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Ye Main Kisse Chud Gayi Stranger Sex Stories 4

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कील पूरी तरह ठुक चुकी थी और उसमें भिदकर मेरा कौमार्य एक तितली की भांति तड़प तड़पकर दम तोड़ चुका था, खत्म हो चुका था। अब वह कभी वापस नहीं लौट सकता था। इस जीवन में अब कभी नहीं। मैं ग्लानि से भर उठी। जो इतना अनमोल, इतना सहेजकर रखा था उसे यूँ ही सस्ते में बिना मोल के ही खो दिया था। उसे कभी वापस नहीं पा सकूंगी। मुझे बहुत कसकर अपनी बेहद कीमती चीज के खो जाने का एहसास हुआ। मैं फफक पड़ी। ”डार्लिंग, हो गया, बस… बस, इतना ही।” वह मुझे सांत्वना देने की कोशिश कर रहा था। ‘इतना ही!’ यह क्या कम है? ”अब और कुछ नहीं होगा। बस इतना ही सहना था।” वह मुझे सहलाने लगा था – कंधों को, बगलों को, नर्म छातियों को। ”पहली बार थोड़ा सहना पड़ता है। इसके बाद कभी दर्द नहीं होगा।” आश्वासन का मरहम लगाकर उस दर्द को शांत करने की कोशिश कर रहा था जो मेरी जांघों के जोड़ से बहुत भीतर मर्म तक दहकती आग जैसी जलन से उत्पन्न हो रहा था। उसका हाथ बहुत हौले हौले घूम रहा था, मसलने से दुख रही नाजुक चूचियों पर, तेज साँस में ऊपर नीचे होते नर्म पेट पर, उसके नीचे धड़कते फूले मांसल पेड़ू पर। वह सांत्वना दे रहा था – जांघों पर, घुटनों पर, पैरों पर, कोमल तलवों पर, वहाँ से उतर कर सँकरी कमर पर, उपर क्रमश: चौड़े होते धड पर। हर जगह घूमता हुआ वह मानो मेरा दर्द खींच रहा था। सांत्वना की सहलाहटें, स्पर्श, आश्वासन बरसाते चुम्बन धीरे धीरे असर कर रहे थे। उस आग की जलन कुछ कुछ घट रही थी। हालाँकि दर्द अब भी बहुत था। मगर उसके प्यार का बल पाकर सहने की ताकत आ रही थी। बिल्कुल औरत की तरह जो मर्द के प्यार के बल पर बड़े बड़े दर्द सह जाती है। मैं अब औरत बन गई थी। मगर क्या वह मेरा मर्द था?. एक दिया-सा जल रहा था। मैं जल रही थी। जलन मेरे जांघों के बीच हो रही थी जहाँ उसकी विजय पताका पूरे जोश से फहरा रही थी जिसका खंभा मेरे गर्भ तक बेधता हुआ गड़ा हुआ था। मैं उसकी आरती में दिए-सी असहाय जल रही. थी। हारी हुई, विवश जलन। जलन मेरे भीतर हो रही थी। हालाँकि योनि की जलन अब घट रही थी। इसमें उसका दोष नहीं था, मैंने खुद इसे चुना था, मोना बनकर। उसका शिश्न मेरे भीतर हिला। इस बार दर्द नहीं हुआ। वह थोड़ा बाहर निकला और फिर बिना किसी खास बाधा के घुस गया। गर्भ के मुँह पर दस्तक पड़ी। डरकर फिर मैंने साँस रोक ली। मगर कुछ खास दर्द नहीं हुआ। वह कुछ ठहरकर. फिर थोड़ा बाहर सरका। पहले से ज्यादा। उसके साथ उसके लिंग पर कसी मेरी योनि की दीवारें बाहर की ओर खिंच गई। मेरी भीतरी कोमल नितम्बों पर दबाव पड़ा और वह मोटा शिश्न मेरे अंदर रगड़ता हुआ फिर भीतर पैठ गया। अब. मेरी योनि फैल रही