाने को तैयार नहीं था। छेद पर अपना दवाब बढ़ाता जा रहा था। कील धीरे धीरे मुझमें ठुकती जा रही थी। शिश्न मेरे काफी अंदर घुस चुका था। योनि के चिकने गीलेपन में वह भीतर सरकता ही. जा रहा था। मैं दर्द से व्याकुल हो रही थी। नश्तर की एक धार मुझे चीरती जा रही थी। छोड़ दो छोड़ दो। मगर मुँह बंधे जानवर की तरह मेरी उम… उम….
की आवाज भीतर ही घुट रही थी। उस सुरंग में सरकते हुए उसका शिश्न मानो किसी रुकावट से टकराया। कोई चीज दीवार की तरह उसका रास्ता रोक रही थी। वह चीज उसके नोंक के दबाव में खिँचती हुई भी आगे बढ़ने नहीं दे रही थी। मेरे भीतर मानों फटा जा. रहा था। उसने बेरहमी से और जोर लगाया। भीतर का पर्दा मानों फटने लगा। दर्द की इन्तहा हो गई। मैंने जांघें भींच लीं। किस तरह छुड़ाऊँ। कई तरफ से जोर लगाया। मगर कुछ कर नहीं पाई। रस्सी से बंधे बकरे की तरह हलाल. हो रही थी। विवशता में रो पड़ी। सिर्फ जांघों को भींचकर खुद को बचाने की कोशिश कर रही थी। मगर जांघ तो फैले थे। भींचने की कोशिश में छेद और सख्त हो रही थी, उससे और पीड़ा हो रही थी। शायद उसे मुझपर तरस आया। उसने मेरे बहते आँसुओं पर अपने होंट रख दिए। मुझे उस दर्द में भी उसपर दया आई। यह आदमी फिर भी क्रूर नहीं है। मेरा दर्द समझ रहा है। उसने सारे आँसू चूस लिये। मेरी बंद पलकों पर जीभ. फिराकर उन्हें भी सुखा दिया। कैसा विरोधाभास था! नीचे से लिंग की कठोर, जान निकाल देनेवाली क्रूरता, उपर से उसकी जीभ का कोमल सहानुभूतिभरा सांत्वनादायी प्यार। उसने मेरे चिड़िया की तरह अधखुले मुँह पर बार बार चुम्बन की मुहर लगाई। फिर ठुड्डी को, गले को, कॉलर की हड्डी को चूमता हुआ नीचे उतरा और प्रतीक्षा में फुरफुराती मेरी बाईं चूची को होंठों में अंदर गर्म घेरे में ले लिया। फिर मेरे दाएँ कंधे के नीचे से हाथ निकालकर मेरी प्रतीक्षारता दूसरी चूची को चुटकी में पकड़कर मसलने लगा। नीचे तड़तड़ाहट के दर्द के बावजूद आनंद की लहरें मुझमें दौड़ने लगीं। एक तरफ दर्द और दूसरे तरफ आनंद की लहर। किधर जाऊँ! एक तड़पा रही थी, दूसरी ललचा रही थी। कुछ क्षण आनंद के हिचकोले मुझे झुलाते रहे और उन हिचकोलों में चुभन की पीड़ा भी कुछ मध्दिम होती सी प्रतीत हुई। हालांकि वह मुझमें उतना ही घुसा हुआ था।. “मोना आई लव यू… आई लव यू ….
” वह नीचे चूचियों को चूसते हुए वहीं से बुदबुदाया। ‘मोना!’ हाँ, मैं रिया नहीं मोना थी। उसके लिए मोना। संवेदनों की तेज सनसनाहट में मैं भूल गई थी कि मैं मोना नहीं रिया थी। वह इतना प्यार मुझपर बरसा रहा था कोई और समझकर। मुझे पछतावा हुआ। इच्छा हुई उसे बता दूं। मगर आनंद और दर्द की लहरों में यह खयाल मुझे निरर्थक लगा। जो कुछ मैं भोग रही थी, जो आनंद, जो दर्द मुझे मिल रहा था उसमें इससे क्या फर्क पड़ता था मैं कौन हूँ। वह भोगना ही था। वह स्त्री देह की अनिवार्य नियति थी। कोई और राह नहीं थी। नीचे उस अनजान अतिथि को मेरी योनि अपनी पहचान के रस में डुबोकर भीतर बुला. ही चुकी थी। अब क्या बाकी रहा था?. और तभी ऑंखों के आगे चिनगारियाँ सी छूटीं और मैं बेसम्हाल उठी दर्द की लहर में बेहोश सी हो गई। ‘धचाक’..! उसने शिश्न को थोड़ा बाहर खींचा था। मैंने सोचा वह हमदर्दी में ऐसा कर रहा है, इसलिए ढीली पड़ी थी। मगर तभी एक बेहद जोर का धक्का लगा और मेरी ऑंखों के आगे तारे नाच गए। वह मुझे फाड़ते हुए मुझमें दाखिल हो गया। मैं खुद को भींच भी नहीं पाई थी कि उसे रोक सकूँ। मेरी साँस रुक गई। मैं बिलबिला उठी। आ ..ऽ ..ऽ ..ऽ.. ह ….. आ ..ऽ ..ऽ ..ऽ ह ….. छोड़ो मुझे, छोड़ों मुझे … वह जैसे ठहर कर मेरी छटपटाहट का आनंद ले रहा था। कोई दया नहीं। शिकारी जैसे अपने शिकार को तड़पते देख रहा था। मगर उसने मुझे दर्द की लहर से उबरने का मौका नहीं दिया। अभी ठीक से साँस लेने भी नहीं पाई थी कि दूसरा वार हुआ। एक और जोर का धक्का आया और वह एक गर्म सलाख की तरह मुझमें जड़ तक धँस गया। मेरा कलेजा मुँह को आ गया। उसका छोर मानो मेरे. कलेजे तक घुस गया था।.
स्रोत:इंटरनेट