थी। वह धीरे धीरे धक्के देने लगा। इस बार दर्द थोड़ा कम हुआ। मेरा भय घटा। अब सह सकूंगी। धीरे धीरे धक्कों का जोर बढ़ने लगा। उसका शिश्न मेरी पिच्छल सुरंग में जोर जोर रगडता फिसलने लगा। वह. बाहर भीतर हो रहा था और योनि के संकुचन की रही सही सलवटें मिटा रहा था। मैं सह रही थी। पहली बार फैली योनि की तड़तड़ाहट बरकरार थी। फिर भी उसके धीरज और कोमलता से पेश आने पर मुझे दया आई। सहानुभूति में ही. मैंने उसके धक्के से मिलने के लिए अपने नितम्ब उचकाए। वह उत्साह से भर गया। और जोर जोर धक्के लगाने लगा। मेरी योनि में दर्द के बीच भी आनंद की हल्की तरंगें उठने लगी। वह और जोर जोर से धक्के मारने लगा। उसका. शिश्न मेरे छेद के मुँह तक आता और फिर सरसराकर भीतर घुस जाता। जब बाहर निकलता तो राहत मिलती और भीतर जाता तो दर्द होता, हालाँकि पहली बार की तरह असह्य नहीं। वह हाँफ रहा था। उसके बदन पर घूमते मेरे हाथ उसके पसीने से गीले हो रहे थे। वह जोर जोर से धक्के मार रहा था। मैं भी हाँफ रही थी। दर्द को भुलाने के लिए कभी उसकी पीठ पर हाथ पटकती, कभी नितम्ब उचकाती। इसे वह मेरा मजा आना समझ रहा था। वह और सक्रिय हुआ, और जल्दी जल्दी करने लगा। उसके मुँह से एक घुटी-सी कराह निकली … आ ..ऽ … ह … और उसने मुझे जोर से भींच लिया। कसाव में मेरी हड्डियाँ चटखने लगीं। मुझे अपने भीतर उसके शिश्न के झटके से फैलने-सिकुड़ने का एहसास हुआ। हर झटके में मेरे भीतर एक गर्म लावा-सा भरने लगा। आ ..ऽ ..ऽ ..ऽ ह … ओ ..ऽ..ऽ..ऽ..ह… वह झड़ रहा था और मेरे भीतर उसकी गर्म धार भरती जा रही थी। वह मुझमें बार बार झड़ रहा था। बाढ़ की तरह उसने मुझे भर दिया। उस गर्म धार में मेरी योनि, मेरा फूला पेडू भींग गए। आसपास के बाल भींगकर चमड़ी में चिपक गए। मुझे भी झड़ने की जरूरत महसूस हो रही थी। मगर दर्द भी हो रहा था। पहली बार होने का दर्द। मैंने उसे सहलाया और फिर उसके मुँह को चूम लिया। पता नहीं क्यों मुझे एक कृतज्ञता-सी महसूस हुई, हालाँकि उसने चोर की तरह छुपकर मुझे विवश करके मेरा शील भंग किया था। मगर फिर भी मैंने उसकी धार में पहला स्नान किया था।. वह उठा। लबालब भरी योनि से बहते लिसलिसे द्रव को छेद पर से, दरार में से, नीचे गुदा के छेद पर से, ऊपर चूत पर से पोंछा और मुझपर से उतर गया। मैंने भी अपनी पैंटी, अपनी शलवार खींची और ब्रा और फ्रॉक को टटोलकर उठाया और बाथरूम में चली गई। अब सब कुछ समाप्त हो गया था।. बाथरूम की रोशनी में मुझे शलवार पर और फ्राक पर खून के धब्बे नजर आए।. धो पोंछकर जब निकली तो मैंने अंधेरे में ही बिस्तर पर उसकी आहट लेने की कोशिश की। गहरी साँसों के आने जाने की आवाज आ रही थी। वह सो रहा था। अच्छा है। जब मोना सोने आएगी तो समझेगी। मैं दरवाजा खोलकर बाहर निकल. गई।. पढ़िए My Hindi Sex Stories पर..
स्रोत:इंटरनेट